Saturday, 30 April 2016

Posted by Gautam singh Posted on 23:18 | No comments

डिग्री से क्या होगा?

जिस तरीके से डिग्री को लेकर आज-कल देश में बहस छिड़ी हुई है। उससे क्या होने वाला है। अभी गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पत्राचार कोर्स की डिग्री के बारे में जानकारी देने को कहा गया है। इससे क्या होगा? क्या डिग्री दिखाने से किसी को रोजगार मिल सकता है? अगर रोजगार मिल जाए तो मैं भी डिग्री दिखाने को तैयार हूं। दो ग्रेजुएशन और एक मास्टर की क्या इसेस मुझे रोजगार मिल जाएगा? इन तीन डिग्रियों में मैंने दो डिग्री लाया भी नहीं मुझे सर्टिफिकेट की कोई चिंता नहीं क्योंकि इस कोर्स से मुझे कुछ मिला नहीं बस समय और पैसों की बर्बादी के अलावे और मुझे उम्मीद भी नहीं है कि यह डिग्री मुझे रोजगार दिला भी सकती है। 


एक रिर्पोट के मुताबिक दुनिया के शीर्ष 10 फीसदी में एक लाख छात्र भारत से होते हैं। ऐसी स्थिति में लोग विश्वास करने के लिए तैयार ही नहीं होते कि भारत में लाखों लोग बिना किसी निपुणता के भी हैं। यह एक कटु सत्य है। हमारे देश में खराब शिक्षा के कई पहलू है। पहला प्राथमिक शिक्षा उसके बाद दूसरा पहलू उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा है। खासकर विशिष्टता वाले क्षेत्र में तो इसकी हालत तो और भी खराब है। एसोसिएशन ऑफ इंडिया चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) की हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एमबीए करने वालों में मात्र सात फीसदी लोग ही नौकरी के लायक हैं।

ऐसी ही तस्वीर आईटी इंडस्ट्री की है। नैस्कॉम के आंकड़ो के मुताबिक 90 फीसदी स्नातक और 75 फीसदी इंजीनियर प्रशिक्षण हासिल करने लायक नहीं हैं। ऐसे में एक बात तो सबके सामने है कि हमारी जितनी भी शैक्षणिक संस्थाएं है बेरोजगार भारतीय पैदा करती है। हमें शिक्षा व्यवस्था में बुहत सुधार की जरुरत है अगर हम मेक इन इंडिया को कामयाब बनाना चाहते है तो लोगों को ऐसे शिक्षा व्यवस्था से निकाल कर कारखानों में ट्रेनिंग के लिए भेजना होगा। नहीं तो ऐसे डिग्री दिखाने या देखने से कुछ नहीं होने वाला।

Wednesday, 6 April 2016

कहीं भी जाने की बात उठती तो पेट गुड़गुड़ाने लगता है। जब तक फ्लश की आवाज न सुन ले, जुतों के फीते बांधने का कोई फायदा नहीं होता। मेरे लिए घर जाने का मतलब अपने अपनों का साथ यकीन मानिए मेरी बहुत छोटी सी दुनिया है जिसमें बहुत से लोग नहीं हैं। कुछ ही लोग है। उन्हीं कुछ लोगों मे से कुछ के साथ मैं दिल्ली से घर आ रहा था। दिल्ली से गरीब रथ में अपने कुछ दोस्तो के संग चल पड़ा, तीन बैग पीठ पर लादे, जिमसें पहनने-ओढने, लेपटॉप, पढ़ने-लिखने की आवश्यक सामग्री साथ में थी। उन दोस्तों में से एक एसी भी दोस्त थी जिसके पास टिकट नहीं था वह बिना टिकट ट्रेन में आ गई थी। संयोग से हम लोगों की सीट दो बोगियों में थी। जी-9 और जी-3 दोनों के बीच में छह बोगियों का अंतर था। मेरा सीट जी-9 में था,और बिना टिकट वाली दोस्त भी मेरे ही सीट पर बैठी थी। कुछ देर बाद टीटी आए और टिकट चेक करने लगे मुझे लगा अब यह लड़की टीटी के गिरफ्त में आएंगी अगर टीटी पकड़ लिया तो क्या होगा। 

