Monday, 10 April 2017

यादें रोई, सपने रोये, या दिल रोया पता नही!! कल रात सिसकीयां सुनाई दे रही थी सीने में, धडकन की तरह....अब सोचता हूं यादों पर भी कोई शरहद होती तो कितना अच्छा होता कम से कम खबर तो होती कि सफ़र कितना तय करना है। तुम जानते हो सारा दिन गुजर रहा था खुद को समेटने में....फिर तेरी यादों की हवा चली और हर दिन के तरह हम फिर से बिखर गये.... जब भी मैं इस शहर से निकलना चाहता हूं कोई न कोई रास्ता लौटा लाता है। मैं तुम्हें हर लैंप पोस्ट पर खड़ा पाता हूं। हर बस से लेकर मेट्रो की सीट पर तुम्हीं बैठे लगती हो। तुम जानती हो वक्त मेरी तबाही पर हंसता है। अब मैं वक़्त की दहलीज़ पे ठहरा हुआ पल सा हो गया हूं। लोग कहते है वक़्त और हालात दोनो ही बदल जाते हैं मंज़िलें रह जाती हैं, और लोग बिछड़ जाते हैं....बड़ा ही मिठा नशा है तेरी यादों का.... वक़्त गुजरता जा रहा है और हम आदी होते जा रहे है।


कभी चांद को देखा है तुमने? कभी चांद को पूजा है? चांद अपने चाहने वालों को कितना परेशान करता है... कितना सताता है... ठीक तुम भी वैसे ही हो गई हो। जब चकोर चांद को हसरत भरी नज़रों से देखता है, तो चांद बादलों के पीछे छुप जाता है। जब चांद को देखकर व्रत खोलना होता है... तो चांद देर से निकलता है। जब चांद को देखकर ईद मनानी होती है... तो चांद जानबूझ कर इतराता है। चांद को पाना किसी के बस की बात नहीं.. फिर भी चांद को चाहने वालों की चाहत कम नहीं होती.... तुम भी उसी चांद की तरह हो.. और मैं उसी चांद को पूजता हूं... लाख चाह कर भी मैं उस चांद को छू नहीं सकता... बस चांद की चांदनी को देख सकता हूं... महसूस कर सकता हूं, पर अपना नहीं बना सकता... क्योंकि सुबह होते ही यह चांद मेरा साथ छोड़ देता है तुम्हारे तरह। तुम नदी के पानी में चांद की परछाई सी हो जिसे मैं देख तो सकता हूं, पर छू नहीं सकता। अगर मैं पानी में चांद को छूने भी गया तो चांद की जो अक्स अभी दिख रहा है... वह भी नहीं दिखेगा... लहरो के साथ वह भी घूल जाएगा और मेरे डूबने के आसार बढ़ जाएंगे। इसलिए मैं चांद को सपने में भी छूने की कोशिश नहीं करता।


तुम जानती हो उस चांद को बस तकना ही मेरी फितरत हो गई है। कोई रास्ता भी नहीं है, दुआओं के अलावे और कोई सुनता भी तो नहीं यहां... खुदा के सिवा... अब मुझे उल्फत की जंजीरों से डर लगता हैं, जो जुदा करते हैं, किसी को किसी से, उस हाथ की लकीरों से भी डर लगने लगा है। कभी-कभी जी चाहता है कि हाथ के सारे लकीरों को मैं मिटा दूं पर नहीं मिटाता मैं सोचता हूं कि इसी लकीरों के बीच कही वह लकीर भी छुपी हो जिसमें लिखा हो तुम वापस लौट आओंगी...पर मैं यह जानता हूं कि यह मात्र एक भ्रम भर है पर मैं इस भ्रम में जीना चाहता हूं जो कम से कम मुझे झुठा दिलासा तो दिलाता है तुम्हारे वापस आने का.... जिससे मैं बेवफाई की तपिश से बच कर इश्क की घटाओं में बैठ तो जाता हूं, मैं जब भी उदासी से घबराने लगता हूं तेरे ख़याल की छांव में बैठ जाता हूं। मैं तुम्हारे लिए अजनबी हो सकता हूं। मैं तुम्हारे लिए अब खुशियों से ज्यादा गम की परछाई हो सकता हूं। मुझे नहीं पता बुरा मैं हो गया हूं या बुरा वक्त हो गया है।


तुम जानती हो अब हर आहट पर तेरी ही तलाश रहती है मुझे... मुस्कान तो आती है होटो पर तुम्हें याद करते वक्त...लब तक थरथरा जाते हैं। तुम्हारे जाने के बाद छोड़ दिया है मैंने अपने दिल का साथ और थाम लिया है तन्हाई का हाथ तुम ही बताओं इस तन्हाई से हाथ न मिलाता तो क्या करता। कोई मिलता भी तो नहीं हमसे यहां हमारा बनकर.... मैं तुम्हारी यादों को किसी कोने में छुपा नहीं सकता, तुम्हारे चेहरे की चहक चाहकर भी भुला नहीं पाता हूं। नसीब की खेल भी कितना अजीब होता है न, जो नहीं होता है नसीब में लोग उसी को टूट कर चाहते है। अब तूम जो नहीं हो तो बिन तेरे शामें उदास रहती है मेरे, ढूंढें तुझे कहां-कहां आंखें....तुम जानती हो अब बस इक चांद ही नहीं है जो पूछे तेरा पता, जी चाहता है तुम्हारी हर यादों को सिमेट लू जो भी मिलता है उसे किनारा बनकर इन आखों में छिपा लू हर ख्वाब टूट के बिखरा कांच की तरह, बस एक इंतज़ार है तुम्हारा साथ सहारा बनकर चलने का......

