Saturday, 16 August 2014

Posted by Gautam singh Posted on 06:19 | No comments

वो एक ख्वाब थी

वो एक ख्वाब थी, एहसास थी, हुस्न का इतिहास थी, जिसकी आंखों में कशिश थी।  होठों पर कंपन था, जुल्फों में हरकत थी। एक नया रंग एक नया रूप जिसे कोई छु न सके। अपनी दिलकश अदाओं से रूपहले पर्दे को रोशन करने वाली महान अदाकारा मधुबाला जिनका जन्म दिल्ली शहर के मध्य वर्गीय मुस्लिम परिवार में 14 फरवरी 1933 को हुआ था। इनका असली नाम मुमताज बेगम देहलवी था। इनके पिता अताउल्ला खान दिल्ली में एक कोचमेंन के रूप में कार्य करते थे। मधुबाला के जन्म के कुछ दिनों बाद उनका पूरा परिवार दिल्ली से मुंम्बई आ गया। मधुबाला बचपन के दिनों से ही अभिनेत्री बनने का सपने देखा करती थी। यही कारण रहा कि, 1942 में मधुबाला को बतौर बाल कलाकार बेबी मुमताज के नाम से फिल्म ‘बसंत‘ में काम करने का मौका मिला।

निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1947 में आई फिल्म नीलकमल से मधुबाला ने बतौर अभिनेत्री के रूप में अभिनय शरू किया। लेकिन उनको पहचान 1949 में बाँम्बे टाकीज के बैनर तले बनी फिल्म महल से मिली। इस फिल्म में फिल्माया गया गीत ‘आऐगा आने वाला........‘जिसे सिने दर्शक आज तक नहीं भुल पाये है। 1950 से 1957 तक का वक्त मधुवाला के सिने कैरियर के लिये बुरा साबित हुआ। इस दौरान उनकी कई फिल्में बाँक्स आँफिस पर असफल रही, लेकिन 1958 में उनकी प्रदर्शित फिल्म फागुन, हावडा ब्रिज, कालापानी और चलती का नाम गाड़ी की सफलता ने एक बार फिर मधुबाला को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। जहां एक ओर फिल्म हावड़ाब्रिज में क्लब डांसर की भूमिका अदा कर दर्षकों का मन मौहा। तो वहीं दूसरी ओर फिल्म चलती का नाम गाड़ी में हास्य से भरे अभिनय से दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया।

पचास के दशक में ही मधुबाला को यह अहसास हुआ की वह हृदय की बीमारी से ग्रसित हो चुकी है। इस दौरान उनकी कई फिल्में निर्माण के दौर से गुजर रहीं थी। जिसके कारन मधुबाला को लगा यदि उनकी बिमारी के बारे में फिल्म जगत को पता चल जाएगा तो इससे फिल्म निर्माता को नुकसान होगा। इसलिये उन्होंने यह बात किसी से नहीं बताई। के आँसिफ की फिल्म मुगले आजम के निर्माण में लगभग दस साल लगे। इस दौरान मधुबाला की तबीयत भी काफी खराब रहने लगा, इसके वाबजूद भी फिल्म की शूटिंग जारी रखी क्योंकी मधुबाला का मानना था कि अनारकली के किरदार को निभाने का मौका बार बार नहीं मिलता। जब 1960 में मुगले आजम प्रदर्शित हुयी तो फिल्म में मधुबाला के अभिनय को देख दर्शक मन मुग्घ हो गए। लेकिन बदकिस्तमती से इस फिल्म के लिये मधुबाला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरूस्कार नहीं मिला लेकिन सिने दर्शकों का आज भी मानना है की मधुबाला को उस फिल्म के लिये फिल्म फेयर आवार्ड मिलना चाहिये था।