मैं इस सोच में डुबा कोई तरकीब निकाल रहा था कि तभी टीटी आ धमका और टिकट देखते हुए लड़की से पुछा आप का टिकट मैं कुछ बोलता उससे पहले ही लड़की ने तपाक से जबाब दिया मेरा जी-3 में है मैं यहां दोस्तों के पास आई हूं मिलने को ये सुनते ही टीटी आगे निकल गया। फिर उसने मुझसे कहा देखा आपने मैंने कैसे टीटी को चलता किया। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलू क्योंकि एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मुझे टीटी का साथ देना चाहिए था। उसके साथ एक दोस्त होने के नाते  दोस्त का साथ देना चाहिए था। मैं इसी उपापोह में मैं पूरी रात जगता रहा। वह बार-बार खाने के लिए मुझे बोलती पर मुझे भुख ही नहीं थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैंने सही किया या गलत। वह अपने मस्ती में मस्त थी। सोने का समय होते ही मैंने उसको अपना सीट उसे सोने को दे दिया, और मैं दूसरे दोस्त के सीट पर आ कर उसके साथ सिफ्ट हो गया। मैं पूरे रात उसके चेहरे को देखता रहा उसके चेहरे पर जरा भी डर का कोई हाव-भाव नहीं था।

होली का समय था इसलिए ट्रेन में रस भी ज्यादा थी मैं पूरे रात जग रहा था मेरे बगल वाली सीट पर भी जो तीन बन्दे बैटे थे वह आपस में बात कर रहे थे कि वह भी बिना टीकट यात्रा कर रहे है।  मैं पूरी रात उन लोगों की बात सुनते रहा। वह लोग भी हमारे तरह छात्र ही थे। पर पूरे रात उनलोगों ने जो अश्लिलता का झलक दिखाया मुझे यह सोचने पर मजबुर कर दिया कि यही हमारा सभ्यता और संस्कृति है। खेर इन सारी बातों के अलावे एक बात अच्छी थी की हमारे बगल वाले सीट पर एक परिवार सवार थे। दो छोटे-छोटे बच्चे, दो औरते और एक लड़की। पढ़ी-लिखी लड़की जब वह ट्रेन में आई तो अंग्रेजी में ही बात कर रही थी। शायद वह यह दिखाना चाह रही थी कि वह पढ़ी-लिखी है। पर वह जो बोल रही थी उसमें बहुत सारी गलतियां थी। वह अंग्रेजी में बोलती जा रही थी। शायद वह यह भूल गई थी कि वह जिस ट्रेन में सवार है वह बिहार जाती है न कि केरल, बिहार के लोग वैसे भी अंग्रेजी समझते कहां है। कुछ देर उलटा-पुलटा अंग्रेजी बोलने के बाद वह फिर पूरे बिहारी टोन में आ गई। 22 घंटे का सफर था। जो हमलोगों को साथ तय करना था।

 इसलिए बात चीत होना लाजमी थी। कुछ दूरी तय करने के बाद हमलोगों में बातचीत शुरु हुई। तो पता चला कि वह पूरे परिवार दिल्ली ही रहते है, और होली पर घर जा रही  है। लड़की ने बताया वह बी-टेक फाइनल इयर की छात्रा है। अब हमलोग एक परिवार के जैसे हो गए थे। खाना-पीना साथ होने लगा। कुछ दूरी ओर बिताने के बाद मैंने उस लड़की से पूछ ही लिया कि आप अंग्रेजी में क्यों बात कर रही थी क्या आप को पता नहीं है यह ट्रेन बिहार जाती है केरल नहीं, उसने बड़े ही शालिनता से जबाब दिया मुझे पता है यह ट्रेन बिहार ही जाती है। पर तोडा अंग्रेजी बोलने के बाद सब लोग इज्जत के नजर से देखने लगते है। तभी मुझे वरिष्ट्र कवि अशोक वाजपेई जी की बात याद आई जो उनको सुनते हुए उन्होंने कहा था। हम हिन्दी भाषी लोगों का सबसे बड़ा विडंबना है कि हम लोग हिन्दी नहीं बोलना चाहते है भले ही गलत अंग्रेजी ही क्यों न बोले। मैं मन ही मुस्काराया और अपने आप से बोला वाह रे अंग्रेज आप तो चले गए पर हमारे दिलो-दिमाग पर अंग्रेजी का किड़ा छोड़ गए।