Saturday, 1 April 2017


प्रिय तान्या

पुरे आठ साल ग़ुज़र गई है तुम्हारी ख़ामोशी पढ़ते हुए। ख़ामोशी में चाहे जितना बेगाना-पन हो, लेकिन एक आहट जानी-पहचानी सी लगती है तान्या। तुम जानती हो सच्चाई तो बस खामोशी में है। शब्द तो मैं लोगों के अनुसार बदल लेता हूं। जुबां न भी बोले तो मुश्किल नहीं होता है प्रिय, लेकिन फिक्र तब होती है जब, खामोशी भी बोलना छोड़ दे। इश्क के चर्चे भले ही सारी दुनिया में होते होंगे पर दिल तो खामोशी से ही टूटते है न। तुमने कभी महसूस किया है खामोशी कितना कुछ कहती है। कान लगाकर नहीं कभी दिल लगा कर सुनों यह कितना शोर मचाती है। ये हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब होती हैं न। होते तो हैं हाथ के अंदर पर काबू से बाहर। एक तेरी खामोशी ही जला देती है इस पागल दिल को… बाकी सब बाते अच्छी है तेरी तस्वीर में… मुझे कभी-कभी लगता है हमारी मोहब्बत जरूर अधूरी रह गयी होगी पिछले जन्म मे, वरना इस जन्म की तेरी ख़ामोशी मुझे इतना बेचैन न करती....

तुम जानती हो तान्या तुम्हारी खामोशी की भी एक जुबान है। ये खामोशी जिस से पल भर में सन्नाटा हो जाता है उसी ख़ामोशी का शोर कई बार अकेले में तड़पाने लगता है। यह खामोशी अब बर्दाश्त के बाहर होने लगी है प्रिय। कभी सावन के शोर ने मदहोश किया था मौसम, अब ऐसा लगता है पतझड़ में हर दरख़्त खामोश खड़ा है। तुम जानती हो तुमने जो वह सुफेद कलर का पैंट और ब्लू शर्ट दिया था न उपहार में... उसको मैंने अभी तक रखा है संभाल कर... जिस दिन तुम गई थी न उस दिन ही मैंने उस पैंट और शर्ट को रख दिया था। अटैची में प्लास्टिक के कवर में डाल कर उस वक्त उस पैंट पर कोई दाग नहीं था प्रिय। पर आज जब उस अटैची को खोला तो देखा उस पैंट पर दाग उभर गए है। यह पैंट और शर्ट ही तो था इकलौता गवाह हमारे मोहब्बत का... पर अब वह भी दगा दे गया है तुम्हारी तरह....शायद दगा इसलिए दे गया कि वह तुम्हारा ही दिया था अब जब तुम नहीं हो मेरे साथ तो वह कैसे रह पाता।

 जैसे तुम चली गई बिना कुछ बोले वैसे ही पैंट भी चला गया बिना कुछ कहें खामोशी से... मैंने रोकना भी चाहा था तुमको पर तुम नहीं रुकी... शायद जाना तुम्हारा शौक था...वो शौक तुम पूरा कर गई मेरी हसरते तोड़ कर...अब हर जज़्बात को कोरे कागज पर उतार देता हूं इसलिए की वह खामोश भी रहता है और किसी से कुछ कहता भी नहीं। तुम जानती हो तान्या मोहब्बत के जिस राहों में कभी दिल शोर मचाया करता था, आज वह गलियों से खामोश निकला करता है। यह जरूरी भी नहीं हर बात लफ्जों की गुलाम हो खामोशी भी तो खुद की जुबान होती है न शायद वो जुबां जिसे हम समझते हैं। तुम जानती हो प्रिय यह खामोशी ही मेरी कमजोरी बन गई है। जिस खामोशी से मुझे लगाव था आज वह शोर मचा रही है। कानो के पर्दे फाड़ देने वाले....तुम्हें कह न पाए कभी दिल के जज़्बात और इस तरह से तुम से दूरी बन गयी प्रिय।