मधुबाला के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी  अभिनेता दिलीप कुमार के साथ काफी पसंद की गई। बी. आर. चोपडा की फिल्म नया दौर में पहले दिलीप कुमार के साथ नायिका की भूमिका में मधुबाला का चयन किया गया और इस फिल्म की शूटिंग मुंबई में की जानी थी । बाद में निर्माता को लगा फिल्म की शूटिंग भोपाल में भी करनी जरूरी है। लेकिन मधुबाला के पिता ने मधुवाला को मुंबई से बाहर जाने की इजाजत नहीं दी। उन्हें लगा की मुंबई से बाहर जाने पर मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच का प्यार और परवान चढ़ेगा और वे इसके लिये राजी नही थे। बाद में बी. आर. चोपडा को इस फिल्म में मधुबाला की जगह पर वैयजंतीमाला को लेना पड़ा। मधुबाला के पिता अताउल्ला खान बाद में इस मामले को अदालत ले गये और इसके बाद उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ काम करने पर रोक लगा दी। और फिर दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी अलग हो गई।

चलती का नाम गाड़ी और झुमरू के निर्माण के दौरान ही मधुबाला किशोर कुमार के काफी करीब आ गयी थी। साठ के दशक में मधुबाला की तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी जिसके कारन उन्होंने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया था। जब मधुबाला लंदन इलाज कराने के लिये जाने वाली थी तो मधुबाला के पिता ने किशोर कुमार को सुचित किया कि शादी लंदन से आने के बाद ही हो पाएगी, लेकिन मधुबाला को यह लग रहा था, कि शायद लंदन में होने वाली आपरेशन के बाद जिंदा न बचे, यह बात उन्होंने किशोर कुमार को बताइ इसके बाद किशोर कुमार ने मधुबाला की इच्छा को पूरा करने के लिये शादी कर लिया। शादी के बाद मधुबाला की तबीयत और ज्यादा खराब रहने लगी हालांकि इस बीच ‘पासपोर्ट, झुमरू, व्बाँय फ्रेंड, हाफ टिकट और शराबी जैसे कुछ फिल्में प्रदर्शित हुई। अपनी दिलकष अदाओं से लगभग दो दषक सिने प्रेमियों को मदहोश करने वाली महान अभिनेत्री मधुबाला 23 फरवरी 1969 को इस दुनियां को अलविदा कह गई।


हिन्दुस्तान सूफी संगीतों का केन्द्र रहा है। यहां पर दरगाहों से लेकर फिल्म इंडस्ट्री और पांच सितारा होटलों तक सूफी संगीत की मघुर धूने सुनने को मिलती है। वैसे तो सूफी संगीत अंदर से महसूस करने की चीज होती है। लेकिन वर्तमान परिद्वश्य में दिखने और बिकने की चीज बन गई है। सूफी लिवास, सूफी आवाज, सूफीयाना चेहरे, सूफी गीत, सूफी संगीत और न जाने क्या-क्या ? ये हिन्दुस्तानी सूफी गायक वो पाकिस्तानी सूफी गायक। लेकिन सच्चाई तो यह है, कि इस सूफी शब्द ने एक नए किस्म की सांस्कृतिक भ्रम के मोड़ पर ला कर सबको खड़ा कर दिया है। हमारे यहां के लोग सूफी संगीत को ज्यादा पसंद करते है। वहीं हमारे देश के ज्यादातर लोगों में यह भ्रम है, कि यह सूफी संगीत की धारा पाकिस्तान से चलकर हिन्दुस्तान को आती है। पर लोगों को यह पता नहीं कि अजमेर शरीफ और दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह जहां से ही दुनियां भर के लोगों के बीच सूफी संगीत को भिगोती जाती रही है। शायद लोगों को यह भी पता नहीं कि सूफी संगीत की असली जड़े और उनकी नींव हिन्दुस्तान से ही जुड़ी है। भले ही आज पाकिस्तान में नजाकत अली खान, नुसरत फतेह अली खान, सलामत अली खान और आबिदा परविन जैसे नामी गिरामी सूफी गायक मौहजूद हो, लेकिन सच तो यह है, कि ये सारे लोग हिन्दुस्तान के थे। जो विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए थे।