रात काफी हो चुकी थी सब सो गए पर मुझे निंद नहीं आ रही थी। उसके पीछे का कारण कई थे। एक तो यह कि मैंने एक ऐसे व्यक्ति की मदद की जो गलत था। दूसरा यह की हमरा समाज कहां जा रहा है और तीसरा यह की हम सही हिन्दी के बजाय गलत अंग्रेजी क्यों बोलते है। इस सारी बातों का जबाब मैं खुद ही अपने अंदर खोज रहा था। इन सारी बातों को सोचते हुए कब सुबह हो गई मुझे पता ही नहीं चला। तभी मेरे बिना टिकट वाली दोस्त ने अवाज दी आरा आते ही मुझे जगा दिजिएगा मैंने हाथ हिला कर उसे हां में जवाब दिया। आरा आया मैं उसका समान लिए ट्रेन से बाहर निकला वहां उसके घर से उसे लेने लोग आए थे। वहां इसका व्यवहार ऐसा था जैसे वह मुझे पहचाल ही नहीं रही हो।

वो चली गई मैं ट्रेन में वापस आ गया ट्रेन वहां से चल दी। मैं फिर से सोच में डुब गया कि क्या यही दोस्ती है। कुछ देर खोया रहने के बाद बगल बाली लड़की ने पूछा हम गांगा नहीं पार कर गए क्या? मेरी तंद्रा टूटी और फिर बात-चीत में मश्गुल हो गया। 6-7 घंटों के सफर के बाद हम अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गए। मैं भागलपुर से गोड्डा के लिए निकल गया। भागलपुर से गोड्डा तक की दूरी तो 62 किलोमीटर है जो 2 घंटे में पूरा किया जा सकता है। पर रोड़ ऐसा की यह पता लगाना मुस्किल हो जाए कि रोड़ में गड्डा है या गड्डे में रोड़ मुझे भागलपुर से गोड्डा पहुंचने में चार घंटे लगे। मैं घर पहुंचा पर मेरे दिलो-दिमाग में कई सवाल है जिसका जवाब मैं अपने आप से खोज रहा हूं।

Saturday, 12 September 2015

मैं हिंदी हूं। स्तब्ध हूं। इसी देश की हूं। बहुत दुखी हूं। समझ नहीं आ रहा क्या करूं? क्योंकि समय आ चला है रस्मी सरकारी याद करने का वह दिन, एक और हिन्दी दिवस मनाने का सितंबर महीने शुरू होते ही लोग अक्सर यह पूछते मिल जाते है कि हिंदी आगे कैसे बढ़े, और आज ही के दिन हिंदी के नाम पर कई सारे पाखंड होंगे। कई पुरस्कारों का ऐलान भी होंगा। अलग-अलग जगहों पर हिन्दी की दुर्दशा पर विभिन्न प्रकार के सम्मेलन भी किए जाएंगे।

पर समझ नहीं आता कहां से शुरू करू? कैसे शुरू करूं मैं हिंदी हूं जिसकी पहचान इस देश के कण-कण से है।इसकी माटी से है। इसकी सुगंध से है। पर आज अपने ही आंगन में बेज्जत कर दी जाती हूं। मन दुखता है कि मैं इसी देश की हूं। फिर मुझे क्यों ऐसे उखाड़ फेक दिया जा रहा है। मैं अपनों में ही क्यों बेज्जत हो रही हूं। मुझे आज क्यों बताना पड़ रहा है कि मैं भारत के संविधान के अनुच्छेद-343 में लिखित हूं जहां मुझे राजभाषा का दर्जा प्राप्ता है। मैं भारत के 70 फीसदी गांवों के गलियों में महकती हूं। भारतीय सिनेमा से लेकर टीवी सीरियल तक मैं ही तो हूं फिर भी मुझे डर लगता है अपनों से अपने बच्चों से जो मुझे ही भुलने लगे है। मुझे नहीं पता की मैं अपने ही घर में कब से इतना बेज्जत हो रही हूं। लोग मुझे गवार समझनें लगे है।