तुम जानती हो तन्या मैं लिखता इसलिए हूं कि शब्द चाहे जितने हो मेरे पास, जो तुम तक न पहुंचे, तो सब व्यर्थ हैं...! प्रिय मैं हर शब्द तुम तक पहुचाना चाहता हूं तुम्हारे कानों को खामोशी से बनी नज्म सुनाना चाहता हूं। शायद इसलिए लिखता हूं और अब इसे ऐसे ही रहने दो प्रिय जो समंदर जैसे खामोश हैं और उसे खामोश ही रहने दो.. अगर ज़रा भी मचल गया तो सारा शहर ले डूबेगा। तुम जानती हो मैं सोचता हूं काश कुछ लम्हों को हम अपनी गिरफ्त में रख पाते, तो आज अपने सर पे तेरे हाथ की न कमी पाते। जिन्दगी की रहगुजर में कोई कमी सी रह गई, मिले तो थे कई सौगातें बस तेरी कमी रह गई। वो ख़्वाब जो दिन रात हम खुली आंखों से देखा करते थे, उन ख़्वाब को बस, शब भर जीने की तम्मना रह गई। तुम जानती हो न तान्या अश्कों के बह जाने की रवायत का मैं कायल नहीं था, फिर न जाने पलकों पे क्यों यह नमी सी आ जाती है। तुम तो चली गई हो पर गुफ्तगूं की तरह मेरी खामोशियां भी बोलती हैं। हर लफ्ज़ गुफ्तगू करता है.. हर लफ्ज़ तुम्हारा ही तो है। बार-बार टूटता है। हज़ार बार टूटता है और टूट कर तुम्हारी कल्पनाओं में खो जाता है। अब ना खुशियों की रौनक ना गमों का कोई शोर आहिस्ता-आहिस्ता ही सही जो तेरी यादों में कट जायेगा ये सफ़र....

तुम्हारा
 मैं...

Tuesday, 21 March 2017

प्रिय तम्मना

तुम जा चुकी हो मेरी जिंदगी से संदली जिस्म लेकर लेकिन मैं एक आरजू दिल में छुपाये फिर रहा हूं। कभी कह नहीं पाया तुमको इसलिए की तुम कहीं नाराज न हो जाओं मेरी गुस्ताखी से...पर अब जब तुम नहीं हो खोया रहता हूं तुम्हारे ख्यालो में... जमाने का कोई होश भी नहीं है मुझे... तेरी यादों के जज्बात इस कदर छलक रहें है मेरी आंखो में की बिना देखे तेरी तस्वीर बार-बार बना रहा हूं। धड़कन तो मेरी खामोश है... पर नजरें तुम्हें तलाश रही है। ठीक वैसे ही जैसे चांद नूर की तलाश में भटकता है। मैं भी भटक रहा हूं और भटकते-भटकते बुझ गया हूं। वह गर्दिश का सितारा जलके... जो कभी सबको रोशन किया करता था... अब वह सितारा वहां बेइंतहा दर्द से तड़प रहा है। हमारी खामोशी, हमारी आहट, हमारी आंखें, हमारी चाहत सब स्थिर हो गया है तम्मना। शांत, ठंड़ा, अकड़ा हुआ एक लाश की भांती.....

लेकिन मैं जिंदा हूं....मैं जिंदा क्यों हूं? मुझे तो मर जाना चाहिए...पर मैं मर नहीं सकता....मैं मर इसलिए नहीं सकता की तेरे ख्वाब जो सलामत है मेरे लहू के हर कतरे में...रात दिन उसे सहेज कर रखा हुआ हूं....अब किसी राह की ख्वाहिश नहीं है दिल में... हमने जब देखे थे एक रहगुज़र, साथ चलने की जो अब अलग हो गए है। जिस्म से होने वाली मोहब्बत आसान है... पर जिसे रूह से मोहब्बत हो जाए उसे अलग कैसे किया जा सकता है प्रिय। वह गुजर रही है बस तेरे वापस आने की आस में... मैं जानता हूं की तुम नहीं आओंगी पर मन कहां किसी की सुनता है यह तो चंचल है हर पल तुझसे मिलने की प्यास लिये फिरता है। सब कुछ है यहां बस तुम नहीं हो तम्मना। तुम कहीं भी रहो पर तेरे सर पर एक इल्जाम तो हमेशा रहेंगा... तेरे होंठों की लकीरों पे मेरा नाम तो हमेशा रहेंगा... तुम मुझको अपना बना या न बना लेकिन तेरे हर एक धड़कन में मेरा नाम तो हमेशा रहेगा।

वो ख्वाब जो कभी हम पाला करते थे अपने आंखों में... पानी से तस्वीर बना कर, अब कहीं भटक रहें है। तुम अक्सर कहती थी न तम्मना इश्क है वही, जो एक तरफा हो, इजहार-ए-इश्क तो ख्वाहिश बन जाती है, है अगर इश्क तो आंखों में दिखाओ, जुबां खोलने पर ये नुमाइश बन जाती है। मैं जुबान नहीं खोलता क्योंकि मैं अपने इश्क का नुमाइस नहीं करना चाहता। क्योंकि मैं जानता हूं इश्क तो महसूस और महफूज करने की चीज है नुमाइस की नहीं.... तुम जानती हो कितनी बाते याद आती है तुम्हारी.... और फिर वह तस्वीरें सी बन जाती हैं... अब उन यादों को धागे से सीने की कोशिश करते रहता हूं तम्मना। मैं उन लम्हो को फिर से जीने की कोशिश करते रहता हूं.... जो ओस से भी हलकी थी.... वह अश्कों की बूंदें, जो तुम उस दिन जाते वक्त गिराते गई थी...अब वह अश्क बार-बार मुझे बेचैन कर रही है... तुम्हारा इश्क दिखावा नहीं था प्रिय... तुम्हारा प्रेम तो उतना ही पवित्र था... शायद है... जितना पवित्र आत्मा।

