Sunday, 14 May 2017

'मदर्स डे' यानी एक खास दिन मां के नाम यू तो हर दिन मां का होता है। इसे हम किसी एक दिन में समेटकर नहीं रख सकते, लेकिन फिर भी अगर ऐसा एक दिन मिलता है तो इसे क्यों न मनाया जाए? आज मदर्स डे है। संडे भी है और कुछ दोस्त भी साथ है तो हम लोगों ने सोचा आज क्यों न मां के लिए एक खत लिखा जाए? वैसे अब खत तो लिखा नहीं जाता पर हम लोग खत लिख रहें संडे वाली खत। अपने मां के नाम, मां के बिना हम जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

यह रिश्ता बिल्कुल खास है। इसमें एक ऐसा अहसास, अपनापन और मिठास है, जो इसे औरों से अलग करता है। क्योंकि दूनिया की सारी मां एक सी होती हैं। प्यार करने वाली दुलार करने वाली छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने वाली मां। हर छोटी-छोटी गलती पर पापा से मार से बचाने वाली। बीमार पड़ने पर सारी रात खुद जगकर हमें अपनी आंचल तले सुलाने वाली।

डीयर मम्मी 

कुछ दिन पहले आपकी चिट्टी मिली। मैंने आपकी चिट्टी को कई बार पढ़ा, लेकिन मैं उसे जितना बार पढ़ता हूं उतना ही गहरे ख्यालात में उतर जाता हूं। ख्यालात बचपन के, ख्य़ाल आपके प्यार के, आपके दुलार के, आपके आंचल में छिपकर सपने सजाने वाली अहसार के, जमीर को सुकून देने वाली आपकी उस स्पर्श के, चिलचिलाती धूप में आपके हाथों की ठंडक के, आपको छूकर आती शीतल हवा के, कड़कती धूप में चैन के।

आपके हाथों से खाने का निवाला खाना, आपकी ममता भरी डांट के बाद ढेर सारा दुलार... रात की गहराई में आपकी ममता की रोशनी...दर्द में भी चांद की चांदनी सी आपकी मुस्कुराहट और भी बहुत कुछ याद आ जाती है मां। आपने जैसे कई बातें पहली बार खत में मुझे बताई, ऐसी ही एक बात मैं आपको बताना चाहता हूं। छोटेसा जब मैं आप लोगों से दूर हॉस्टल में रहता था। जब आप मुझसे मिलने आया करती थी, या मुझे घर से हॉस्टल छोड़ने जाती, जब आप छोड़ कर वापस आती थी। तो उस दिन मुझे रोना आता था। क्यूं आता था इसका कोई जवाब नहीं है। न मुझे तब समझ आया था न अब समझ में आ रहा है जब मैं ये खत आपको लिख रहा हूं।


जब मैं घर से हॉस्टल के लिए जा रहा था तब मैं जितना घर, मोहल्ला, खेल के मैदान, दीदी, भाई के लिए रोया था उतना ही आपके लिए भी रोया था। मुझे याद है, जब आपका फोन आता है तो सबसे पहले यही पुछती हो कि तुम ठीक हो, यहां सब ठीक है। तबीयत तो ठीक है न कोई दिक्कत तो नहीं कुल इतनी सी बातचीत से लगता है कि दुनिया में सब ठीक है और मैं आराम से सो सकता हूं। जब मैं परेशान होता हूं तो आपका बस इतना कहना कि सब अच्छे के लिए होता है। यह बात सूनकर ही मैं सारी परेशानियों को भूल जाता हूं।

आपको एक बात बताउं मैं जब भी घर से आता हूं तो आप हिदायत देती है नहाकर पूजा कर लेना फिर कुछ और करना। शुरू में तो बुरा लगता था, लेकिन अब भी मैं पूजा-वूजा नहीं करता पर हां नहा जरूर लेता हूं कुछ भी करने से पहले आपको पता है जब भी मैं छुट्टी पर घर आता हूं तो मैं नहाता भी नहीं, लगता है कि आपको घऱ पर रहते हुए नहाने की क्या जरूरत है। इस बार जब घर आऊंगा तो तबीयत से लगाइयेगा दो-चार थप्पड़ क्योंकि मैं आपकी बातों नहीं मानता अगर आपके मार से रोना आ जाए तो चुप मत करना बस थोड़ी देर तक चैन से रो लेने देना बहुत दिन के आंसू हैं बहुत देर तक निकले शायद।