लोगों को लगता है कि मुझसे दोस्ती गवारों की पहचान है, जो लोग कल तक मुझसे दोस्ती कर के फुले नहीं समाते थे वह लोग आज मुझसे ही कन्नी काट रहे है। उन्हें लगता है कि मुझसे बात करने पर उनका समाज में रूतबे में कमी आ जीती है। आज मैं अपनों की बेवाफाई से ही तरस्त हूं। दम घुटने लगा है मेरा अपने ही देश में, कल तक जो मुझे गवार समझते थे। वह मुझे अब अपना रहें हैं। उन्हें अब मुझ में बहुत खुबियां नजर आती है। कल तक वो अपने चौखट पर आने नहीं देते थे, आज वह मुझे सीने से लगा रहे है, और अपने ही बच्चे मुझे घर से निकाल रहे है। विश्वास करो मेरा कि मैं दिखावे की भाषा नहीं हूं, मैं झगड़ों की भाषा भी नहीं हूं। मैंने अपने अस्तित्व से लेकर आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आंचल से बांध कर हर दिन एक नया रूप धारण किया है। फिर भी क्यों तुम लोग मुझे उखाड़ फेकने पर तुले हो, यकीन मानो मेरे साथ तुम लोग महफूज हो मैं किसी को छती नहीं पहुंचाती मूझे भी जीनों दो क्यों मुझे उजाड़ने पर तुले हो। हमारे संविधान के अनुच्छेद-351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वह मुझे बढ़ाएं, लेकिन यह कैसी विडंबना है कि मेरे ही देश के बडे-बडे विश्वविद्यालय में मुझे नहीं पढ़ाया जाता है मैं अपने ही देश के विश्वविद्यालयों में मैं नोकरानी बन गई हूं और वह पटरानी यह सिलसिला पिछले सात दशकों से लगातार जारी है और न जाने कब तक जारी रहे। मेरा मन मथने लगा है अब एक तरफ जहां मैं दुनिया में सबसे ज्यादा चाहने वालों में दूसरे नंबर पर हूं, लेकिन अपने ही घर में बेगानों की तरह बर्ताव किया जा रहा है। आज लोग अपने बच्चों को मेरे पास भटकने भी नहीं देते है। मुझे कितना दुख होता है मैं किसे कहूं कोई मेरा सुनने वाला नहीं है।

अब आलम यह है कि मैं जहां सबसे ज्यादा पसंद की जाती थी वही के लोग मुझे देख मुह मोड़ने लगे है। लोग मुझसे ऐसे दुरी बनाने लगे है जैसे मैं कोई संक्रमक बीमारी हूं। लोग मुझे देख कर भागते है मैं चिखती हूं चिल्लती हूं, लेकिन मेरा यह चीख मेरा यह दर्द किसी के अंदर रहम का चिराग नहीं जलाता। मैं अपने जगह पर रेंगती हूं सिसकते रहती हूं पर कोई मेरा सुद लेने नहीं आता। मेरे अपने ही बच्चे मुझसे नफरत करने लगे है कभी साउथ के तो कभी महराष्ट्र के मुझसे इतना नफरत क्यो? मैं किसी को मारती नहीं, डराती नहीं, मैं किसी पर चिखती नहीं, चिल्लती नहीं फिर मुझे ही उखाडने पर क्यों लगे हो मैनें तो कईयों को अपने अंदर बसाया है चाहे वह फारसी, अरबी, उर्दू से लेकर 'आधुनिक बाला' अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है। बरसों से तुम लोगों का मनोरंजन कर रही हूं तुम्हें जिला रही हूं यकिन न आए तो फिल्म इंडस्ट्री वालों से पूछ कर देख लो क्या मेरे बिना उसका अस्तित्व रह सकेगा? यकीन मानों मुझे अपने घर में रहने दो मैं तुम लोगों को छती नहीं बल्की सीने से लगाउंगी और दुनिया में मैं भी अपना चमक दिखाउंगी। 

