Thursday, 18 June 2015

राजनीति जिसका अर्थ है राज की नीति। नीति भी ऐसी जो सबका साथ, सबके विकास की न्याय राह पर चले। यानी न्याय के साथ विकास। यह कोई नरेंद्र मोदी या नीतीश कुमार के राजनीतिक नारों का प्रचार नहीं है। बल्कि "न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।" राजधर्म भीष्म पितामह से अटल विहारी वाजपेई तक अपना असल अर्थ खोज रहा है। पितामह ने राजधर्म में निरंतर पूरुषार्थ और उसके जरिए जनकल्याण को राजा का पहला और महत्वपूर्ण कर्तव्य माना, और कहा कि राजा ऐसा हो जो प्रजा के हित में सोचे समझे। उनके लिए काम करे और समाज के हर वर्ग को प्रत्येक कार्यक्षेत्र में समान अवसर प्रदान करें, लेकिन आज राजनीति का स्वरूप बदलता जा रहा है। राजा से नेता बने सामाजिक कार्यकर्ता की नीति बदल गई है। और उनकी कार्यशैली बदल गई है। सब नेता अर्जुन बन गए हैं। जिनका एक ही लक्ष्य है मछली की आंख की जगह, सत्ता की कुर्सी हथियाना। किसी भी कीमत पर। साध्य को साधने के लिए साधन चाहे जो हो।

हम जो आज राजनीति देख रहे हैं। वह कायदे से राजनीति भी नहीं है, बल्कि "कुनीति" है! जिसमें ना देश का हित होता है, और ना ही जनहित। यहां बस लुट की प्रतिस्पर्धा होती है। यह पुरे भारत के संदर्भ में देखने को मिल जाता है। पर, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील और जागरूक राज्य बिहार की बात करें तो चुनावी राजनीति की जनप्रयोग-शाला में आवाम पर आम और लीची भारी पड़ रहा है। जो कभी एक दूसरे को सुहाते नहीं थे आज गलबहियां डाले हुए हैं। राजनीति के इसी रूप को बिहार में देखा जा सकता है। जहां सुशासन बाबू को आवाम की चींता से ज्यादा आम की चिंता सता रही है। कभी बिहार का इतिहास ही भारत का इतिहास हुआ करता था। गौरवमयी इतिहास-परंपरा को देखे तो बिहार, जहां विश्व का सबसे पहला गणतंत्र ''लिच्छवी'' गंगा की इसी पवित्र ज़मीन पर सांस ले रहा था। तब शायद किसी ने गणतंत्र की कल्पना भी नहीं की होगी। वहीं अगर हम बात करें वैदिक काल की तो गंगा के उत्तरी किनारे पर बसा विदेह राज्य, जहां सीता का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मिकि ने बिहार में रहकर ही रमायण की रचना की। महात्मा बुद्ध को बिहार में ही महापरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई, और वोद्ध धर्म का केंन्द्र भी बिहार को ही माना गया।

जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर का जन्म बिहार में ही हुआ। सिक्खों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह भी पटना में ही पैदा हुए। भारतीय इतिहास के महानतम शासक सम्राट अशोक, सर्जरी के जन्मदाता महर्षि सुश्रुत, गणित का विशव को ज्ञान देने वाले आर्यभट्ट, राजनीति और कुटनीति का पाठ पढ़ाने वाले चाणक्य इसी बिहार की धरती पर उपजे, और जब देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ था। तो महात्मा गांधी ने देश को आजाद कराने के लिए चम्पारन सत्यग्रह और भारत छोड़ अंदोलन की शुरुआत इसी पवित्र धरती से की। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो स्वतंत्रता के बाद भी देश की राजनीति में बिहार की बहुत ही अहम भूमिका रही। इंदिरा गांधी की तानाशाही का सबसे पहला विरोध बिहार में ही हुआ। जय प्रकाश के नेतृत्व में, इंदिरा सरकार की कुनीतियों के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा था, और यही कारण रहा की 1977 में इंदिरा विरोधी जनता पार्टी सत्ता में आई जो जेपी आंदोलन का ही सीधा असर था।