 वैसे तो सूफी को गाने और समझने वालों के लिए कोई सरहद, मजहब या देश की सीमा नहीं होती । लेकिन वत्तमान समय में हिन्दुस्तान में ही हिन्दुस्तानी सूफी गायक बेगाने हो गए है। आज यहां की आलम यह है कि पाकिस्तान से गायक आकर गा रहे है, और अपने ही देश के सूफी गायक बेगाने हो कर भटक रहे है। फिल्म इंडस्ट्री से लेकर पांच सितारा होटल या फिर किसी दरगाहों पर गाने के लिए  पाकिस्तान से गायकों को बुलाया जाता रहा है, और अपने ही देश के सूफी गायकों को नजर-अंदाज कर दिया जाता रहा है। वहीं अगर हम आकडे देखे तो पाकिस्तान में सबसे ज्यादा हिन्दुस्तानी सूफी गायकों को बुलाया जाता रहा है। इसके पीछे का कारण यह रहा है, कि बाहर की चीजें हमेशा ही सब को लुभाती है। सच्चाई तो यह है, कि आज हमारे देश में व्यावसायिकता ज्यादा हावी होती जा रही है। लेकिन अगर आज भी यहां की मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री सूफी कलाकारों को प्रमोट करे तो यहां भी बरकत सिद्वु वडाली ब्रदर्स जैसे गायक आज भी देश में है जो बेहतरीन सूफी कलाम गाते है। फिल्म इंडिस्ट्री हो या पांच सितारा होटल उन सबों को चाहिए की हिन्दुस्तानी सूफी गायकों की हौसला अफजाई करे न की नजर अंदाज करे। कहते है 'न  दरिया देखे मगर समंदर नहीं देखा पर तुने कभी झाककर अपने अंदर नहीं देखा।



यह लेख मशहूर सूफी गायक हंस राज हंस के सक्षात्कार को सुनने के बाद लिखा गया है।

Monday, 2 December 2013

Posted by Gautam singh Posted on 04:55 | No comments

ख्वाहिशें... छोटू की

होठों की ये मासूम मुसकराहट आंखों मे भरे हजारों सपने, दिल में छुपी हजारों ख्वाहिशें, यह बच्चे भी दुसरे बच्चों की तरह जीना चाहते है। यह भी आसमान में उड़ान भरना चाहते है लेकिन हर बच्चा इतना खुशनसीब नहीं होता। पापी पेट की आग और मजबूरीयों के चलते ये बाल मजदूर, मजदूरी करने पर मजबूर है। अपने सपनों को धुमिल होते ये खुद देख रहे है, इनके पैर मजदूरी की दलदल में इतने धंस चुके है, साथ ही छोटे-2 कंधों  पर जिम्मेदारियों का बोझ भी इस कदर बढ़ चुका है की उनकी ये उडान .......... मानों अब कभी संभव ही न हो। गलती इनकी नहीं, गलती तो इनकी किसमत की है जो इन मासूमों से रुठी है अगर भगवान ने थोडी दया दिखाई होती तो शायद आज ये भी औरों की तरह किसी बडे घर में मां बाप से अपनी फरमाइशें पूरी करा रहे होते पर इनकी किस्मत में तो भगवान ने मालिक की फटकार, लोगों की दुत्तकार, और समाज की हिकारत ही लिखी है प्यार और दुलार तो शायद भगवान लिखना ही भूल गए।

शिक्षा, स्वास्थ और बेहतर भविष्य हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। लेकिन हमारे देश के ज्यादातर बच्चे बाल मजदूरी करने पर विवश है। बच्चे भगवान का रुप होते है। देश का भविष्य भी यही है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री प. नेहरु जी को बच्चे बहुत ही प्यारे थे और पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब भी अच्चों में देश का उन्नती देखते हैं, पर ऐसे भविष्य की हम उज्जवल कामना कैसे कर सकते हैं, जिसका वर्तमान ही निश्चित नहीं है। हमारे देश का भविष्य कहीं ईंटें ढोते नजर आता है तो कहीं कूडे के ठेर में अपनी किस्मत तलासता...... कुछ का बचपन भट्टी की ताप में झुलसकर खुद का वजूद खो रहा है। चाह तो इनके दिल में भी होगी की अपने बचपन को खुल कर जियें दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जांए। पर इन नाजुक कंधो पर जिम्मेदारीयां इतनी हैं की किसी के सामने अपनी इच्छा तक जाहिर नहीं करते ।