Tuesday, 9 May 2017

महाराणा प्रताप मेवाड़ के महान हिंदू शासक थे। सोलहवीं शताब्दी के राजपूत शासकों में महाराणा प्रताप ऐसे शासक थे, जो अकबर को लगातार टक्कर देते रहे। अकबर और महाराणा प्रताप में किसे महान कहना चाहिए। यह सवाल लोगों को सैकड़ो सालों से परेशान करते रहा है। बुद्धि जीवियों और इतिहासकारों में इस सवाल को लेकर अलग-अलग राय है। दोनों अपनी जगह महान थे। दोनों से हम आज बहुत कुछ सीख सकते हैं, बशर्ते हमें मालूम हो कि हुआ क्या था।

कहा जाता है कि राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित हल्दीघाटी युद्ध मुगल शासक अकबर ने नहीं बल्कि महाराणा प्रताप ने जीता था। हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था। अकबर और राणा के बीच यह युद्ध महाभारत युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ था। साल 1576 में हुए इस भीषण युद्ध में अकबर को नाको चने चबाने पड़े और आखिर जीत महाराणा प्रताप की हुई। यह दावा राजस्थान सरकार की ओर से किया गया है।

महाराणा प्रताप सिंह (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदानुसार- 9 मई, 1540 ई. से 29 जनवरी, 1597 ई तक) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर हुआ था।


कहा जाता है कि अकबर हमलावर था। मेवाड़ पर हमला करके उस पर अधिकार जमाना चाह रहा था। राणा प्रताप मेवाड़ के लोकप्रिय शासक थे। यह उन दिनों की बात है जब अकबर भारत पर अपना शासन फैलाने में लगा हुआ था। वह अपने बाप-दादा के समय की परंपरा को तोड़कर अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया था। जहां बाबार और हुमायूं सुल्तान थे, तो वहीं अकबर बादशाह था। बादशाह यानि सर्वोपरि एक ऐसा राजा जो किसी खलीफा के अधिन नहीं।

अकबर पश्चिम एशिया से अपना संबंध खत्म कर भारत में अपनी जड़े जमा ली थी और वह पूरे भारत पर साशन करना चाहता था पर मेवाड़ के राणा, प्रताप सिंह को अकबर की अधीनता स्वीकार न थी। प्रताप के पहले भी कभी मेवाड़ के किसी शासक ने किसी का आधिपत्य नहीं माना था को महाराणा कैसे मान लेते।

पर अकबर की निगाहें मेवाड़ पर था। अकबर ने कई बार दूत भेजकर मेवाड़ को अपने खेमे में मिलाने की कोशिश की। लेकिन महाराणा को ऐसी दोस्ती जरा भी पसंद नहीं था जिसमें अकबर को बादशाह मानना पड़े, यह प्रताप को नागवार था। सो हर बार मुग़ल दूत अपना सा मुंह लेकर वापस लौटा। अंतत: अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में फ़ौज भेजकर मेवाड़ पर कब्ज़ा करने की ठानी। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20,000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80,000 की सेना का सामना किया।

हमारे इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चे होते है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कहा जाता है कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था। हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुग़ल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुग़ल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

कहा जाता है कि अगर आप भारत को एक सूत्र में बांधने के काम को महान मानते हैं तो अकबर ने इसके लिए काफ़ी कोशिश की। अगर आप वीरता से आक्रमणकारी को पीछे धकेलने को महान काम मानते हैं तो प्रताप का कोई सानी न था।

Monday, 1 May 2017

Posted by Gautam singh Posted on 04:40 | No comments

अरे हम शर्मिंदा है



कश्मिर के पुलवामा के सरकारी डिग्री कॉलेज में आईएसआईएस का झंडा फहराया गया और हमारी सरकार चुपचाप देखती रही। हम क्यों नहीं पाकिस्तान से सिखे आतंकी देश है वह लेकिन फिर भी वहां के लोग वही का जयकारा लगाते है भले ही वह बॉलीवुड से कमाते हो लेकिन गुण पाकिस्तान का ही गाते है अरे बेशर्मो अगर पाकिस्तान से कुछ सिखना है तो यह सिखों की वह अपने देश के प्रति कितना इमानदार है। एक गद्दार वतन के लोग अपने वतन के लिए। यह विडंबना है अपने देश का स्कॉलरशिप भारत का चाहिए, आरक्षण भारत का चाहिए रोटी भारत का चाहिए लेकिन झंडा पाकिस्तान और आईएसआईएस का लहरायेंगे। बाकी जो थोड़ा बहुत कमी रह जाता है तो वह पूरा कर देते है हमारे यहां के धर्म गुरु अगर भगवान ने धर्म दिया है तो अक्ल भी दी है खुद पढ़ों किसी धर्म गुरु के पास जाने की जरूरत नहीं है। वह कोई भगवान नहीं वह भी हमारे तरह इंसान ही है। हमसे और आपसे ज्यादा विवेकशिल नहीं है। वहां हमारे सैनिक सहीद हो जाते है और हमारे देश के गृहमंत्रि कह देते है हम कड़े शब्दों में निंदा करते है।