जब श्रीकृष्ण बाबू बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने तो उनके नेतृत्व में बिहार देश का सबसे व्यवस्थित राज्य बना, लेकिन धीरे-धीरे जाति आधारित राजनीति ने बिहार में अपनी जड़े जमानी शुरू कर दी। जिससे राज्य के हालात बिगड़ते गए। उसी का असर आज बिहार में देखने को मिल रहा है। जिस पुलिस बल को जनता की सेवा में तैनात किया जाता है। उन्हीं पुलिसवालों को आम और लीची के पेड़ों की सुरक्षा मे तैनात किया जा रहा है। वहीं 2012 के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 1492 लोगों की सुरक्षा एक पुलिसवाले के जिम्मे है। यानी 1 लाख लोगों की सुरक्षा में 67 पुलिस वाले तैनात है। जो देश में सबसे कम है। तो वही सुशासन बाबू ने 4 पेड़ों की रखवाली के लिए 1 पुलिसवाले की तैनाती की हुई है। इस पर सूबे के मुखिया नीतीश कुमार कहते हैं कि उनकी सरकार को आवाम की चींता है न की आम की। दरअसल बदले समीकरणों के बीच बिहार जंगल राज बनाम सांप्रदायिकता की युद्ध भुमि बन रहा है। देखना है कि राजनीति के कितने रंग बन-बिगड़ रहे हैं। सभी नेता बिहार की मजबूत एतिहासिक विरासत की बात तो करते हैं, लेकिन पता नही उसे मान क्यों नहीं देते ? जाति-उपजाति की लड़ाई आखिर बिहार का भविष्य कैसे उज्जवल बना सकती है।  

Thursday, 14 May 2015

कहा जाता है कि मनुष्य की कहानी आज से दस लाख वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। लोग जंगलों में रहा करते थे। जानवरों का शिकार करके अपना भरण-पोषण किया करते थे। धीरे-धीरे लोगों में जागृति आई और वे जंगल छोड़ शहरों और गांवो में रहने लगे, विज्ञान ने प्रगृति की और विकास की धारा बहने गली। जिसने जीने के नए ढ़ंग दिए बड़ी-बड़ी इमारते भागती दोड़ती गाड़ियां। मस्ती करने के लिए पब-डिस्को खाने के लिए पिज्जा-बर्गर, नुडल्स और न जाने क्या-क्या ? हम आदिकाल से निकल कर तकनीकि काल में पहुंच गए ! विश्व के मानचित्र पर विकसित देशों की होड़ में शामिल हो गये। हम चांद पर पहुंच गये। विकास के बड़े-बड़े दावे भी किये गये है और किये जा रहे है, लेकिन इस तकनीकि काल में भी एक तबका ऐसा है जो आदिकाल में ही जीवन जीने को विवश है।

कहने को तो हम तकनीकिल काल में है, लेकिन हमारे देश में बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिन-दिन भर जंगलों और खेतों में घुम-घुम कर कर पापी पेट की आग को बुझाने के लिए मिलो-मिल पागलों की तरह भटकते रहते है, तब जा कर वह अपने और अपने परिवार के लिए कुछ शिकार कर पाते है फिर जा कर घर रोशन होता है और चुल्हा जलता है। हम 21वीं शदीं में है पर सही मायने में उस परिवार के लिए ये 21वी शदीं या तकनीकि काल किस काम की जिसे खाने को लाले पड़े हो। ये विकास किस काम का जिस देश में अभी भी लोग ऐसे जीवन जीने को मजबूर हो। आज हमारे पास बड़ी-बड़ी सड़के भागती दैड़ती गाड़ियां मैट्रो, मोनो रेल, हवाई जहाज और न जाने क्या-क्या हैं ? लेकिन इस वर्ग को इन सारी चीजों से क्या मतलब ! वे तो अब भी दिन-दिन भर जद्दोजहद कर पापी पेट की आग को ही बूझा पाते है, और किल्लत भरी जिंदगी जिने को मजबूर है। इनके लिए न तो सरकार कुछ कर रही है और न ही कोई गैरसरकारी संस्था ही।