Friday, 28 August 2015



सावन के रिमझिम मौसम के साथ ही भारत में त्योहारों की रंग-बिरंगी श्रृंखला आरंभ हो जाती है। श्रावण मास की पूर्णिमा को भाई-बहन के खूबसूरत रिश्ते की झलक देने वाला रक्षाबंधन का त्यौहार, हिन्दू धर्म के मुख्य पर्वों में से एक है। यह त्योहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाए रखने का बहाना होता हैं। यू तो हर रिश्ते की महकती पहचान होती है, लेकिन भाई-बहन का रिश्ता भावभीना अहसास जगाता है। यह सुरक्षा और विश्वास के वादे का पर्व है। यह रेशमी रिश्ते की पवित्रता का प्रतीक है।

भाई और बहन का रिश्ता मिश्री की तरह मीठा और मखमल की तरह मुलायम होता है। इस रिश्ते में विविध उतार-चढ़ांव बहुत गहरे अहसास के साथ हमेशा ताजातरीन और जीवंत बना होता है मन की किसी कच्चे कोने में बचपन से लेकर जवानी तक की, स्कूल से लेकर बहन के विदा होने तक की, और एक दूजे से लड़ने से लेकर एक दूजे के लिए लड़ने तक की यादे परत दर परत रखी होती है। बीते हुए बचपन की झूमती हुई यादे भाई-बहन की आंखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलात है। रक्षाबंधन भाई बहन के प्यार का त्यौहार है भारत में यदि आज भी संवेदना, अनुभूति, अत्मीयता, आस्था और अनुराग बरकरार है तो इसकी पृष्ठभूमि में इन त्योहारों का बहुत बड़ा योगदान है। यह भाई बहन को स्नेह की डोर से बांधने वाला त्योहार है। रक्षाबंधन पर्व बहन द्वारा भाई की कलाई में राखी बांधने का त्यौहार भर नहीं है, यह एक कोख से उत्पन्न होने वाले भाई की मंगलकामना करते हुए बहन द्वारा रक्षा सूत्र बांधकर उसके सतत् स्नेह और प्यार की निर्बाध आकांक्षा भी है।

इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्योहार की शुरुआत 6 हजार साल पहले माना जाता है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। कहा जाता है कि कृष्ण भगवान ने जब राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की उंगली से खून बह रहा था, इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की उंगली में बांध दी, जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। उस दिन सावन पूर्णिमा की तिथि थी। कहा जाता है तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है।

Sunday, 9 August 2015

आज से ठीक 70 साल पहले उस दिन कैलेण्डर पर तारिख थी छह अगस्त 1945 जापान के हिरोशिमा का आसमान साफ था। वहां के लोगों के लिए उस दिन की सुबह भी वैसे ही थी। जैसे रोज हुआ करता था। लोग अपने रोजमर्रा के कामों को निपटाने में लगे हुए थे किसी को इस बात की भनक तक न थी कि वो बस चंद पलों के ही मेहमान हैं, यह उनकी आखरी सुबह है। पर अभी इतिहास लिखा जाना बाकी था। ऐसा इतिहास जिसकी विभीषिका सुन कर लोगों के सालों-साल तक रोंगटे खड़े कर देने वाली हो। इसकी इबारत तो तैयार थी पर किसी को कानो-कान पता न था। अभी लोखों जान जानी बाकी थी अभी बाकी थी आग की लपटे, धुआं का बादल, गिरते-पड़ते बच्चे, बुड़े, अभी बाकी था मौत का भीशन तांडव, चिखते-चिल्लाते लोग, लाशों का ढ़ेर, खुन की नदीयां और शरीर के चित्थड़े जिसे देख कर उस भगवान की भी रुह कांप जाए जिसने हमें बनाया। जिसकी तैयारी अमेरिका के राष्ट्रपति ने बहुत ही गोपनिय अभियान के तहत किया। जापान पर परमाणु बम गिराए जाने की।