अरे अगर निंदा ही करना है तो फिर मनमोहन सिंह में क्या बूराई था। अरे हम शर्मिंदा है की आप हमारे गृहमंत्री है कोई हमारे घर में घुसकर हमारे सैनिको को मार कर चला जाता है और आप बस इतना कहते है कि हम कड़े शब्दों में निंदा करते है। आपलोग कुछ करेंगे भी नहीं, क्योंकि आपलोगों की तो रोटियां इसी से चलती है। कभी कांग्रेस, कभी बीजेपी कभी आप सभी बारी-बारी से अपनी रोटियां सेकते रहिये। हमारे प्रधानसेवक कहते है हम प्राउड फिल करते है अपने सैनिको पर तो प्राउड का क्या हम पुंगी बजाए। वक्त बदल रहा है प्रधानसेवक महोदय यह बड़ी-बड़ी बाते करने से कुछ नहीं होगा अब करके दिखाइये। अब अगर नहीं किया ना प्रधानसेवक महोदय तो आपको भी लोग उतार फेकेंगे।

आज के युवा पढ़ा लिखा है वह अब फ्री पानी और रोटी के नाम पर खुस नहीं होने वाले है। सब बदल कर रख देगा आपका। चाहे वह कोई भी पार्टी हो क्या फर्क पड़ता है वह कांग्रेस है या बीजेपी है। कांग्रेस के लोग बीजेपी में चले जाते है तो वह शुद्ध हो जाते है क्या बीजेपी में गंगा जल रखा हुआ जो कांग्रेस छोड़ते ही वह शुद्ध हो जाते है। लोग तो वही है चेहरे तो वही है बस पार्टी बदल जाती है। कहां से विकास होगा इस देश का करोड़ों के थाली में जिसको रुपये जाहिए कहां से विकास होगा देश का। वैसे भी आपसे किसीने ने विकास की उम्मीद की भी नहीं थी बस आप सत्ता में इसलिए आये की लोग आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के साथ-साथ भष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में मजबूती चाहते थे। यह तो तय है की पांच साल में विकसित करने के लिए आपको कम से कम ब्रह्मा होना पड़ेगा। वो आपसे बस का है नहीं।

Monday, 10 April 2017

यादें रोई, सपने रोये, या दिल रोया पता नही!! कल रात सिसकीयां सुनाई दे रही थी सीने में, धडकन की तरह....अब सोचता हूं यादों पर भी कोई शरहद होती तो कितना अच्छा होता कम से कम खबर तो होती कि सफ़र कितना तय करना है। तुम जानते हो सारा दिन गुजर रहा था खुद को समेटने में....फिर तेरी यादों की हवा चली और हर दिन के तरह हम फिर से बिखर गये.... जब भी मैं इस शहर से निकलना चाहता हूं कोई न कोई रास्ता लौटा लाता है। मैं तुम्हें हर लैंप पोस्ट पर खड़ा पाता हूं। हर बस से लेकर मेट्रो की सीट पर तुम्हीं बैठे लगती हो। तुम जानती हो वक्त मेरी तबाही पर हंसता है। अब मैं वक़्त की दहलीज़ पे ठहरा हुआ पल सा हो गया हूं। लोग कहते है वक़्त और हालात दोनो ही बदल जाते हैं मंज़िलें रह जाती हैं, और लोग बिछड़ जाते हैं....बड़ा ही मिठा नशा है तेरी यादों का.... वक़्त गुजरता जा रहा है और हम आदी होते जा रहे है।