बाल मजदूरी किसी से छुपी नहीं है, ये कुकृत्य हमारे समाज में खुले आम हो रहा है। हालात तो ये है कि प्राईवेट के साथ-साथ सरकारी जगहों पर पर भी बच्चों से काम कराया जा रहा है। बच्चों की इस बदतर हालत का ज्ञान सभी को है, लेकिन करता कोई कुछ भी नहीं, वैसे आज कल की भागती दौड़ती जिन्दगी में किसी के पास इतना वक्त ही कहां है की वो किसी खुशी से महरुम बच्चे पर ध्यान दे। कुछ लोग होते है। जिन्हें इन बदनसीब बच्चों से  हमदर्दी होती है जब किसी बच्चे को चाय की दुकान पर काम करते देखते है। तो बुरा लगता है, जब किसी बच्चे को ढ़ाबे पर बर्तन साफ करते देखते है तो खुद को देश का जिम्मेदार नागरिक कहते हुए भी शर्म आती है, और जब खुद की जिम्मेदारी का अहसास होता है तो हमदर्दी केवल खयालों में ही सिमटी कर रह जाती है, और हम अपना मन मसोस कर ही रह जातें हैं।

ये नन्हें बच्चे खेलकूद और मौजमस्ती की इस उम्र में किस्मत की मार के साथ जिल्लत भरी जिंदगी गुजारते हैं। इनहें हर तरह के जुलमों का सामना करना पडता है, खाली हाथ और भूखे पेट जब ये अपने घर से निकलते हैं तो हर तरह के लोगों की नजर इन पर पडती है। कुछ तो ऐसे माफिया होते हैं जो  इन बच्चों का अपहरण करके इनसे भीख तक मंगावते हैं, हालात इससे भी बत्तर है विशेष तौर पर छोटी-छोटी लडकियों को जबरन वैश्यावृती के दलदल में धकेल दिया जाता है।

बाल मजदूर की इस स्थिति में सुधार के लिए सरकार ने तो सन्र 1986 में चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया। जिसके तहत बाल मजदूरी को एक अपराध माना गया साथ ही रोजगार पाने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष कर दी गई। सरकार ने नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट में बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए कदम बढ़ा चुकी है। इस प्रोजेक्ट का उद्धेश्य बच्चों को इस संकट से बचाना है। जनवरी 2005 में नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट स्कीम को 21 विभिन्न भारतीय प्रदेशों के 250 जिलों तक बढ़ाया गया। लेकिन इससे कुछ ज्यादा फायदा नहीं हुआ आज भारत में लगभग 158.79 मिलियन बच्चों की संख्या है जिसमें 12.6 मिलियन बच्चा बाल मजदूरी कर रहा है।

सरकार प्रायमरी स्कूल में बच्चों को मिडडे मील देती है, आठवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क भी किया गया है, लेकिन लोगों की गरीबी और बेबसी के आगे यह योजनाऐं भी निष्फल साबित होती दिखाई दे रही है। आज हम छोटे-छोटे मासूम बच्चों को मजदूरी करते देखते है...... जहां एक तरफ सरकार बाल मजदूरी को कम करने का दावा करती है तो वहीं दूसरी और तस्वीर कुछ और ही बयान करती है। सरकार को जरुरत है की वो जमीनी हकीकत से जुडे और आंकडों को छोडकर वस्तुनिष्ठता पर जोर दे और उन बच्चों के भविष्य के बारे में विचार करे ताकी एक सुभारत का निर्माण किया जा सके।


उगते सूरज की किरणें इनकी बेबेस आंखों में कुछ चमक तो लाती है पर इनकी आंखें की वो चमक और आगे बढ़ने की उम्मीदें तो डूबते सूरज के साथ ही अस्त हो जाती हैं, आसमान में उड़ते बेपरवाह पंछी को देखकर मन में  इच्छा तो होती होगी की काश हमारे भी पंख होते तो इस तरह गुलामी की जंजीर में यू बंधे ना होते हम भी बेबाक अंदाज में बेपरवाह उड़ान भरते। शायद इनके ये सपने पूरे हो और हमारे समाज से बाल मजदूरी नामक दंश का विनास हो।
Posted by Gautam singh Posted on 04:48 | No comments

तोमर चाचा

                       