तुम नहीं हो और तुम्हारे बिना जिंदगी भी नहीं है... जिंदगी, मैं फिर भी हर दिन जीने की कोशिश करता हूं। एक भ्रम, मैं रोज पैदा करता हूं तुम कहीं नहीं गई हो ...तुम यहीं हो मेरे पास मेरे हर एक सांसों में मेरे हर एक धड़कन में...मेरे लहु के हर के कतरे में...कुछ भी तो नहीं हुआ है....हमदोनों के बीच सब सही तो है...पर अचानक मेरे आंखों के कोरों से आंसू छलक आते है...क्योंकि मैं अपने जिस्म से तो झूट बोल लेता हूं तम्मना... पर अपने रूह से झुट नहीं बोल पाता....वह भ्रम जो मैं खुद बूनता हू्ं तुम्हें भूलाने के लिए वह टूठ जाता है। अधूरे ख्वाबों की दहलीज़ पर खड़ा, आज भी तेरी राह तकता है, अब कोई नहीं, कहीं नहीं, दिल के पास, मेरा वजूद एक सवाल बन गया अब तो, मेरे ही 'आप' अब मेरे आसपास नहीं.....तुम जानती हो... जब भी मुझे याद उस लम्हें की आती है। मोहब्बत कसक बनके उभर आती है। मेरे आंखों से आंसू की शीतल धारा छलक पड़ती है।

अब मन करता है खामोशी की सब दीवार तोड़ दू, तुम्हें जाकर सबकुछ बोल दू.... कुछ मैं तुमसे बोलू कुछ तुम हमसे बोलो... दिल से ज़ख्म, ज़ख्म से दर्द का सफ़र बहुत हुआ, आज हम एक दूजे पर मरहम बनकर लग जाय...पर यह भी महज़ एक स्वप्न भर है। मैं किसी तरह के भ्रम में अब जीना नहीं चाहता इस लिए शायद मेरे आंखों से आंसू छलक रहें है। ये याद है तुम्हारी या यादों में तुम हो, ये ख्वाब है तुम्हारे या ख्वाबों में तुम हो, मैं नहीं जानता... तम्मना तुम्हारे शरीर की खुशबू मैं हमेशा महसूस करता हूं। अजीब सी बेकरारी रहती है। दिन भी भारी, रात भी भारी रहता है वह आईना भी मैंने तोड़ दिया इस ख्याल से कि शायद हमारी तकदीर बदल जाए...पर आईने के हर टुकड़े में सिर्फ तुम्हारी ही तस्वीर नजर आती है। तुम जानती हो मुझे अब ऐसा प्रतित होने लगा है कि प्यार कहां किसी का पूरा होता है...प्यार का तो पहला ही अक्षर ही अधूरा है। जब वह पूरा नहीं है तो हम पूरा कैसे हो सकते है....तम्मना सच्चे प्यार में निकले आंसू और बच्चे के आंसू एक समान होते है। क्योंकि दोनों जानते है दर्द क्या है पर किसी को बता नहीं पाते...ठीक वैसे ही हम जानते है दर्द कहां और कैसे है हम कह नहीं पाते.........

तुम्हारा
पारस

Thursday, 16 March 2017

अम्मी आज जब तुम्हारा ऑपरेशन हो रहा था ना तो आपा, खाला बार-बार मुझे फोन पर बता रही थी कि जब तुम खुद अपने बजूद को नहीं पहचान पा रही थी तब भी तुम मुरछित अवस्था में भी हमलोगों का नाम लेकर बड़बड़ा रही थी। अम्मी मैं भी आना चाहता था पर नहीं आ सका तुम से दूर रहना भी कुछ ऐसा हैं अम्मी जैसे मेरी सांसे मुझसे दूर हो.... सूरज की रोशनी भी इन नजरों को भाती नहीं है... अक्सर रात में चांद के उजाले में तेरा चेहरा नजर आता है अम्मी.... जिसमें तुम नाराज नजर आती हो..... मैं जातना हूं तुम चाहती थी कि तुम्हारे ऑपरेशन के दरमियां हम सब वहां रहें तुम्हारे पास पर मैं नहीं आया। क्यों नहीं आया इसका कोई पूख्ता जवाब नहीं है मेरे पास...शायद मैं डरता था तुम्हारें असहन दर्द, पीड़ा, तड़प से इसलिए जाने की कुब्बत नहीं जुटा पाया पर आज जब चांद में तुम्हारा चेहरा देखा तो लगा तुम्हारा दर्द, पीड़ा और तड़प सब बड़ गए है। तुम्हारी बैचेन आंखें हमें खोजते-खोजते थक सी गई है। तुम्हारा शरीर नींद के आगोश में जाना चाहता है। पर आंखों में नींद नहीं है वह लाखों चेहरों में हमें तलाश करती है......