कभी चांद को देखा है तुमने? कभी चांद को पूजा है? चांद अपने चाहने वालों को कितना परेशान करता है... कितना सताता है... ठीक तुम भी वैसे ही हो गई हो। जब चकोर चांद को हसरत भरी नज़रों से देखता है, तो चांद बादलों के पीछे छुप जाता है। जब चांद को देखकर व्रत खोलना होता है... तो चांद देर से निकलता है। जब चांद को देखकर ईद मनानी होती है... तो चांद जानबूझ कर इतराता है। चांद को पाना किसी के बस की बात नहीं.. फिर भी चांद को चाहने वालों की चाहत कम नहीं होती.... तुम भी उसी चांद की तरह हो.. और मैं उसी चांद को पूजता हूं... लाख चाह कर भी मैं उस चांद को छू नहीं सकता... बस चांद की चांदनी को देख सकता हूं... महसूस कर सकता हूं, पर अपना नहीं बना सकता... क्योंकि सुबह होते ही यह चांद मेरा साथ छोड़ देता है तुम्हारे तरह। तुम नदी के पानी में चांद की परछाई सी हो जिसे मैं देख तो सकता हूं, पर छू नहीं सकता। अगर मैं पानी में चांद को छूने भी गया तो चांद की जो अक्स अभी दिख रहा है... वह भी नहीं दिखेगा... लहरो के साथ वह भी घूल जाएगा और मेरे डूबने के आसार बढ़ जाएंगे। इसलिए मैं चांद को सपने में भी छूने की कोशिश नहीं करता।


तुम जानती हो उस चांद को बस तकना ही मेरी फितरत हो गई है। कोई रास्ता भी नहीं है, दुआओं के अलावे और कोई सुनता भी तो नहीं यहां... खुदा के सिवा... अब मुझे उल्फत की जंजीरों से डर लगता हैं, जो जुदा करते हैं, किसी को किसी से, उस हाथ की लकीरों से भी डर लगने लगा है। कभी-कभी जी चाहता है कि हाथ के सारे लकीरों को मैं मिटा दूं पर नहीं मिटाता मैं सोचता हूं कि इसी लकीरों के बीच कही वह लकीर भी छुपी हो जिसमें लिखा हो तुम वापस लौट आओंगी...पर मैं यह जानता हूं कि यह मात्र एक भ्रम भर है पर मैं इस भ्रम में जीना चाहता हूं जो कम से कम मुझे झुठा दिलासा तो दिलाता है तुम्हारे वापस आने का.... जिससे मैं बेवफाई की तपिश से बच कर इश्क की घटाओं में बैठ तो जाता हूं, मैं जब भी उदासी से घबराने लगता हूं तेरे ख़याल की छांव में बैठ जाता हूं। मैं तुम्हारे लिए अजनबी हो सकता हूं। मैं तुम्हारे लिए अब खुशियों से ज्यादा गम की परछाई हो सकता हूं। मुझे नहीं पता बुरा मैं हो गया हूं या बुरा वक्त हो गया है।


तुम जानती हो अब हर आहट पर तेरी ही तलाश रहती है मुझे... मुस्कान तो आती है होटो पर तुम्हें याद करते वक्त...लब तक थरथरा जाते हैं। तुम्हारे जाने के बाद छोड़ दिया है मैंने अपने दिल का साथ और थाम लिया है तन्हाई का हाथ तुम ही बताओं इस तन्हाई से हाथ न मिलाता तो क्या करता। कोई मिलता भी तो नहीं हमसे यहां हमारा बनकर.... मैं तुम्हारी यादों को किसी कोने में छुपा नहीं सकता, तुम्हारे चेहरे की चहक चाहकर भी भुला नहीं पाता हूं। नसीब की खेल भी कितना अजीब होता है न, जो नहीं होता है नसीब में लोग उसी को टूट कर चाहते है। अब तूम जो नहीं हो तो बिन तेरे शामें उदास रहती है मेरे, ढूंढें तुझे कहां-कहां आंखें....तुम जानती हो अब बस इक चांद ही नहीं है जो पूछे तेरा पता, जी चाहता है तुम्हारी हर यादों को सिमेट लू जो भी मिलता है उसे किनारा बनकर इन आखों में छिपा लू हर ख्वाब टूट के बिखरा कांच की तरह, बस एक इंतज़ार है तुम्हारा साथ सहारा बनकर चलने का......

Saturday, 1 April 2017


प्रिय तान्या

पुरे आठ साल ग़ुज़र गई है तुम्हारी ख़ामोशी पढ़ते हुए। ख़ामोशी में चाहे जितना बेगाना-पन हो, लेकिन एक आहट जानी-पहचानी सी लगती है तान्या। तुम जानती हो सच्चाई तो बस खामोशी में है। शब्द तो मैं लोगों के अनुसार बदल लेता हूं। जुबां न भी बोले तो मुश्किल नहीं होता है प्रिय, लेकिन फिक्र तब होती है जब, खामोशी भी बोलना छोड़ दे। इश्क के चर्चे भले ही सारी दुनिया में होते होंगे पर दिल तो खामोशी से ही टूटते है न। तुमने कभी महसूस किया है खामोशी कितना कुछ कहती है। कान लगाकर नहीं कभी दिल लगा कर सुनों यह कितना शोर मचाती है। ये हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब होती हैं न। होते तो हैं हाथ के अंदर पर काबू से बाहर। एक तेरी खामोशी ही जला देती है इस पागल दिल को… बाकी सब बाते अच्छी है तेरी तस्वीर में… मुझे कभी-कभी लगता है हमारी मोहब्बत जरूर अधूरी रह गयी होगी पिछले जन्म मे, वरना इस जन्म की तेरी ख़ामोशी मुझे इतना बेचैन न करती....