कैसे कोई भुल सकता है उस काले दिन को। उस विभीषिका को। वह दिन, वो महीना, वह साल इसके बाद ही तो हीरोशिमा विश्व के मान चित्र पर आया था। अगस्त का महिना अभी शुरू ही तो हुआ था। महीने की छटी रात कहलें या सुबह 2 बजकर 45 मिनट जब अमेरीकी वायुसेना के बमवर्षक बी-29 'एनोला गे' ने उड़ान भरी और दिशा थी पश्चिम की ओर, लक्ष्य था जापान के हिरोशिमा... बम का नाम था 'लिटिल बॉय' ठीक सुबह के सवा आठ बजे थे। जब 20 हज़ार टन टीएनटी क्षमता का 'एनोल गे' ने लिटिल बॉय को आसमान से गिराया बस चंद मिनटों में ही धुएं के बादल और फैलती हुई आग ने पुरे शहर को अपने चपेट में लिया, और हिरोशिमा में सब कुछ निर्जन और उजाड़-वीरान बना दिया। लोखों लोग उस दिन मारे गए और न जाने कितने उसके बाद भी कैंसर जैसे बिमारी के कारण तिल-तिल जान गवांते रहे। कई इस हाल में रहे जिसकी सांसे तो चल रही हैं लेकिन वे जीवित नहीं थे।

कैलेण्डर मैं एक बार फिर तारीख और लक्ष्य बदल महीना और साल वही था। इस बार तारीख थी 9 अगस्त लक्ष्य था नागासाकी आठ अगस्त की रात बीत चुकी थी, अमीरका के बमवर्षक बी-29 सुपरफोर्ट्रेस बॉक्स पर बम लद चुका था। भीमकाय बम का वजन था 4050 किलो। बम का नाम विंस्टन चर्चिल के संदर्भ में 'फैट मैन' रखा गया। घड़ी में समय था 11 बजकर 2 मिनट जब फैट मैन को नागासाकी पर गिराया गया। बम के गिरते ही आग की भीमकाय गोला तेजी से सारे शहर को निगल गया। आस पास के दायरे में मौजूद कोई भी व्यक्ति यह जान ही नहीं पाया कि आखिर हुआ क्या है क्योंकि वो इसका आभास होने से पहले ही मर चुके थे। देखते ही देखते जापान का दूसरा शहर भी तबाह हो चुका था। लाशों के ढ़ेर लग चुके थे जो लोग बच गए थे वो जान बचाने के लिए बदहवास लोशों के ऊपर से भाग रहे थे। यू तो इस हादसे को 70 बरस बीत गए, लेकिन 70 साल बीत जाने के बाद भी उस परमाणु हमले की विभीषिका आज भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

Wednesday, 5 August 2015

याकूब मेमन को फांसी मिल चुकी है। उसके फांसी के समर्थक और विरोधी दोनों खेमों को पता है कि याकूब मर चुका है और अब वह कभी लौट कर नहीं आएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फांसी से अपराध खत्म हो जाएगा? एक की फांसी आनेवाले किसी इंसान में अपराधी मानसिकता को पनपने से रोक देगी? इस बात का कोई सबूत नहीं है हमारे पास। तो ऐसे में क्यों न फांसी की नृशंसता और अमानवीतया के कारण पूरी तरह फांसी की प्रथा को ही फांसी दे दी जाए। क्योंकि फांसी अस्वाभाविक मौत है। इंसान के अंदर पूरे का पूरा जीवन और उस जीवन की भरी पूरी संभावनाएं होने के बावजूद फांसी एक मिनट में किसी की जिंदगी को बीती चीज बना देती है। तो ऐसे में फांसी को फांसी दे देने में क्या हर्ज है। जिस न्याय के तकाजे पर याकूब को फांसी पर लटकाया गया उस न्याय पर ही सवाल खड़े हो गए।