तुम जानती हो अम्मी तेरी वो बाते, हमारी वो छोटी-छोटी लड़ाईयां, शाम ढ़लते ही वह सुकून भरे दो पल, रात को परियों की कहानियां सब बहुत याद आ रही है। अम्मी तुम्हारी नाराजगी बेचैनी आंखों में झलक रही है.... वो तुम्हीं थी जिसने मुझे ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया, वो तुम्हीं थी जिसने मुझे हर मुसीबत से बचाया। पर आज जब तुम मुसीबत में थी मैं नहीं था तुम्हारे पास.... तुमने कुछ कहा भी नहीं....अम्मी तुम जानती हो... तुम्हारे आंचल में छिपकर सपने सजाना... ज़मीर को सुकून देने वाला तुम्हारी वो स्पर्श... चिलचिलाती धूप में तुम्हारे हाथों की ठंडक... तुमको छूकर आती हवा, कड़कती धूप में चैन.... बहुत कुछ याद आ रहा है अम्मी। तुम तो तकलीफ में भी मुस्कराती थी और हर गम को खुशी से सह जाती थी.....कभी मैंने तुम्हारें आंखों में आंसू की एक बुंद तक नहीं देखी है अम्मी.... पर उस रात जब मैं छत पर उस चांद को देख रहा था ना... जहां तुम नजर आती हो... मुझे वहां तुम्हारे आंखों में आंसू दिखें अम्मी यह आंसू मुझे बेचैन कर रहे है...तुम रोती भी हो मैंने कभी नहीं देखा था। पर आज तुम रो रही थी....

अम्मी तुम जानती हो तुम्हारे हाथों से खाने का निवाला खाना, तेरी ममता भरी डांट के बाद ढेर सारा दुलार... रात की गहराई में तेरी ममता की रोशनी...दर्द में भी चांद की चांदनी सी तेरी मुस्कुराहट… सब आज कहीं खोया सा लग रहा है। वह बिंदी भी जो तुम माथे पर चांद नूमा सजाए रखती थी वह मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रही है। वहां तुम्हारे चेहरे पर सिसकने का दर्द दिखाई दे रहा था अम्मी.... जब मैं न जुबां था ना तब भी तुम मेरी हर खामोशी को पहचान लेती थी पर मैं तुम्हारे इस चुभन को नहीं पहचान पाया। तुम जानती हो आज वह चांद मुझे कोस रहा था अम्मी वह मुझे हिकारत भरी नजरों से देख रहा था... वह मुझे बार-बार याद दिला रहा था कि जब मैं बीमार होता तो तुम रात-रात भर अपने आंचल में छुपाए रखती थी... पर आज जब तुमको हमारी जरूरत थी तो हम वहां नहीं थे...वह चांद आज मुझे बहुत कुछ कहना चाह रहा था पर शायद तुमने उसे बोलने से रोक दिया....वह चाहते हुए भी नहीं बोला बस मुझसे नजरे फेर ली... तुमने आज चांद को क्यों नहीं बोलने दिया उसे बोलने देती अम्मी....


पर तुमने बोलने नहीं दिया शायद... ख़ुदा ने ये सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख्शी है, कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं। जानती हो अम्मी आज मैं तुम्हें एक बात बताऊं... मैं जब भी घर से आता हूं तुम हिदायत देती हो न... नहाकर पूजा कर लेना फिर कुछ और काम करना। शुरू में तो बुरा लगता था लेकिन अब आदत हो गई है। हालांकि अब भी मैं मन्दिर वंदिर नहीं जाता हूं। तुमको पता है जब मैं छुट्टी पर घर आता हूं तो मैं नहा कर पूजा-वूजा नहीं करता... लगता है कि तुम्हारे घर पे रहते हुए पूजा करने की क्या जरूरत तुम तो हो ही ना। इस बार जब घर आऊंगा तो एक दो थप्पड़ जड़ देना आज तक तुमने सही से पीटाई भी तो नहीं की। अगर तुम्हारे मार से मुझे रोना आ जाए तो चुप मत कराना। बस थोड़ी देर चैन से रो लेने देना। बहुत साल के आंसू हैं बहुत देर तक निकलें शायद।

Saturday, 11 March 2017

होली, एक ऐसा उत्सव जो जीवन के आनंद पर नृत्य करता है। जीवन जो खुद एक रंग है। होली पर इस देश में जितने रंग खेले जाते है। उतने तो पूरी कायनात में देखे भी नहीं जाते विद्वानों का रंग बेरोजगारों का रंग जितना हिंदूओं का रंग, उतना ही मुस्लमानों का रंग, जितना इश्क का रंग उतना ही फरेब का रंग, जितना राजा का रंग, उतना ही रंक का रंग, जितना मंदिरों का रंग, उतना ही मस्जिदें का रंग, जितना आरती का रंग, उतना ही अजान का रंग ये सिर्फ त्योंहारों की किस्सागोई नहीं है ना ही किसी संतुलन की मजबूरी होली तो कहानी है जीवन की। जीवन जो खुद एक रंग है।  होली राग-रंग का उत्सव है। राग यानी गीत, संगीत... और रंग यानी जीवन... दोस्ती के रंग... प्रेम का रंग.... धर्म और दर्शन के रंग... हंसी ठिठोली के रंग...  इन रंगो को उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ पूरे शबाब पर होती है।