तुम जानती हो तान्या तुम्हारी खामोशी की भी एक जुबान है। ये खामोशी जिस से पल भर में सन्नाटा हो जाता है उसी ख़ामोशी का शोर कई बार अकेले में तड़पाने लगता है। यह खामोशी अब बर्दाश्त के बाहर होने लगी है प्रिय। कभी सावन के शोर ने मदहोश किया था मौसम, अब ऐसा लगता है पतझड़ में हर दरख़्त खामोश खड़ा है। तुम जानती हो तुमने जो वह सुफेद कलर का पैंट और ब्लू शर्ट दिया था न उपहार में... उसको मैंने अभी तक रखा है संभाल कर... जिस दिन तुम गई थी न उस दिन ही मैंने उस पैंट और शर्ट को रख दिया था। अटैची में प्लास्टिक के कवर में डाल कर उस वक्त उस पैंट पर कोई दाग नहीं था प्रिय। पर आज जब उस अटैची को खोला तो देखा उस पैंट पर दाग उभर गए है। यह पैंट और शर्ट ही तो था इकलौता गवाह हमारे मोहब्बत का... पर अब वह भी दगा दे गया है तुम्हारी तरह....शायद दगा इसलिए दे गया कि वह तुम्हारा ही दिया था अब जब तुम नहीं हो मेरे साथ तो वह कैसे रह पाता।

 जैसे तुम चली गई बिना कुछ बोले वैसे ही पैंट भी चला गया बिना कुछ कहें खामोशी से... मैंने रोकना भी चाहा था तुमको पर तुम नहीं रुकी... शायद जाना तुम्हारा शौक था...वो शौक तुम पूरा कर गई मेरी हसरते तोड़ कर...अब हर जज़्बात को कोरे कागज पर उतार देता हूं इसलिए की वह खामोश भी रहता है और किसी से कुछ कहता भी नहीं। तुम जानती हो तान्या मोहब्बत के जिस राहों में कभी दिल शोर मचाया करता था, आज वह गलियों से खामोश निकला करता है। यह जरूरी भी नहीं हर बात लफ्जों की गुलाम हो खामोशी भी तो खुद की जुबान होती है न शायद वो जुबां जिसे हम समझते हैं। तुम जानती हो प्रिय यह खामोशी ही मेरी कमजोरी बन गई है। जिस खामोशी से मुझे लगाव था आज वह शोर मचा रही है। कानो के पर्दे फाड़ देने वाले....तुम्हें कह न पाए कभी दिल के जज़्बात और इस तरह से तुम से दूरी बन गयी प्रिय।

तुम जानती हो तन्या मैं लिखता इसलिए हूं कि शब्द चाहे जितने हो मेरे पास, जो तुम तक न पहुंचे, तो सब व्यर्थ हैं...! प्रिय मैं हर शब्द तुम तक पहुचाना चाहता हूं तुम्हारे कानों को खामोशी से बनी नज्म सुनाना चाहता हूं। शायद इसलिए लिखता हूं और अब इसे ऐसे ही रहने दो प्रिय जो समंदर जैसे खामोश हैं और उसे खामोश ही रहने दो.. अगर ज़रा भी मचल गया तो सारा शहर ले डूबेगा। तुम जानती हो मैं सोचता हूं काश कुछ लम्हों को हम अपनी गिरफ्त में रख पाते, तो आज अपने सर पे तेरे हाथ की न कमी पाते। जिन्दगी की रहगुजर में कोई कमी सी रह गई, मिले तो थे कई सौगातें बस तेरी कमी रह गई। वो ख़्वाब जो दिन रात हम खुली आंखों से देखा करते थे, उन ख़्वाब को बस, शब भर जीने की तम्मना रह गई। तुम जानती हो न तान्या अश्कों के बह जाने की रवायत का मैं कायल नहीं था, फिर न जाने पलकों पे क्यों यह नमी सी आ जाती है। तुम तो चली गई हो पर गुफ्तगूं की तरह मेरी खामोशियां भी बोलती हैं। हर लफ्ज़ गुफ्तगू करता है.. हर लफ्ज़ तुम्हारा ही तो है। बार-बार टूटता है। हज़ार बार टूटता है और टूट कर तुम्हारी कल्पनाओं में खो जाता है। अब ना खुशियों की रौनक ना गमों का कोई शोर आहिस्ता-आहिस्ता ही सही जो तेरी यादों में कट जायेगा ये सफ़र....