मुझे नहीं पता याकूब दोषी था या नहीं लेकिन अगर उसे देश के उच्चतम न्यायालय ने फांसी दिया तो सबूत कही न कही उसके खिलाफ रहा होगा। लेकिन  जिस तरीके से याकूब के फांसी के समर्थकों ने फांसी के विरोध में आए लोगों पर हमला किया उस से आहत होकर याकूब के वकिल आनंद ग्रोवर ने बेहद भावुकता में कहा कि अगर लोग यह उम्मीद करते हैं कि किसी वकील को किसी अपराधी या आतंकी ठहरा दिए गए व्यक्ति की पैरवी नहीं करनी चाहिए, तो फिर इसके लिए देश में तानाशाही चाहिए। उन्होंने कहा कि वह उम्मीद करते हैं कि जल्द ही या फिर भविष्य में कभी कोर्ट को अपनी भूल का एहसास होगा और वह उसे सुधारने की कोशिश करेगी। ऐसे में सवाल यह है कि कोर्ट कैसे अपने भूल को सुधार सकता है, क्योंकि मरा हुआ आदमी कभी जिंदा नहीं हो सकता अगर फांसी देना भुल है तो उस भुल को फिर कभी नहीं सुधारा जा सकता यह बात खुद ग्रोवर भी जानते है। कुछ तबकों का आरोप है कि याकूब के अपराध को भूलकर उसका समर्थन करने वाले मुसलमान नागरिक नहीं, मज़हबी है। ऐसे आरोप लगाते हुए वो भूल गए कि जो लोग याकूब का फांसी रुकवाने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखे थे। या 29 जुलाई की आधी रात सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के घर गए थे वो भी हिंदु ही थे। इसमें कोई मुस्लिम नहीं था।


ऐसे में यहां सवाल विश्वास और अविश्वास का है। यहां सवाल मन के अंदर बैठी असुरक्षा का है। यहां सवाल लोकतंत्र के कानून व्यवस्था से एक विशेष वर्ग का भरोसा उठ जाने का है। अदालत को इसलिए भी सोचना चाहिए था कि विरोध की आवाजों में उसके अपने लोगों की आवाजें भी शामिल थी। सुप्रीम के रिटायर्ड जज जस्टिस बेदी ने लिखा था कि कोर्ट को रॉ अधिकारी बी. रमन की चिट्ठी को देखते हुए नए सीरे से फैसले को फिर से गढ़ना चाहिए। उस चिट्ठी के अनुसार भारत सरकार ने याकूब के साथ नरमी बरतने का वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिस तरीके से फांसी को लेकर लगातर विरोध के स्वर उठ रहे है, ऐसे में क्यों न फांसी की सजा को ही खत्म कर दिया जाए। दुनिया के 130 देशों में फांसी की सजा तो खत्म हो ही चुका है तो क्यों न भारत में खत्म कर दे। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी कहा ये कहां का न्याय है कि मौत के बदले मौत, भाजपा के युवा नेता वरुण गांधी ने फांसी के विरोध में तो यहां तक कह दिया की किसी सभ्य देश में जल्लाद का होना लज्जा की बात है। जब इतना सवाल फांसी को लेकर उठ रहे हैं तो फांसी को फांसी दे देने में क्या दिक्कत है। याकूब ने जांच पक्रिया में न केवल सहयोग किया बल्कि अपनी जान जोखिम में डालकर आईएसआई, टाइगर मेमन और दाऊद के खिलाफ कई अहम सबूत एजेंसियों को मुहैया कराए जो याकूब के पक्ष में जाता है। उसने अपने जिंदगी के 21 साल जेल के अंदर बिताए, कितना यकीन रहा होगा उसे देश के न्याय प्रक्रिया में देश के कानून पर? क्या सिर्फ उसका भरोसा टुटा? नहीं उसके साथ कइयों का भरोसा टूटा। भारत के कानून ने बताया कि एक इंसान की तरह वह भी यकीन रखता है। आंख के बदले आंख में...