उन्हें अब भी ये सीरी बाते सपने जैसा ही लगता है, और लगे भी क्यों नहीं जो इंसान दिन-रात जद्दोजहद कर बस दो वक्त की खाने का ही बंदोबस्त कर पाता हो। उसमें भी जंगली जानवर या चुहा उसके खाने के मुख्य आहर हो उनके लिये ये सपना नहीं तो और क्या है। उनके लिये स्कूल-कॉलेज पब-डिस्को, पिज्जा-बर्गर सब सपना ही तो है। उन्हें तो इसका नाम तक नहीं पता। उनके जीवन में अब भी अंधेरा ही अंधेरा है। यह तबका अब भी आधुनिक सुविधाओं से मिलों दूर है। उन्हें इन सीरी चीजों से कोई मतलब नहीं है। उन्हें तो जिंदा रहने के लिये शिकार करना है और जिंदगी जिना है। ऐसे की तबका के कुछ लोगों से जब मैं मिला तो उनको मैंने बाहर की दुनियां के बारे में बताया तो उनके लियें ये सारी बाते एक कहानी की तरह लग रहा था जैसे हमें बचपन में दादी-नानी परियों की कहानी सुनाया करती थी और हम कल्पना कर उस परियों में खो जाते ठीक वैसे ही ये लोग भी उसी तरह कल्पना कर उसमें खो जाते है। कुछ पल का सुख पा कर फिर हकीकत में आ जाते हैं, और शायद यह सोचते है कि उनका यह सपना कब पूरा होगा या यू ही मर-मर कर जिंदगी का गुजारा होगा।

Thursday, 7 May 2015

बॉलीवुड के दबंग अभिनेता सलमान खान को 13 साल पुराने हिट एंड रन मामले में मुंबई के सत्र न्यायालय के फैसले से एक बार फिर न्याय पर लोगों का भरोसा मजबूत हुआ है। लोगों ने ऐसा भी होते देख लिया जब कोई हिरो रोता हो भारतीय न्याय प्रणाली ने एक बात का सबूत तो जरूर दे दिया है कि चाहे कोई कितना भी दबंग क्यों न हो लेकिन जब कठघरे में खड़ा होतो है तो, अंग दब-सा जाता है। मजबूत दिल कमजोर पड़ने लगता है सिक्स पैक भी ढीले पढ़ने लगते है। सारा हिरोगीरी हवा होनें लगता है। वो कहते है कि मैं किसी की नहीं सुनता, अपने आप की भी नहीं सुनता। किसी की न सुनने वाले को एक दिन कीमत तो चुकानी ही पड़ती है, क्योंकि जब वह किसी की नहीं सुनता तो गलती कर बैठता है, और हर गलती कीमत मांगती है, शायद इस गलती का किमत पांच साल की सजा हो। 

सलमान को मिले सजा से मैं दुखी हूं पर सलमान के ऊपर जैसे आरोप लगे है या जिसमें वो दोषी पाये गये है। उन पर सलमान को खुद ही अमल करना होगा वो दोषी है या नहीं मुझे नहीं पाता ? पर मैं जिस सलमान को पसंद करता हूं वो 'मैंने प्यार किया, हम आप के है कौन साजन' के थे। जो थोड़ा शर्मिला थोड़ा चुलबुला अपने बदमासियों से लोगों के दिलों पर राज करने वाला अपने धून का पक्का सलमान जो उनके चेहरे पर झलकता भी था। आपने धिरे-धिरे बॉलीवुड में पांव जमाया और आपकी फिल्में सौ करोड़ के आकड़ों को पार करने लगा सारे सुपर स्टार आपके सामने फूस होने लगे। लोगों ने आप को चाहा है। आप उनकी चाहत का ख्याल रखे। हम सब किसी न किसी छोटे बड़े गुणाह की सजा भुकते रहते है। कभी अंदर से तो कभी बाहर से लेकिन आप उन लोगों के बारे में भी सोचे जिसने आपके कार के नीचे आ कर, जान गवाया है। आप उनके परिवार के बारे में सोचे वो पिछले 13 सोलों से कैसे जी रहे है।शायद वो भी आपको चाहने वाला ही रहा हो। आप उन्हें मदद करे इस में दो राय नहीं की आप ने बहुत असहाय लोगों की मदद की है आप दोस्तो के दोस्त और तलबगारो के मददगार है।