इसी समय शिशिर ऋतु विदा हो रही होती है और वसंत का आगमन होता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से ही नए साल की शुरुआत भी होती है। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का मीठा संगीत सुनाई देने लगता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति संकोच और रूढ़ियां भूलकर ढोलक-झांझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। हमारे पुराणों की कहानियां भी जीवन के इन्हीं रंगो से गढ़ी गई हैं। इन कस्से-कहानियों में लोक मान्यताएं और कल्याणकारी संदेश भरे पड़े है।


पौराणिक मान्यताओं की नजर से होली का त्योहार एक ऐसे किस्से के मद्दे नजर मनाया जाता है जहां अटूट श्रद्धा पवित्र भक्ति बुराई का अंत और अच्छाई की जीत है। होली में जितनी मस्ती और धूम मचती है। उतनी तो किसी त्योहार में देखी भी नहीं जाती...इस दिन सारे लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूल कर एक दूसरे से गले मिलते हैं और गुलाल लगाते हैं। इस दिन हर उम्र के लोगों के लिए उल्लास का माहौल होता है।होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं...ऐसा सिर्फ देश में नहीं, बल्कि विदेशों में भी होता है। दरअसल, जहां भी भारतीय मूल के लोग हैं, वहां यहां की परम्परा फलती-फूलती ही है। और, फिर होली तो ऐसी मस्ती भरा त्योहार है कि इसमें विदेशी मन भी देसी रंग में नहाने के लिए तैयार हो जाता है।

Friday, 10 March 2017


मार्च का महीना आते ही तुम्हरी यादे सामने बाहें फैलाए खड़ी हो जाती है। यह महीना ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से... जहां एक ओर वर्ष की अंतिम ऋतु शिशिर की विदाई हो रही होती है, तो वही साल के पहले ऋतु वसंत का आगमन हो रहा होता है। पलास के फूल खिल रहे् होते है, आम के पेड़ मे मंजरी लग रही होती है। ठीक उसी वक्त तुम मेरे जीवन में आई थी। खुद को मेरे वजूद का हिस्सा बनाने, याद है तुम घर से नकाब में निकली थी...गली के सारे लोग हमारे फिराक में थे पर तुमने उनको चकमा दे दिया था...इनकार था उनको हमारी मोहब्बत से...पर हमें तो एक पल का इंतज़ार भी दुश्वार हो गया था। वो सस्ता सा छोटा घरौंदा जहां हम दोनों बाहों में बाहें डाल कर जहां भर का सुकून पाया करते थे। खुद को वेदना के अथाह सागर वाले इस संसार में...वो चांद जिसे देख हम सारी रात जगा करते थे वो सब आज भी वहीं है सैफ़ी।


तुम जा चुकी हो मेरी जिंदगी से... खुद को मेरे लहू के हर कतरे में छोड़ कर... तुम्हें तो ठीक से बिछड़ना भी नहीं आया... तुम कहती हो भूल जाना मेरे परिचय को मगर याद नहीं एक भी सांस तो ऐसी नहीं मेरे सीने में जो किसी दर्द से आबाद या बर्बाद नहीं भूल तो जाते तुम्हें.... लेकिन डबडबाई हुई झील सी आंखें मुझे भूलने नहीं दे रही है। वो नजर कहां से लाऊं जो तुम्हें भुला दे वो दवा कंहा से लाऊं जो इस दर्द को मिटा दे... जो लिखा है तकदिर में वो हो कर रहेगा... मैं वह तकदिर कहां से लाऊं जो हम दोनों को मिला दे.... कभी हम ख्वाब देखा करते थे अपने वनों में स्वर्ग का... अब वहां आत्मा विरचती है जहां कभी हमारा स्वर्ग हुआ करता था...पर अब भटक रही है क्यों भटक रही है मेरे पास इसका कोई संतोष जनक जवाब नहीं है और मैं तुम्हारे बारे में कोई राय भी नहीं बनाना चाहता....बस मैं इतना ही जानता हूं सैफ़ी... तुम्हारे प्रेम के संदूक में मेरे लिए जो जगह खाली थी... शायद वह स्पेस आज भी है...  मैं तुम्हारे उस संदूक के तंबू की तिरपाल तक भी नहीं पहुंच पाया पर... मैंने बहुत कुछ सीखा है तुमसे और बड़ी ही गहरी स्वीकृति से क्या सीखा पता नहीं...शायद विश्वास, शायद निष्ठा, शायद प्रेम....शायद पता नहीं....