कल शाम को में अपने रुम पर बैठा था। तभी नीचें से जोर-जोर की आवाजे आने लगी। जब मैं नीचें पहुंचा तो देखा की पड़ोस में रहने वाले तोमर चाचा और चाची किसी बात को ले कर आपस में झगड़ रहे है। मैने लड़ाई शांत कराने की तमाम कोशिश की पर सफल हो सका चाचा और चाची की लड़ाई बढ़ती ही जा रही थी। की तभी चाची बोल पडी मैे मायके जा रही हूं।
ये बात सुनते ही मुझे एका-एक बाॅबी फिल्म का वह गाना याद गया जिसमें झुठ बोले कौआ काटे नामक लोकगीत में नायिका करीब-करीब सातों वचनों को निभाने पर जोर देते हुए कहती है। कि वह मायके चली जाएगी और नायक देखता रह जाएगा।
पर मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हुं कि भारतीय पत्नियां अपने पति से जरा-जरा सा मतभेद होने पर मायके जाने की क्यों बात करती है। वह हर बात पर धमकी देती है कि वह मायके चली जाएगी। पर मैनें फिल्मों से लेकर समाज में जो देखा और समझा है। उसमें मैने पाया है, की भले ही पति पत्नि के बीच कितनी भी लड़ाई क्यों हो जाए पति उसे कितना भी क्यों पिटे पर वह मायके जाने कि बात नहीं करती। वह पति को उल्टे बोलती है कि पालकी में आई हूं और अर्थी पर ही जाउगीं।

लेकिन आज की पत्नियां ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती। उनके सौंपिग के लिए पैसे कम नहीं होना चाहिए। बगल वाले शर्मा जी के घर में कौन सी टीवी कौन सा फ्रीज आया है। इन्हें भी वहीं चाहिए। आप भले ही दिन रात चूले में जल कर काम क्यों करे। उनसे उनको कोई मतलब नहीं, उनका तो बस फरमाईस पूरा होना चाहिए। नहीं तो बात-बात पर मायके जाने को तैयार हो जाती है। दरअसल वह चाहती है। की जब वह मायके जाने की बात अपने पति के सामने करेगी तो उसका पति उसे रोकने का हर तरीब अपनाएगा, और मनाएगा।
पर अफसोस आज के पति अपने पत्नियों से ऐसा कोई हमदर्दी नहीं रखना चाहते अगर पत्नि कहती हैकी मैं मायके चली जाउगी तो पति कहता है। तुम कब जा रही हो अभी रिजर्वेशन करा दूं। ताकि मैं चैन से जी पाऊ।
                      


Monday, 19 August 2013

मेरठ।  स्वाधीनता की चेतना भारतीय समाज में अरसे से जन्म ले रही थी। भारत के महान सपूतों के  बलिदान और अथक संघर्ष की कमाई है  आजादी।  असंख्य-असंख्य जिजीविषाओं का  महोत्सव । स्वतंत्रता के मूल्यों  और जन सरोकारों को आत्मसात करें। नागरिक कर्तव्यों एवं अधिकारों का सजग होकर पालन करें।
उक्त बातें भारतीय स्वतंत्रता दिवस के 67वें  उत्सव पर अभिव्यक्त हुए।  स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय के तत्वावधान में स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास से मनाया गया ।  उल्लास , उमंग और जोश -जज्बे के साथ विश्वविद्यालय परिवार ने पूर्वजों के बलिदान और अथक संघर्ष तथा जिजीविषा  को नमन किया । विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज प्रांगण में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पूर्व निदेशक, वरिष्ठ विद्वान डॉ0 महावीर शरण जैन ने कहा कि जिन्हें आजादी नहीं हासिल है, वही आजादी के मोल समझ सकता है क्योंकि 'पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।’  जब वाणी की स्वतंत्रता छिन जाए तो मन कितना व्यथित होता है, इसका अंदाजा वहीं लगा सकता है  जो अपने मन-प्राण को अभिव्यक्त नहीं कर सकता !
 वस्तुतः आज जिन शहीदों के कारण हम आजाद हैं, उन सभी के त्याग, समर्पण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिवस है। आज सामाजिक एकजुटता एवं समरसता का समय है । जिन शहीदों ने अपने प्राणोत्सर्ग कर दिया,  उनकी कृतज्ञता शब्दों से नहीं व्यक्त की जा सकती। 


                  मुख्य अतिथि केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पूर्व निदेशक डॉ0 महावीर शरण जैन
                  ध्वजारोहण करते हुए ….