आप अकेले नहीं है बॉलीवुड में जिसे सजा हुआ है। इस लिस्ट में संजय दत्त, मोनीका बेदी जैसे कई और स्टार भी शामील है। मोनीका बेदी जहां सजा काट कर बाहर आ चुकी है तो वहीं संजय दत्त सजा काट रहे है। आपको अभी सत्र न्यायालय में सजा मिला है। आप के पास अभी उच्च न्यायालय है जिसके दरवाजे आपने खटखटाया भी है। इसके बाद भी आप उच्चतम न्यायालय जा सकते है। लेकिन सब जगहों पर जाने से पहले आप एक बार सोच ले अगर आपको लगे की आप बेगुनाह है तो आप बेशक जाये अगर आप को जरा भी लगता है कि आप इस गुणाह में शामिल है तो मैं यही चाहुंगा कि आप इस का गुणाह का पराश्तिच करें, और फिर से वो सलमान बन कर आऐं। जो आप 'साजन, हम साथ साथ में' हुआ करते थे। तब जाकर आप सही में प्रेम रतनधन पायेंगे। नहीं तो आप किक ही कहलायेंगे।

Monday, 27 April 2015

Posted by Gautam singh Posted on 01:16 | No comments

किसने क्या खोया ?

वर्षो से हम लोग किताबों में पढ़ते आ रहे है भारत एक कृषि प्रधान देश है ! यह किसानों का देश है ! इस देश के किसान भारत की जान हैं, और किसानों से ही भारत महान है। यह सिर्फ कहने को रह गया है। यहां पर ही किसान मरता रहा तालियां बजती रही, किसान रोता रहा नेताएं चिल्लाते रहे, किसान कहता रहा नेता भाषण देते रहें, पुलिस देखता रहा, जनता हंसते रहे, मीडिया टीआरपी बटोरती रही, पार्टियों लड़ती रही आखिर इल लोगों ने क्या खोया ? आम आदमी पार्टी ने क्या खोया ?, बीजेपी ने क्या खोया कांग्रेस ने क्या खोया ? मीडिया ने क्या खोया ?, खोया तो राजस्थान के दौसा में गजेंद्र के परिवार ने मां-बाप ने बेटा खोया, पत्नी ने पति खोया बहन ने भाई खोया, बच्चों ने पिता खोया।
पर इस भारत महान में राजनेता इस तरह के मुद्दों पर भी सियासी रोटी सेकना नहीं भूलते किसान गजेंद्र अब इस दुनियां में नहीं है। लेकिन पिछले तीन दिनों से जिस प्रकार से राजनीति और मीडिया में हाय-तोबा हो रहीं है। उससे क्या किसान गजेंद्र वापस आ जायेंगे या किसान आत्महत्या करना बंद कर देगें। अथवा उनका माली हालात बदल जाएगें ? कहते है किसान वह व्यक्ति है जो खेती का काम करता है। अपनी मेहनत के बीज डाल कर अपने पसीने से सीच कर फसल पैदा करता है तब जाकर आम जनता को भोजन मिल पाता है। शायद इस लिए उसे देश का अन्नदाता भी कहा जाता है। लेकिन पिछले दो दशक से इसी देश में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके है। इन 68 वर्षो में न जाने कितने सरकारें बदली, पार्टिंयां बदली पर देश के किसान के हालात नहीं बदले। आए दिन किसानों के आत्महत्या की खबरें आ रही है। यह सिलसिला कब रूकेगा ? कहां रूकेगा ? या यूं ही हमारे देश का किसान मरता रहेगा ? किसी को नहीं पता।


आज भी हमारे देश के किसान अन्य विकसित देशों की अपेक्षा बहुत पिछड़े हैं, चाहे आर्थिक स्थिति के मामले में हो या तकनीक के मामले में। इस पिछड़ापन का क्या कारण है? आखिर इसमें देश की सरकार की क्या भूमिका हो सकती है? कृषि कार्य में आज भी भारतीय ग्रामीण जनता का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा कार्यरत है, फिर भी सरकार उस वर्ग की उपेक्षा क्यों नहीं कर रही है? क्या देश के विकास में सिर्फ वही क्षेत्र आते हैं जो आर्थिक रूप से अधिक सहयोगी हैं। ऐसे अनेक सवाल हैं जो किसानों की समस्याओं से जुड़े हैं। आज ज़माना बदल गया है ! स्वार्थ सबके सर चढ़ कर बोल रहा है ! सब चीज़ें पैसे के तराज़ू पर तोली जाती हैं ! राजनीति ने इसे चर्म पर पंहुचा दिया है ! शायद यही कारण है कि पिछले 68 सालों में कृषि के लिए न जाने कितने स्किम आये पर वो किसानों तक पहुंचने से पहले ही निजी स्वार्थ के हिस्से जड़ गए, और हमारें किसान 21वीं शदीं में रहते हुए भी आत्महत्या करने पर आज भी विवश है। 