पर अब रात होते ही वह चांद हमें दुहाई देने लगता है...जो कभी हमारे प्यार का इकलौता गवाह हुआ करता था....मेरा मज़हब सिर्फ प्रेम था और तुम इसके अकेली सिद्धांत हुआ करती थी। तुम्हें पता है सैफ़ी आज भी संभाल के रखा है मैंने वो कागज का टुकड़ा जिसमें तुमने लिखा था मुझे तुमसे मोहब्बत है। तो क्या तुम्हारा प्रेम दिखावा था? नहीं तुम्हारा प्रेम दिखावा नहीं हो सकता... तुम प्यार करती थी या शायद करती हो...क्योंकि तुम्हें प्रेम में उतना ही यकीन था जितना की कोई इंसान मौत पर करता है। ये तुम्हारी निष्ठा है प्रेम के प्रति पर मैंने कभी इस निष्ठा को पहचाना ही नहीं.... पर अब जब तुम नहीं हो...यह एक टीस बन कर दिल में चुभने लगा है... दिल से उठी यह टीस अब स्याही बनकर कलम से गुजर जाती है, वो सुफेद सफे के लिबास पर नज़्म बनकर बीछ जाती है। अब जब भी कोई आईना सामने आता है उसमें भी तेरी ही तस्वीर नजर आती है। न चाहते हुए भी उसे छोड़कर आना पड़ता है... आज बस तुम्हें बस एक बात बताना चाहता हूं सैफ़ी... तुम इम्तिहान में ना आने वाले सवाल जैसे बन गई हो दूर होकर भी पास लगती हो....


मेरे लहु का एक कतरा भी तो ऐसा नहीं जिसमें तुम नहीं हो... प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी तू बता की तुझे प्यार करू या नहीं....तेरी जुदाई भी हमें प्यार करती है सैफ़ी... तुम्हारी यादे मुझे बार-बार बेकरार कर देती है...वह दिन जो तेरे साथ गुजरे थे.... अब नज़रे बार-बार उसे तलाश करती है। मैं लिखता हूं सिर्फ तुम्हें अपने वजूद में जिंदा रखने के लिए... मेरे हर एक सांसो में तुम ही तुम हो...जानती हो सैफ़ी तुझे लगता है जिस-जिस ने मुहब्बत किया है खुदा ने अपने वजूद को बचाने के लिए उनको जुदा कर दिया है। तुम बेवफा नहीं हो और न ही 'मैं' बेवफा हूं ये तो वक्त का सितम था जो उस दिन हमदोनों के ऊपर तुफान बनकर आया था.... वो आया और हम दोनों को उड़ा ले गया दो राहों में... पर यादों की यही एक बात अच्छी होती है सैफ़ी... चाहे यादे खुशी की हो या फिर तकलीफ की हमेशा साथ होती है कम से कम तुम्हारे तरह तन्हा तो नहीं छोड़ती तुम्हें याद है तुमने इस महीने को मिस्टिरीअस मार्च नाम दिया था और यह है भी बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ नहीं आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस मार्च! 

Friday, 24 February 2017

प्रिय निधी

सर्द, सीलन और स्मृतियों के दौरान तुम्हारी यादे हां और न के बीच डोल रही है, लेकिन तुम्हारी यादों में अब वो स्नेह नहीं जो विघ्नों के सहारे बहा करता था। वह मोह नहीं जो पीड़ा की नाव पर स्वप्नलोक की दुनिया में घर बनाया करता था, लेकिन एक चेहरा धुंधला-धुंधला जो कुछ कहना चाह रहा है पर कह नहीं पाता। तुम्हारे शब्दों की यह चुभन मैं सह भी तो नहीं पा रहा। जो शायद तुमने कभी लिखी थी। यहां वहां भटकते हुए उपवन में पीर उदासी के सावन में जो तुम सुनाना चाहती थी...पर सुना नहीं पाई...जो अब जख्म बनकर रिसने लगा है। मेरे आखों में.... राते डूब जाती है। तुम्हारे दर्द पालते-पालते कोई आहट नहीं फिर भी एक आवाज की साया कच्ची नींद से अक्सर रात में इसने मुझे बार-बार जगाया है। उस आवाज में अब वह सूर नहीं वह ताल नहीं जो पहले हुआ करता था। अगर अब कुछ है तो सिर्फ दर्द, पीड़ा, आह, तड़प, लाचारी और बेबसी जो मुझे बार-बार सर्द, सीलन और स्मृतियों की गंध के बीच बेचैन कर रहा है।

तुम सच में जा चुकी हो पर तुम्हारी यादों पर मैं पेहरा नहीं लगा पा रहा हूं। तुम्हारी यादे बार-बार आ जाती है। तुम्हारे यादों को मिटाने के लिए मैंने तुम्हारे दिए हर खत और गिफ्ट को रात के घोर अंधेरे में विश्वविद्यालय के बाहर कुड़े के ढ़ेर में फेक आया था। पर आज लक्ष्मीनगर में अपने कमरे की छत पर जाकर उन गिफ्टों और खतों की ओर निहारता हूं उसे खोजता हूं। नाम कुछ ऐसे लिख दिये हो तुमने मेरे वजूद पर कि मैं जब भी तुम्हें भुलना चाहता हूं। अपना वजूद ही मिटने लगता है। जब तुम थी मैं बांटा करता था दर्द, पीड़ा, आह, तड़प, लाचारी, बेबसी की दबा पर आज अपने ही दुकान पर आ कर खड़ा हो गया हूं।