    डॉ जैन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्मरण करते हुए कहा कि वह जो कहते थे,  उस पर पहले स्वयं अमल करते थे। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था। यही कारण था कि उनके बारे में कहा जाता था- चल पडे जिधर दो डग मग में, चल पडे कोटि पग उसी ओर। उन्होंने कहा कि स्वामी जी तथा गांधी जी एक दूसरे के पूरक हैं। यह संस्थान स्वामी विवेकानंद  के नाम पर है और उन्होंने धर्म और अध्यात्म को सामाजिकता प्रदान की। स्वामी जी ने मानव सेवा को धर्म का प्रतिमान बना दिया। उन्होंने कहा था- जो व्यक्ति भूख से तडप रहा हो, उसके सामने धर्म परोसना, उनका अपमान है और गांधी जी ने कहा था- जो तमाम मानव में विद्यमान है,  मैं उसी ईश्वर की पूजा करता हूं,  जो कि सत्य है।
 अपने संबोधन में उन्होंने उन बच्चों द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों की प्रशंसा की जो सुभारती में काम कर रहे श्रमिकों के हैं। उन्होंने इस पर प्रसन्नता व्यक्त की कि सुभारती उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करके सामाजिक सरोकार से भी जुडा है। हमें संपूर्ण समाज के हित के लिए काम करना होगा। संवैधानिक मूल्यों समता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का पालन करना होगा। आज राजनेताओं को आत्ममंथन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि नेता जनता का प्रतिनिधि होता है। आज हो रहे घोटालों पर उन्होंने दुख व्यक्त किया और कहा कि इससे बचने के लिए पारदर्शिता जरूरी है। जब नेता ईमानदार और पारदर्शी होंगे तो देश की प्रगति होगी। आज कुछ विदेशी ताकतें हमें बांटने की कोशिश कर रही हैं, उन्हें निष्प्रभावी करना होगा। प्रो. जैन ने कहा कि भारत के पास मेधा है, प्रतिभा है, ताकत है,  उसे आगे बढाना होगा। नारी शक्ति पर हो रहे अत्याचार को भी रोकने के लिए उन्होंने संवेदनशील होकर कार्य करने की बात कही। सुभारती के माध्यम से उन्होंने ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करने की बात की जो पूरे विश्व को ज्ञान दे सके।


                सुभारती केकेबी चैरिटेबल  ट्रस्ट की अध्यक्षा डा. शल्या राज संबोधित करते हुए------



सुभारती केकेबी चैरिटेबल ट्रस्ट की अध्यक्षा डा. शल्या राज ने अपने सुचिंतित संबोधन में सभी से अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करने का आहवान किया। देश और समाज के प्रति जिम्मेवारी महसूसना होगा । उन्होंने कहा कि साफ-सफाई, संसाधनों के दुरुपयोग की ओर युवाओं को सजग रहने की जरूरत है। युवाओं को खुद को देखना होगा। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्यों और कैसे है कि हम बाहर जाते हैं तो वहाँ के नियमों और शिष्टाचार का बखूबी पालन करते हैं लेकिन अपने घर यानि देश और समाज में नहीं करते हैं। हमारे उच्च प्रतिमानों और मूल्यों के साथ व्यावहारिक संगति नहीं है। इस पर सभी को चिंतन-मनन करना चाहिए। आज हमारे लिए महान अवसर है। इस मौके को जाने न दें। आज़ादी के इस उत्सव को , स्वाधीन चेतना की विजय गाथा को एक बड़े अवसर के रूप में लेना चाहिए ताकि हम आत्मावलोकन कर सकें । 




                          

                       विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मंजूर अहमद संबोधित करते हुए-----




विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मंजूर अहमद ने कहा कि लम्बे संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। मेरठ की धरती ने आजादी के संघर्ष में महान योगदान दिया। सभी लोगो ने कंधे से कंधे मिलाकर आजादी की अलख जगाई। देश से मोहब्बत रखने वालों ने कुर्बानियां दीं।  आज उनके जज्बे को याद रखने की जरूरत है। उसे धुंधला न होने दे।
उन्होंने कहा कि यह आज़ादी ऐसे ही नहीं मिली ।  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को उधृत करते हुए उन्होंने कहा कि 1940 -1944 तक कोई  उम्मीद नहीं थी कि हम कभी आज़ाद भी होंगे !