तुम्हारा
 मैं...

Tuesday, 21 March 2017

प्रिय तम्मना

तुम जा चुकी हो मेरी जिंदगी से संदली जिस्म लेकर लेकिन मैं एक आरजू दिल में छुपाये फिर रहा हूं। कभी कह नहीं पाया तुमको इसलिए की तुम कहीं नाराज न हो जाओं मेरी गुस्ताखी से...पर अब जब तुम नहीं हो खोया रहता हूं तुम्हारे ख्यालो में... जमाने का कोई होश भी नहीं है मुझे... तेरी यादों के जज्बात इस कदर छलक रहें है मेरी आंखो में की बिना देखे तेरी तस्वीर बार-बार बना रहा हूं। धड़कन तो मेरी खामोश है... पर नजरें तुम्हें तलाश रही है। ठीक वैसे ही जैसे चांद नूर की तलाश में भटकता है। मैं भी भटक रहा हूं और भटकते-भटकते बुझ गया हूं। वह गर्दिश का सितारा जलके... जो कभी सबको रोशन किया करता था... अब वह सितारा वहां बेइंतहा दर्द से तड़प रहा है। हमारी खामोशी, हमारी आहट, हमारी आंखें, हमारी चाहत सब स्थिर हो गया है तम्मना। शांत, ठंड़ा, अकड़ा हुआ एक लाश की भांती.....

लेकिन मैं जिंदा हूं....मैं जिंदा क्यों हूं? मुझे तो मर जाना चाहिए...पर मैं मर नहीं सकता....मैं मर इसलिए नहीं सकता की तेरे ख्वाब जो सलामत है मेरे लहू के हर कतरे में...रात दिन उसे सहेज कर रखा हुआ हूं....अब किसी राह की ख्वाहिश नहीं है दिल में... हमने जब देखे थे एक रहगुज़र, साथ चलने की जो अब अलग हो गए है। जिस्म से होने वाली मोहब्बत आसान है... पर जिसे रूह से मोहब्बत हो जाए उसे अलग कैसे किया जा सकता है प्रिय। वह गुजर रही है बस तेरे वापस आने की आस में... मैं जानता हूं की तुम नहीं आओंगी पर मन कहां किसी की सुनता है यह तो चंचल है हर पल तुझसे मिलने की प्यास लिये फिरता है। सब कुछ है यहां बस तुम नहीं हो तम्मना। तुम कहीं भी रहो पर तेरे सर पर एक इल्जाम तो हमेशा रहेंगा... तेरे होंठों की लकीरों पे मेरा नाम तो हमेशा रहेंगा... तुम मुझको अपना बना या न बना लेकिन तेरे हर एक धड़कन में मेरा नाम तो हमेशा रहेगा।

वो ख्वाब जो कभी हम पाला करते थे अपने आंखों में... पानी से तस्वीर बना कर, अब कहीं भटक रहें है। तुम अक्सर कहती थी न तम्मना इश्क है वही, जो एक तरफा हो, इजहार-ए-इश्क तो ख्वाहिश बन जाती है, है अगर इश्क तो आंखों में दिखाओ, जुबां खोलने पर ये नुमाइश बन जाती है। मैं जुबान नहीं खोलता क्योंकि मैं अपने इश्क का नुमाइस नहीं करना चाहता। क्योंकि मैं जानता हूं इश्क तो महसूस और महफूज करने की चीज है नुमाइस की नहीं.... तुम जानती हो कितनी बाते याद आती है तुम्हारी.... और फिर वह तस्वीरें सी बन जाती हैं... अब उन यादों को धागे से सीने की कोशिश करते रहता हूं तम्मना। मैं उन लम्हो को फिर से जीने की कोशिश करते रहता हूं.... जो ओस से भी हलकी थी.... वह अश्कों की बूंदें, जो तुम उस दिन जाते वक्त गिराते गई थी...अब वह अश्क बार-बार मुझे बेचैन कर रही है... तुम्हारा इश्क दिखावा नहीं था प्रिय... तुम्हारा प्रेम तो उतना ही पवित्र था... शायद है... जितना पवित्र आत्मा।