Wednesday, 8 July 2015

जित तरीके से व्यापमं घोटाले में एक के बाद एक 47 मौतें हुई है। जिसमें कुछ मौतें ज़हरीली शराब पी लेने से, कुछ मौतें दवा के रिएक्शन से, कुछ मौतें बीमारी से और कुछ मौतों की वजह का पता नहीं ये सब ऐसे लग रहा है जैसे कोई पढ़ने वाला जासूसी नावेल हो जिसमें कुछ पता नहीं चलता की आगे क्या होगा ? वैसे ही व्यापमं घोटाले में हो रहा है। व्यापमं अपने व्यापक रूप में आ कर खूनी तांडव मचा रहा है, और यह दिनों दिन आदमखोर होते जा रहा है। यह देखते ही देखते इससे जुड़े व्यक्तियों की सांसे रोक देता है। इसमें में जो भी हाथ डालता है वह वापस नहीं आता है। वह व्यापमं का शिकार हो जाता है।

आखिर कितना व्यापक है यह व्यापमं जिसने इतने लोगों को मौत के घाट उतार दिए। ऐसे में लोगों के सामने सवाल उठनी लाजमी है कि क्या केवल संयोगवश यह संभव है कि एक ही घोटाले से जुड़े इतने लोग असमय कुदरती मौत के शिकार हो जाएं ? चूंकि अभी तक किसी की हत्या होने का कोई प्रमाण नहीं है, ऐसे में इन मौतों को लेकर किसी पर अंगुली उठाना अनुचित होगा, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार और भाजपा को इसके प्रति आगाह रहना होगा कि लोग धारणा बनाने के लिए ठोस सबूत का इंतजार नहीं करते। खासतौर पर जब व्यापक रूप से फैले घपले की पृष्ठभूमि में लोगों के मरने की सनसनीखेज घटनाएं सामने आने लगे, तो ज़ुबानी चर्चाएं जनमानस में सच की तरह बैठने लगती हैं। अब जितना इस मामले को दबाने की कोशिश होगी, उतना ही यह उभर कर आएगा। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों इसे राजनीतिक समस्या मानकर चल रही हैं, जबकि यह केस देश की सड़ती प्रशासनिक व्यवस्था और भ्रष्ट राजनीति की पोल खोल रहा है।

ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है लेकिन इन सारे सवालों के बाद भी सरकार कुछ करने की जहमत नहीं उठा रही है। जिस तरह सन 2010 में टू-जी मामले ने यूपीए सरकार की अलोकप्रियता की बुनियाद डाली थी, लगभग उसी तरह मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बनते जा रही है। इस घोटाले में व्यक्तिगत रूप से शिवराज सिंह चौहान भी घिरे हैं। सरकार और विपक्षी पार्टियों इस मुद्दे पर कुछ ठोस कदम उठाने के बजाय एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने में लगी है। क्योंकि उनको पता है। व्यापमं की ये लपटे न जाने किस-किस को अपने चपेटे में ले। इसकी लौ मध्यप्रदेश के मंत्रियों से होते हुए अब मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी है।

बेशक घोटाले की आँच भाजपा सरकार पर आएगी, पर इसमें कांग्रेस से जुड़े लोग भी शामिल होगें। व्यापम घोटाले ने शिक्षा, खासकर व्यावसायिक शिक्षा और प्रतियोगिता परीक्षाओं में गहरे तक बैठी बेईमानी का पर्दाफाश किया है। यह राष्ट्रीय प्रतिभा के साथ विश्वासघात है और खुल्लम-खुल्ला अंधेर है। ऐसे मामले केवल मध्य प्रदेश तक सीमित भी नहीं हैं। सत्ताधारियों का यह देश-व्यापी अंधेर है, और इसका जल्द से जल्द निपटारा होना चाहिए। ऐसे में क्या सरकार व्यापमं के व्यापक रूप को रोकने के लिए कोइ व्यापक रूख अपनाएंगी। या व्यापमं यू ही खूनी तांडव मचाते हुए और कितने लोगों को अपने आगोष में सुनाएगी। या इसके पीछे हो रहे तांडव का पर्दा फास करके सच्चाई से आम लोगों को रू-ब-रू करायेंगी ये आने वाले कुछ दिनों में पता चल पाएगा।