Monday, 6 April 2015

मैदान सज चुकी है खिलाड़ी दिखने और बिकने को तैयार है। ठीक उसी तरह जैसे सोनपुर के मेले में घोड़े बिकते हों लाल घोड़ा, काला घोड़ा, सफेद घोड़ा सब एक से बड़कर एक ! व्यपारी बोली लगाने को तैयार ठीक वैसे ही आईपीएल का रन सज चुका है यहां भी घोड़े की तरह देशी और विदेशी खिलाड़ी बिक चुके है। महेंद्र सिंह धोना, विराट कोहली, मैक्सवेल, युवराज सिंह, दिनेश कार्तिक और न जाने कौन कौन सब अपना खेल दिखाने को तैयार है। ठीक वैसे ही जैसे कोई मदारी अपने बंदर को बोलते ही वह अपना करतब दिखाना शुरू कर देता। वैसे ही यहां भी सभी खिलाड़ी अपने-अपने खेल की नुमाईस के लिए तैयार है।
आईपीएल आठ यानी 'इंडियन पैसा लीग' की आगाज आठ अप्रेल से हो रहा है। इसके जादू से एक बार फिर क्रिकेट प्रेमी काम-काज नौकरी-धंधा पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक कि खाना-पीना और शरीर की दूसरी अति महत्वपूर्ण जैविक क्रियाओं पर भी जबरिया रोक लगा कर बस 'इंडियन पैसा लीग' के झंपिंग झपांग झंपक-झंपक, ढंपिंग-ढपांग में मशगूल हो जाएंगे। मनोरंजन के नाम पर बड़े-बड़े डीजे और हर चैके-छक्के पर छोटे छोटे कपड़ों में नाचते तथा अपनी टीमों का हौसलाफ्जाई करती चीयरलीडर्स और पागलों के तरह हल्ला करते क्रिकेट प्रेमी अजीब पागलपंथी देखने को मिलेगा।

वैसे तो आईपीएल (इंडियन पैसा लीग) के साथ विवादों का सुरू से ही चोलि दामन का नाता रहा है। आईपीएल के सीजन 6 में स्पॉट फिक्सिंग में तीन खिलाडि़यों की गिरफ्तारी के बाद ये मांग उठने लगा था कि क्या आईपीएल को बंद कर दिया जाना चाहिए ? इससे पहले के संस्करण में भी अनेक विवाद आईपीएल की झोली में आए, जिसमें खिलाड़ियों द्वारा स्टेडियम में नशीले पदार्थ का उपयोग करने से लेकर चियर्स गर्ल का अशलील नांच और मैच के बाद होने वाली रेव पार्टी काफी जयादा सुर्खीयों में रही है। देश के एक अरब लोगों का मनोरंजन करने वाले क्रिकेटर इस तरह मुंह काला कर घूमेने के बावजूद भी आईपीएल के प्रति लोगों का जुनून साल दर साल कमने के वजाय और बढ़ता ही जा रहा है।

एक जमाना था क्रिकेट जेंटलमेन गेम हुआ करता था, खिलाड़ी एक दूसरे का सम्मान किया करते थे। मैदान में सिर्फ हाउजदैट की आवाज भर सुनाई देतीं थी, और दर्शक चिन्तनकारों की तरह गैलरियों में बैठकर चैके-छक्के पड़ने पर इस तरह होले-होले तालियाँ बजा दिया करते थे। जैसे खिलाड़ियों पर एहसान कर रहे हों। खिलाड़ी घूमते-फिरते, खाते-पीते, टहलते हुए पाँच दिन का टेस्ट मैच निबटा लिया करते थे। मगर अब खेल के मायने बदल गये है। खेल के नाम पर झंपिंग झपांग ढंपिंग ढपांग का जमाना है। आजकल सीख दी जा रही है कि शराफत छोड़ो, कपड़े फाड़ कर पागलपन पर उतर आओ। घर-बार, नौकरी-चाकरी, स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई-लिखाई छोड़कर मेंटलमैन बन जाओ। लिहाजा मैच में आठ-दस पागल किस्म की चीयरगर्ल्‍स का झुंड बिना थके नाच-नाचकर खिलाड़ियों व दर्शकों का मनोबल बढ़ाएगा, और उधर घर में बैठकर टी.वी में घुसे पड़े तमाम लोग अपनी झंपक-झंपक से अड़ौसियों-पड़ौसियों के जीना हराम करेंगे। 