तुम नहीं हो और तुम्हारे बिना जिंदगी भी नहीं है... जिंदगी, मैं फिर भी हर दिन जीने की कोशिश करता हूं। एक भ्रम, मैं रोज पैदा करता हूं तुम कहीं नहीं गई हो ...तुम यहीं हो मेरे पास मेरे हर एक सांसों में मेरे हर एक धड़कन में...मेरे लहु के हर के कतरे में...कुछ भी तो नहीं हुआ है....हमदोनों के बीच सब सही तो है...पर अचानक मेरे आंखों के कोरों से आंसू छलक आते है...क्योंकि मैं अपने जिस्म से तो झूट बोल लेता हूं तम्मना... पर अपने रूह से झुट नहीं बोल पाता....वह भ्रम जो मैं खुद बूनता हू्ं तुम्हें भूलाने के लिए वह टूठ जाता है। अधूरे ख्वाबों की दहलीज़ पर खड़ा, आज भी तेरी राह तकता है, अब कोई नहीं, कहीं नहीं, दिल के पास, मेरा वजूद एक सवाल बन गया अब तो, मेरे ही 'आप' अब मेरे आसपास नहीं.....तुम जानती हो... जब भी मुझे याद उस लम्हें की आती है। मोहब्बत कसक बनके उभर आती है। मेरे आंखों से आंसू की शीतल धारा छलक पड़ती है।

अब मन करता है खामोशी की सब दीवार तोड़ दू, तुम्हें जाकर सबकुछ बोल दू.... कुछ मैं तुमसे बोलू कुछ तुम हमसे बोलो... दिल से ज़ख्म, ज़ख्म से दर्द का सफ़र बहुत हुआ, आज हम एक दूजे पर मरहम बनकर लग जाय...पर यह भी महज़ एक स्वप्न भर है। मैं किसी तरह के भ्रम में अब जीना नहीं चाहता इस लिए शायद मेरे आंखों से आंसू छलक रहें है। ये याद है तुम्हारी या यादों में तुम हो, ये ख्वाब है तुम्हारे या ख्वाबों में तुम हो, मैं नहीं जानता... तम्मना तुम्हारे शरीर की खुशबू मैं हमेशा महसूस करता हूं। अजीब सी बेकरारी रहती है। दिन भी भारी, रात भी भारी रहता है वह आईना भी मैंने तोड़ दिया इस ख्याल से कि शायद हमारी तकदीर बदल जाए...पर आईने के हर टुकड़े में सिर्फ तुम्हारी ही तस्वीर नजर आती है। तुम जानती हो मुझे अब ऐसा प्रतित होने लगा है कि प्यार कहां किसी का पूरा होता है...प्यार का तो पहला ही अक्षर ही अधूरा है। जब वह पूरा नहीं है तो हम पूरा कैसे हो सकते है....तम्मना सच्चे प्यार में निकले आंसू और बच्चे के आंसू एक समान होते है। क्योंकि दोनों जानते है दर्द क्या है पर किसी को बता नहीं पाते...ठीक वैसे ही हम जानते है दर्द कहां और कैसे है हम कह नहीं पाते.........

तुम्हारा
पारस

Thursday, 16 March 2017

अम्मी आज जब तुम्हारा ऑपरेशन हो रहा था ना तो आपा, खाला बार-बार मुझे फोन पर बता रही थी कि जब तुम खुद अपने बजूद को नहीं पहचान पा रही थी तब भी तुम मुरछित अवस्था में भी हमलोगों का नाम लेकर बड़बड़ा रही थी। अम्मी मैं भी आना चाहता था पर नहीं आ सका तुम से दूर रहना भी कुछ ऐसा हैं अम्मी जैसे मेरी सांसे मुझसे दूर हो.... सूरज की रोशनी भी इन नजरों को भाती नहीं है... अक्सर रात में चांद के उजाले में तेरा चेहरा नजर आता है अम्मी.... जिसमें तुम नाराज नजर आती हो..... मैं जातना हूं तुम चाहती थी कि तुम्हारे ऑपरेशन के दरमियां हम सब वहां रहें तुम्हारे पास पर मैं नहीं आया। क्यों नहीं आया इसका कोई पूख्ता जवाब नहीं है मेरे पास...शायद मैं डरता था तुम्हारें असहन दर्द, पीड़ा, तड़प से इसलिए जाने की कुब्बत नहीं जुटा पाया पर आज जब चांद में तुम्हारा चेहरा देखा तो लगा तुम्हारा दर्द, पीड़ा और तड़प सब बड़ गए है। तुम्हारी बैचेन आंखें हमें खोजते-खोजते थक सी गई है। तुम्हारा शरीर नींद के आगोश में जाना चाहता है। पर आंखों में नींद नहीं है वह लाखों चेहरों में हमें तलाश करती है......