प्रो. मंजूर ने कहा कि सुभारती ने कोशिश की है कि यहां पूरे देश के बच्चे शिक्षा के लिए आएं। आज पूरब -पश्चिम , उत्तर --दक्षिण हर जगह के बच्चे सुभारती में लघु भारत का आभास कराते हैं। हमारी कोशिश है कि हम पूरे भारत को एक करें।  राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए सुभारती हमेशा तत्पर है … ।
उन्होंने आगे कहा कि हमें अपनी संस्कृति, अपनी भाषा पर गर्व करना होगा। हमारे युवा अपनी ही भाषा से कटते हैं। अपनी संस्कृति और अपनी भाषा अपनाएं। हम सब एक साथ चलें तो कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है। स्वतंत्रता के उत्सव को बड़े अर्थ में ग्रहण करना चाहिए और देश को निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर करना चाहिए।
 इस पुनीत अवसर पर आयोजित समारोह में रंगारंग देशभक्ति पूर्ण प्रस्तुतियों, समूहगान, नृत्य आदि से सुभारती विवि के छात्र-छात्राओं ने मन मोह लिया। अनेक भावपूर्ण प्रस्तुतियां वातावरण में  गूंजती  रहीं।
छात्र-छात्राओं के अलावा महिला गार्ड रूबी खान ने ...ये सुभारती समाज हमारा----- सुनाकर खूब तालियां बटोरी। सफाई कर्मचारी नरेन्द्र की जोश-जज्बे से रचित भावपूर्ण कविता को सभी ने सराहा। छा़त्र मौ. गुलहसन ने-है प्रीत जहां की रीत, मैं गीत उसी के गाता हूं, गीत प्रस्तुत किया । पत्रकारिता एवं जनसंचार के वरिष्ठ शिक्षक पी के पांडे ने 'बडी होती बेटी' (पत्रकार एवं वरिष्ठ कवि ) शीर्षक कविता का पाठ किया। इसके अलावा कोमल सिंह, ऋचा, नीरज ढाका, डा. किरन गर्ग एवं छोटे बच्चों ने आकर्षक प्रस्तुति दी। योगा कालिज की बी0एन0वाई0एस की छात्राओं ने म्यूजिकल योग के माध्यम से भारत माता की अनूठी वंदना की। इंजीनियरिंग के छात्र मानव सिंह एवं शिवम भारद्वाज ने सत्यमेव जयते -----का सराहनीय संगीतमय गायन किया। नर्सिंग छात्रा शरण्या ने है ईश्वर या अल्लाह प्रस्तुत किया। साथ ही कोमल, अंशु, एना सिसौदिया ने भाषण दिया। सुभारती इंजीनियरिंग कॉलेज की ओर से आजादी और देशभक्ति से जुडी कुछ लघु फिल्में दिखाई गई।
इसके पूर्व अल्लसुबह विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के छात्रों-शिक्षकों आदि ने प्रभातफेरी निकाली । वंदे मातरम , भारत माता की जय के नारे से वातावरण गुंजयमान हो उठा ।
 इस अवसर पर प्रति कुलपति प्रो. एके खरे, कुलसचिव पीके गर्ग, डा. जीएस भटनागर, मेडिकल कालिज के प्राचार्य डा. एके अस्थाना, ट्रस्टी डॉ एसडी खान आदि सहित विभिन्न संकायों -संस्थानों के प्राचार्य एवं डीन मौजूद रहे। समारोह का संचालन सुभारती मेडिकल कॉलिज के कम्युनिटी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डा. राहुल बंसल ने तथा स्वागत एवं संयोजन इंजीनियरिंग कॉलेज के डा. जयंत शेखर ने किया।

Tuesday, 16 July 2013

Posted by Gautam singh Posted on 03:41 | No comments

प्रभाष जोशी की याद

       


                                   

             