मैं जानता हूं मेरे हर लफ्ज़ तुम्हें खंजर से भी गहरा जख्म दिया करते थे, लेकिन तुमने कभी उन जख्मों की प्रवाह नहीं की तुम्हारे चांद नुमा चेहरे को चाहने वाले हजारों आश्कि तुम्हारे दिल के सकरी गलियों में तौलिया लपेटे खड़े थे पर तुमने कभी उन सबको नजर तक उठा कर नहीं देखा... ये तुम्हारी निष्ठा थी मेरे प्रेम के प्रति...पर मैं तुम्हारे इस निष्ठा से हमेशा दूर भागता रहा। मैं भी तुम्हें उतना ही चाहता था जितना शायद तुम...पर मेरे पास तुम्हारे स्वप्नलोक की दुनिया के लिए वक्त नहीं था और शायद आज भी नहीं है। किताबों के बीच रहने वाला व्यक्ति ऐसे ही हो जाता है। प्रेमहीन, भावहीन, तर्कहीन, संवेदनाहीन, कल्पनाहीन जो किसी के फीलिंग, इमोसन को नहीं समझता बिल्कुल दैत्यनुमा जो मैं था और शायद आज भी हूं।

पर अब जब तुम मेरी जिंदगी से जा चुकी हो। खुद को मेरे दिल में ही छोड़ कर, मुझे तो ठीक से बिछड़ना भी नहीं आया....तुम्हारी वो बातें जो तुम मुझे बताना चाहती थी जख्म बनकर रिसने लगी है। जिस तन्हाई और खामोशी से मुझे लगाव था। आज वहीं खामोशी कितनी शोर मचा रही है। कानों के परदे फाड़ देने वाली शोर जिसे सहन करना आसान नहीं...अब ऐसा प्रतीत होने लगा है। जैसे मैं पागल हो रहा हूं। कभी-कभी सोचता हूं कि तुम्हारे बिना पागलपन के इस ओर रखने वाली सीमित कर देने वाली रेखा कितनी पतली सी हो गई है। शायद उतनी पतली जितनी घृणा और प्रेम के बीच होता है या फिर स्नेह और वैराग्य के बीच में या यातना और क्रूरता में होती है। ठीक उतनी ही रह गई है।



तो क्या मैं सच में पागल हो जाउंगा...कल रात मैंने तुम्हारी सारी बाते कमरे की दीवार पर लिख डाले तुम्हें यह एक तमाशा लग सकता है, लेकिन ये शब्द ही तो होते थे हमारे बीच की सेतु गिने चुने सीमाएं ओढ़े वो कुछ जो लिखा ही नहीं गया हो अब तलक... जो कहा ही नहीं गया अब तलक पर रिस रहा है। जो पहले कुछ पनपते थे शब्दों के अंधियारे में इस ओर भी शायद उस ओर भी....सच बताऊं तो मैं अंधियारे में जाना ही नहीं चाहता कल्पना में भी नहीं क्योंकि मैं जानता हूं कि अंधियारे के बाद उजाला होता है और उजाला कभी झूठ नहीं बोलता यह सब सच बयां कर देता है।

इस लिए मैं अंधियारे से डरता हूं... तुम्हारे रिक्त पड़े प्रेम के स्पेस को मैंने यादों के ढेर से भर रखा है। प्रेम की महक की जगह दर्द, पीड़ा, आह, तड़प की महक आने लगी है। प्रिय  तुम तो जानती हो इश्क करने वालों को कैसे बेअदबी, बेरुमानियत, लाचारी, बदनसीबी की चौखट पर दम तोड़ने पड़ते है। यह सच है तुम्हारा प्रेम दिखावा नहीं था और सच मैं प्रेम नुमाइस की वस्तु नहीं है। यह तो बस महसूस और महफूज करने की चीज है। पर क्या करें जिंदगी है...और जिंदगी के अपने ही बुने हुए जंजाल हैं... काश जिंदगी उस लौ की मानिंद ना होती जिसमें जलने का दस्तूर होता है...और जीये जाने की बंदिश होती है...वैसे भी जिंदगी में इतनी ख्वाहिशें होती हैं कि हर ख्वाहिश पर दम निकलता है... दम के साथ अरमानो की भीड़ भी निकलती है। ये अधूरी कहानी, अधूरे अरमान तुम्हारे साथ गुज़रे उन हसीन लम्हों के ग़ुबार हैं। कभी देखना ये तुम्हारी यादों के हर पड़ाव पर मिलेंगे, हर एक रहगुज़र पर उड़ रहे हैं... उन्हें देखकर धबराना मत... मैं वहीं हूं, रास्ते वही हैं, और वो चांद जो हम साथ देखा करते थे, वही है... कुछ नहीं है तो बस मेरी तुम...