तुम जानती हो अम्मी तेरी वो बाते, हमारी वो छोटी-छोटी लड़ाईयां, शाम ढ़लते ही वह सुकून भरे दो पल, रात को परियों की कहानियां सब बहुत याद आ रही है। अम्मी तुम्हारी नाराजगी बेचैनी आंखों में झलक रही है.... वो तुम्हीं थी जिसने मुझे ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया, वो तुम्हीं थी जिसने मुझे हर मुसीबत से बचाया। पर आज जब तुम मुसीबत में थी मैं नहीं था तुम्हारे पास.... तुमने कुछ कहा भी नहीं....अम्मी तुम जानती हो... तुम्हारे आंचल में छिपकर सपने सजाना... ज़मीर को सुकून देने वाला तुम्हारी वो स्पर्श... चिलचिलाती धूप में तुम्हारे हाथों की ठंडक... तुमको छूकर आती हवा, कड़कती धूप में चैन.... बहुत कुछ याद आ रहा है अम्मी। तुम तो तकलीफ में भी मुस्कराती थी और हर गम को खुशी से सह जाती थी.....कभी मैंने तुम्हारें आंखों में आंसू की एक बुंद तक नहीं देखी है अम्मी.... पर उस रात जब मैं छत पर उस चांद को देख रहा था ना... जहां तुम नजर आती हो... मुझे वहां तुम्हारे आंखों में आंसू दिखें अम्मी यह आंसू मुझे बेचैन कर रहे है...तुम रोती भी हो मैंने कभी नहीं देखा था। पर आज तुम रो रही थी....

अम्मी तुम जानती हो तुम्हारे हाथों से खाने का निवाला खाना, तेरी ममता भरी डांट के बाद ढेर सारा दुलार... रात की गहराई में तेरी ममता की रोशनी...दर्द में भी चांद की चांदनी सी तेरी मुस्कुराहट… सब आज कहीं खोया सा लग रहा है। वह बिंदी भी जो तुम माथे पर चांद नूमा सजाए रखती थी वह मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रही है। वहां तुम्हारे चेहरे पर सिसकने का दर्द दिखाई दे रहा था अम्मी.... जब मैं न जुबां था ना तब भी तुम मेरी हर खामोशी को पहचान लेती थी पर मैं तुम्हारे इस चुभन को नहीं पहचान पाया। तुम जानती हो आज वह चांद मुझे कोस रहा था अम्मी वह मुझे हिकारत भरी नजरों से देख रहा था... वह मुझे बार-बार याद दिला रहा था कि जब मैं बीमार होता तो तुम रात-रात भर अपने आंचल में छुपाए रखती थी... पर आज जब तुमको हमारी जरूरत थी तो हम वहां नहीं थे...वह चांद आज मुझे बहुत कुछ कहना चाह रहा था पर शायद तुमने उसे बोलने से रोक दिया....वह चाहते हुए भी नहीं बोला बस मुझसे नजरे फेर ली... तुमने आज चांद को क्यों नहीं बोलने दिया उसे बोलने देती अम्मी....


पर तुमने बोलने नहीं दिया शायद... ख़ुदा ने ये सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख्शी है, कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं। जानती हो अम्मी आज मैं तुम्हें एक बात बताऊं... मैं जब भी घर से आता हूं तुम हिदायत देती हो न... नहाकर पूजा कर लेना फिर कुछ और काम करना। शुरू में तो बुरा लगता था लेकिन अब आदत हो गई है। हालांकि अब भी मैं मन्दिर वंदिर नहीं जाता हूं। तुमको पता है जब मैं छुट्टी पर घर आता हूं तो मैं नहा कर पूजा-वूजा नहीं करता... लगता है कि तुम्हारे घर पे रहते हुए पूजा करने की क्या जरूरत तुम तो हो ही ना। इस बार जब घर आऊंगा तो एक दो थप्पड़ जड़ देना आज तक तुमने सही से पीटाई भी तो नहीं की। अगर तुम्हारे मार से मुझे रोना आ जाए तो चुप मत कराना। बस थोड़ी देर चैन से रो लेने देना। बहुत साल के आंसू हैं बहुत देर तक निकलें शायद।