स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय में मीडिया  छात्रों के ' संवेदना'  के बैनर तले हिन्दी पत्रकारिता के श्लाका पुरुष  प्रभाष जोशी की जयंती पर उन्हें याद किया । प्रभाष जी को याद करते हुए मीडिया छात्रों ने उनके विचारों और जीवन पर प्रकाश डाला ।  खरी-खरी कहने और बोलने वाले प्रभाष जोशी को आज की जरूरत बताया गया ।
        
संस्थान के निदेशक नीरज शर्मा ने कहा कि प्रभाष जोशी हिन्दी पत्रकारिता के श्लाका पुरूष थे उन्होंने एक साहसी सरोकारी पत्रकार और सम्पादक के रूप में हिन्दी पत्रकारिता को अमूल्य योगदान दिया।  वरिष्ठ पत्रकार सुनील छइयां ने कहा कि प्रभाष जोशी ऐसे सम्पादक और पत्रकार थे जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को आम आदमी तक पहुँचाने  का काम किया। प्रभाष जोशी ने हर क्षेत्र के समाचारों को नये आयाम दिये। क्रिकेट के खेल पर उनके आलेख आज भी चर्चाओं में रहते हैं।  संकाय के एचओडी एवं एसोसिएट प्रो. पीके पाण्डेय ने कहा कि उनकी निर्भयता, जनपक्षधरता और सरोकारों को जिन्दा रखा जाए। प्रभाष जी की जयंती पर याद करने का यह बडा अर्थ है । उन्होंने  हमें सिखाया कि खबर देना ही नहीं , खबर लेना भी पत्रकारिता का काम हैं। इस मौके पर शिक्षकगण सुमन मिश्रा, शिखा धामा, दीपा पारछा, शिप्रा त्रिपाठी, शशांक शर्मा के साथ संकाय के  छात्र-छात्राओं गौतम,  अमित, विपिन, निष्टी, श्मिता, अबरार, राहुल ने भी अपने विचार रखें और उनके जीवन और सन्देश को प्रकाश स्तम्भ बताया ।                                                
                                       



                                                                 
   

                                                                                                       
Posted by Gautam singh Posted on 02:34 | No comments

क्या थी मेरी खता

          
एक बच्ची जिसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, जो बिल्कुल अबोध थी, जिसने अभी ठीक से दुनिया भी नही देखी थी, जिसकी उम्र लगभग डेढ माह की हुयी थी। तब मां ने उसको नहर में डाल दिया। तब लडकी के मन में ये सवाल तो जरूर आयें होंगे कि मां तुम तो मेरी जननी हो, तुमने मुझे दुनिया में उतारा हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया जो तुम मुझे मिटाना चाहती हो। मां मुझे मत मारो, मैं तुम्हारा सहारा बनूगीं, मैं कभी भी किसी चीज के लिए जिद नही करूगी,जो तू मुझे देगी में वो ही खा लूंगी, मां मुझे मत मार, मुझे जीने दे। मां आखिर मेरा गुनाह क्या है ? क्या मेरा गुनाह यह है कि मैं बेटी हूॅ। इसलिए तुम मुझे जिन्दगी के बदले मौत देना चाहती हो।



 माता तुम तो ममता की मूर्त हो, फिर तुम दिल पर क्यों पत्थर रख रही हो। आपके सामने ऐसी क्या परेशानी आ गयी जो तुम मुझे खत्म करना चाहती हो। दूध पिलाने की उम्र में तुम मुझे नहर का पानी पिलाकर मौत के मुंह में धकेल रही हो। मां मैं आधी रोटी खा लूंगी, कपडे भी दीदी के पहन लूंगी, मुझे मत फैको। जिस मॉ ने उसको सीने से लगाकर रखा। मां ने जब उसे अपने से अलग किया होगा क्या तब उसके दिल से कोइ आवाज नही आयी। आखिर क्यों उसने अपने कलेजे के टुकडे को, अपने अंश को ही खुद से अलग कर दिया। कैसी मां थी वो ? परेशानी कुछ भी हो लेकिन मां के इस कृत्य ने ममता को कलंकित तो कर दिया। जिस मां ने 9 महीने तक बच्चें को पेट में रखा, पैदा होते ही ऐसी क्या परेशानी आ गयी कि उसे खत्म करने की ठान ली। क्या वह परेशानी बेटी तो नही ?