Friday, 3 April 2015

हरियाणा के बहुचर्चित और विवादास्पद आईएएस अशोक खेमका एक ऐसे अकेले अधिकारी नहीं है, जो अपने ईमानदारी के लिए सुर्खियों में आए हो और जिन्हें अपनी ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ रही हो। इस क्रम में संजीव चतुर्वेदी, प्रदीप कासनी जैसे कई और भी अधिकारी है जिन्हें सरकारे बोझ की तरह मानती है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हरियाणा के खट्टर सरकार ने पेस किया कभी सोनिया गांधी के दमाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के जमीन सौदे पर सवाल उठाने की वजह से ही अशोक खेमका को, पिछली हुड्डा सरकार ने पुरातत्व और संग्रालय जैसे कम महत्व वाले विभाग में भेज दिया था। हैरत की बात यह है कि कभी इसी मुद्दे को लेकर हुड्डा सरकार को घेरने वाली बीजेपी आज खुद अशोक खेमका जैसे अधिकारी को फिर से पुरातत्व और संग्रालय जैसे कम महत्व वाले विभाग में भेज रही है। 


पुरातत्व जैसे विषय में नेताओं की भी कोई खास दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि उससे न तो वोट, न ही धन जुड़ा है। वहीं परिवहन विभाग प्रभावशाली विभाग माना जाता है, क्योंकि उससे सीधे जनता प्रभावित होती है। परिवहन विभाग अमूमन सबसे ज्यादा भ्रष्ट विभागों में से एक होता है, क्योंकि व्यावसायिक परिवहन में तमाम लाइसेंस, परमिट का कारोबार होता है। खेमका ने परिवहन विभाग में आयुक्त और सचिव रहते हुए अवैध ट्रको और ट्रेलरो के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी और ओवरसाइज वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने से इन्कार कर बड़ी ट्रांसपोर्ट लॉबी को नाराज कर दिया था।

अशोक खेमका को नौकरी में 22 वर्ष हो गए और उनके तबादलों का अर्धशतक करीब ही है। यानी हर साल औसतन उनका दो बार तबादला हुआ। जिससे समझा जा सकता है कि सूबे की सरकारों के साथ उनके रिश्ते कैसे रहे हैं। उल्लेखनीय यह है कि उनके खिलाफ कभी भी किसी तरह की गड़बड़ी नहीं पाई गई है, बल्कि उन्होंने नियमों और कायदों को लेकर रसूखदार लोगों से टकराने में कभी हिचक नहीं दिखाई।

जब हरियाणा में कांग्रेस सरकार थी, तब खेमका भाजपा के प्रिय थे, क्योंकि वह रॉबर्ट वाड्रा के कारोबार की गड़बड़ियों को उजागर कर रहे थे। तब कांग्रेस सरकार ने उन्हें प्रताड़ित करने की भरपूर कोशिश की। मगर पिछले दिनों आई सीएजी की रिपोर्ट से यह जाहिर हुआ कि खेमका ने जो आपत्तियां उठाई थीं, वे जायज थीं। हमारे देश में राजनीति व प्रशासन में नियमों के विरुद्ध लोगों को उपकृत करना ही नियम बन गया है, नियमों का पालन करना अपवाद है।


साफ है, परिवहन जैसे विभाग की सफाई कोई एक अफसर नहीं कर सकता, भले ही वह विभाग का सचिव हो। उसे राजनीतिक समर्थन की भी जरूरत गीयह अच्छा है कि हरियाणा सरकार में ही खेमका को समर्थन भी मिल रहा है। वरिष्ठ मंत्री अनिल विज ने उन्हें हटाए जाने का विरोध किया है। वहीं सीएम खट्टर इसे रुटींग तबादला बता रहें हो लेकिन आम जनता सच्चे और ईमानदार लोगों को चाहती है, यह बार-बार साबित हो चुका है। ऐसे में हमारे सत्ताधीशों और आम जनता के बीच इतना बड़ा फर्क क्यों है कि वे ईमानदार सरकारी कर्मचारी को पुरातत्व के लायक ही समझते हैं। 

Saturday, 21 March 2015


गांधी जयंती के मौके पर सूर्य अपने चमक के साथ पूर्व दिशा से संपूर्ण धरती को अपनी किरणों से रोशन कर रहा था। तब हमारा देश एक नई क्रांती के लिए जाग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महात्वाकांक्षी योजना 'स्वच्छ भारत अभियान' की ज्योत जगा रहा था। उस दिन पूरे देश के लोगों ने शानदार एकता और अखण्डता का परिचय देते हुए भरपुर जोश और उत्साह के साथ प्रतिज्ञा लेकर स्वच्छ भारत के इस महान कार्य, जो गांधी जी के स्वच्छ भारत का अधूरा सपना भी था, के प्रति पूर्ण समर्थन, समर्पण दिखाया वो निश्चित रूप से महान और लाजवाब था।

गाँधीजी का सपना था कि हमारा भारत स्वच्छ हो, पर शायद ऐसे नहीं जैसे कि आज सरकारी मशीनरी ने किया है। कि पहले राजनेताओं की सफाई करने के लिये कचरा फैलाया और बाद में उनसे झाड़ू लगवाई जैसे कि वाकई सभी जगह सफाई की गई है। वैसे प्रधानमंत्री जी तो केवल सांकेतिक रूप से ही अभियान की शुरुआत कर सकते थे, और उन्होंने किया भी और कर भी रहे है, प्रधानमंत्री लगातार 'स्वच्छ भारत अभियान' में नए-नए लोगों को जोड़ भी रहे है। शुरु में लोगों ने इस अभियान में दिलचस्पी भी दिखाई और बहुत लोग अभी भी दिखा रहे है। लेकिन क्या माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा बनाया गया स्वच्छ भारत अभियान काम कर रहा है या सिर्फ एक दिखावा है।


हम सभी लोग जानते है की माननीय श्री मोदी जी ने जब यह घोषणा की तो बहुत सारी बातें हुवी पर समय और स्थिति को देख कर सब शान्त हो गए। आपने अपने आस पास कितनी स्वच्छ्ता देखी अब तक और कितनी कोशिस कि भारत को स्वच्छ करने की? स्वछता अभियान चलाना बहुत अच्छी बात है पर उससे ज्यादा अच्छी बात ये होती जब हमलोग इस पर अम्ल करते दिल से सिर्फ दिखावे के लिए नहीं। मेरा अनुरोध है की लोग इसे अपना कर्तव्य समझे। शुरूआत की, लेकिन क्या पीएम मोदी जी द्वारा बनाया गया स्वच्छ भारत अभियान काम कर रहा है या सिर्फ एक दिखावा बन कर रह गया है।

इसका जीता जागता उदाहरण मुझे उस समय मिला जब मैं क्रांती की भूमी मेरठ पहूंचा मैं मेरठ से दिल्ली आने के लिए एक गाड़ी में बैठा उस गाड़ी में मेरे पिछे वाली सीट पर दो महिलाएं अपने बच्चे के साथ बैठी। उस में एक महिला अपने बच्चे को केला खिलाकर छिल्का रोड़ पर गिरा दी। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है की भारत के 125 करोड़ जनता के दिलों दिमाग पर किड़ा सवार है कहीं पर कुछ भी फैला दो लेकिन क्या हम इस आदत में बदलाव नहीं कर सकते हम जब तक नहीं बदलेंगे तब तक स्वच्छ भारत अभियान का कोई मायने नहीं होगा।

सियासत को मारो गोली, इसने बहुत हैं जहर घोली, छोड़ो अब राजनीति की बात ,सोचे सबके हित की बात, ऐसा मिशन चलाये जिस से सबका हो कल्याण, आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान
करें इस ब्याधि का समूल अंतिम-संस्कार, ताकि परम आदरणीय बापू का सपना हो साकार, हम विश्व-पटल पर बनकर उभरे एक नया कृतिमान,आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान