Tuesday, 13 January 2015

विद्यानिवास मिश्र भारतीय मनीषा के प्रतिनिधि चिंतको में से हैं। भारतीय परंपरा, सनातन जीवन मूल्यों को लेकर आग्रह अंत तक बना रहा। क्योंकि वह ऋग्वैदिक ऋषियों से लेकर कबीर, तुलसी, रैदास और भक्तिकाल के संतों-कवियों के चिंतन से प्रेरणा लेकर परंपरा और भारतीयता को बांचाते थे। हिन्दू धर्म को लेकर वह न तो सुरक्षात्मक बुद्धिजीवी थे और न ही उनका सनातन की खोज पर भरोसा कम हुआ ! '' प्रभुजी, तुम चंदन हम पानी '' जैसी थी उनकी विनम्रता। विद्यानिवास मिश्र हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार, सफल सम्पादक, संस्कृत-हिंदी के प्रकांड विद्वान और जाने-माने भाषाविद थे। उनका कहना था कि भारतीय परंपरा जड़ नहीं है कि उस पर बाते ही न की जाय। हिन्दी साहित्य को अपने ललित और व्यक्तिव्यंजक निबंधों और लोक जीवन की सुगंध से सुवासित करने वाले विद्यानिवास मिश्र ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने आधुनिक विचारों को पारंपरिक सोच में खपाया था। बर्तोल्त ब्रेष्ट उनके प्रिय कवियों में से थे। उत्तर आधुनिकता जैसी चिंतन पद्धति ''चोटी के पंडित'' विद्यानिवास जी लिए सहज थी। वह ऐसे संस्कृत विद्वान थे जो एक साथ हिंदी, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान, दर्शन, कविता, विचार, वेद-पुराण में भी सिद्धहस्त थे।\

वह ऐसे बुजुर्ग थे जिन्हें अपनी परम्परा, विश्वासों और आस्थाओं के प्रति अटूट निष्ठा थी, जिसे वह आजीवन निभाते रहे। धोती-कुर्ता और माथे पर चन्दन उनकी पहचान थी, जो देश हो या विदेश कभी नहीं मिटी। विद्यानिवास मिश्र संपूर्ण विश्व को जीवन को जोड़कर देखने वाले भारतीय विचारक थे। पंडित जी के लिए 'मानुष सत्य' ही सर्वोपरि रहा, इसीलिये उनकी मूल चिंता 'विश्व मन की बेचैनी' को लेकर थी। उन्होंने कहना था मनुष्य ही सबकुछ है। मनुष्य की चिंता करनी चाहिए। मनुष्य है तो सब-कुछ है। पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंधों में जीवन दर्शन संस्कृत और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास मिश्र हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे। जो हिन्दी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे।

विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्धों की शुरुआत सन 1956 से होती है। परन्तु उनका पहला निबंध संग्रह 1976 में चितवन की छांह प्रकाश में आया। उन्होंने हिन्‍दी जगत को ललित निबन्‍ध परम्‍परा से अवगत कराया। 'तुम चन्‍दन हम पानी' शीर्षक से जो निबन्‍ध प्रकाशित हुए, उनमें संस्‍कृत साहित्‍य के सन्‍दर्भ का प्रयोग अधिक हो गया और पाण्‍डित्‍य प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण लालित्‍य दब गया, जो उनकी पहली दो रचनाओं में मिलता था। तीसरे निबन्‍ध संग्रह आंगन का पंछी और बनजार मन' में परिवर्तन आया। लोक संस्कृकि और लोक मानस उनके ललित  निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- 'राधा माधव रंग रंगी', 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है', 'शैफाली झर रही है', 'छितवन की छांह', 'बंजारा मन', 'तुम चंदन हम पानी', 'महाभारत का काव्यार्थ', 'भ्रमरानंद के पत्र', 'वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं' और 'साहित्य का खुला आकाश' आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियां है। एक स्पेनिश दार्शनिक के साथ उनके संवाद की पुस्तक स्पेनिश में प्रकाशित है जिसमें उन्होंने भारतीयता , परंपरा, सौंदर्यबोध को लेकर विचार हैं।


उन्होंने अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया तथा वर्ष 1967-68 में वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्येता रहे थे। मध्यप्रदेश में सूचना विभाग में कार्यरत रहने के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में आ गए। वे 1968 से 1977 तक वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे। कुछ वर्ष बाद वे इसी विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। काशी विद्यापीठ के भी वह कुलपति रहे। नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक पद पर भी आसीन रहे। उनकी उपलब्धियों की लंबी श्रृंखला है। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से भी विभूषित किया। इसके अतिरिक्त देश-विदेश के अनेक पुरस्कार-सम्मान उन्हें मिले। पर, पंडितजी के लिए इन उपलब्धियों से कहीं अधिक उनकी भारत, सनातन जीवन मूल्यके प्रति घोर विश्वास से सिक्त चिंतन है।उनका चिंतन और ज्ञान -परंपरा हमारे लिए आलोक स्तम्भ है। 

Wednesday, 24 December 2014

ऐसे दौर में जबकि विरोध और सवाल उठाना सम्भव नहीं है, वैसे में यह एक गुजारिश है बाजार की भावुकता और महानता से मुठभेड़ करने की।  तुलसी बाबा के शब्दों में कहें तो 'कहे बिना रहा नहीं जाता' ! और प्रख्यात विद्वान विद्यानिवास मिश्र ने कहने की लाचारी को साहित्य और रचाव की लाचारी कहा है ।
कोई माने या न माने .... सचिन को भारत रत्न… बाजार, मीडिया और मीडिया द्वारा सृजित अनुकूल 'जनमत' के कारण सोची-समझी रणनीति के कारण अचानक दिया गया। क्रिकेट के ज्वार और बाजार ने इसे सम्भव किया है। मुनाफाखोर लालची संस्कृति ने सम्भव किया है। यह असल समस्याओं से ध्यान भटकाने की भी साजिश है। लोग भूख, महंगाई, बीमारी, बेरोजगारी को भूल-भाल लोग सचिन को लेकर गदगद हो जाएं ! मंदिर बनवाकर पूजा करने लगें !  मेहनत, भय-भूख और संघर्ष की धरती बिहार में मंदिर भी बन रहा है। यह मानसिक गुलामी और दिवालियापन की हद है।


यह हमेशा होता है। सत्ता नयी-नयी तरकीब रचती है जिससे लोग उसी में उलझे रहें। फंसे रहें ! भारत रत्न नहीं पटाखा हो गया , जब चाहे फोड़ दो ! नागरिक पुरस्कारों का राजनीतिकरण हो गया है। यह दलगत स्वार्थ बनता जा रहा है। पद्म श्री, पद्म भूषण की लिस्ट उठा के देख लीजिये । ध्यान चंद, जो भारत के असल खेल रत्न हैं, जिन्होंने हिटलर के लुभावने प्रस्ताव को ठुकरा दिया था ! ध्यान चंद न सचिन की तरह टैक्स बचने वाले '' अभिनेता '' थे, न ही पैसे पर खेलने वाले खिलाड़ी। जिनके खेल और गोल की करतल ध्वनि को क्रिकेट के लीजेंड डॉन ब्रेडमैन ने भी देखा था। सराहा था। चूंकि ध्यानचंद अब नहीं हैं। उनके पीछे बाजार नहीं है ! विज्ञापनों की झूठ नहीं है। वे वोट की फसल नहीं हैं, सो सरकार और राजनीति को उनसे मतलब नहीं !

जब ध्यान चंद भारत का मान बढ़ा रहे थे, उस दौरान ब्रेकिंग न्यूज़ वाले न दीपक चौरसिया थे, न रवीश कुमार और न पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष आदि , जो लगातार खबर चलाकर-----खेलकर ---तानकर किसी को हीरो या जीरो बना देते ! 

'हमने भगवान' को खेलते देखा है। भारत में क्रिकेट धर्म है और सचिन भगवान् हैं…। ''
इस तरह की बातें एक अर्से से जान बूझकर मीडिया माध्यमों द्वारा बाजार के दबाव में…कहें तो लालच में फैलाया जा रहा है। सनसनी पैदा की जा रही है। सारे मुद्दे हवा हो गए हैं। दलित-शोषित जनता की आवाज मीडिया से गायब है। मीडिया, खासकर टीवी मीडिया बाजार का गुलाम बन कर रह गया है ! एक तरह से यह असल समस्याओं से ध्यान भटकने का भी यह खेल है....! रोटी नहीं क्रिकेट धर्म है ? यह प्रपंच मेडिया द्वारा स्वीकृत बनाया जा रहा है। बार-बार झूठ बोलकर बाज़ार की भाषा को जनभाषा बना दो। यह वैचारिक कंगाली है। सचिन एक भले, विनम्र इंसान और खिलाड़ी हैं। मेधावी विलक्षण क्रिकेट प्रतिभा के रूप में उन्होंने लम्बा सफ़र तय किया है। रिकार्ड्स की झड़ी लगा दी। एक व्यक्ति और खिलाड़ी के रूप में वे हम सबके प्यारे-दुलारे हैं। वे बड़ों, सीनियरों से आज भी अदब से मिलते हैं। प्रभाष जोशी (जनसत्ता के संस्थापक संपादक, पत्रकार-विचारक ) सचिन के दीवाने थे। सचिन के रिकॉर्ड और खेल को लेकर भावुक हो जाते थे। जनसत्ता के पन्ने रंग जाते थे। आज वे होते तो झूम उठते--ठीक सचिन की माँ और करोड़ों लोगो की तरह। आज सचिन दौर में मुझे प्रभाष जी याद आ रहे हैं। वह तो ख़ुशी का बवाल मचा देते !  ''एक सचिन ने हमारे सपने को सच कर दिया '' लिखते ! लिखा भी है और बुद्धिजीवियों की आलोचना सही है अतिवादी प्रशस्ति को लेकर ! जबकि वे खुद रत्न थे।

तो भारत रत्न देने से लेकर अतिवादी शोर-गुल और ज्वार पैदा करना……खेल के हित में नहीं है। सचिन को निश्चित रूप से ' भगवान् ' बनाने की जिद उन्हें भी नहीं सुहाता ! उनकी राय गाहे-बगाहे अभिव्यक्त भी हुई है। खैर, अगर भारत रत्न क्रिकेट में ही देना जरूरी हो तो सुनील गावस्कर, कपिलदेव और धोनी को भी दे देना चाहिए ! सुनील और कपिल को तो अवश्य ही ! सुनील गावस्कर जिस दौरान खेल रहे थे तो क्रिक्रेट का मार्किट इतना बड़ा नहीं था। मीडिया माध्यम ले देकर दूरदर्शन और आकाशवाणी। ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग वाला जमाना नहीं था। एक्सक्लूसिव की चीख नहीं थी। इंडियन पैसा लीग नहीं था ! फिर खेल के नियम, चुनौती उस समय के हिसाब से रन को देखिये। जिस समय वेस्टइंडीज का क्रिकेट में डंका बजता था, उस दौरान कपिल ने विश्व कप जीता। धोनी ने 28 साल बाद यह कारनामा दोहराया। 20-20 वर्ल्ड कप जीता। सफल कप्तान के रूप में धूम मचाई। बाजार भी कम नहीं। क्यों नहीं इन्हे भी दे देते ?

विश्वनाथन आनंद, पी टी उषा, मिल्खा सिंह, बाइचुंग भूटिया, लिएंडर पेस, अभिनव विन्द्रा, पी गोपी चंद ने क्या बिगाड़ा है ?  ये लड़ाकू तो अपने-अपने क्षेत्र में कही ज्यादा संघर्षी हैं । 
साहित्य-पत्रकारिता, कला के क्षेत्र में कोई रत्न नहीं हैं क्या ?

डॉ रामविलास शर्मा, डॉ नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर … ये भी २४ कैरेट वाले रत्न हैं । इनसे मीडिया और बाजार को कोई लेना देना नहीं है, सो आप इनके बारे में प्रायः नहीं जानते। 




यह सिर्फ विवाद के लिए विवाद नहीं है। यह अकसर होता है। भारत रत्न ही नहीं दुनिया के समस्त सम्मान-पुरस्कार के साथ वाद-विवाद का गहरा सम्बन्ध रहा है। नोबेल पुरस्कार…खासकर साहित्य और शांति को लेकर ज्यादा विवाद रहा है! गांधी बाबा को नोबेल नहीं मिला। जिसको लेकर नोबेल फॉउण्डेशन गाहे-बगाहे अफ़सोस व्यक्त करता रहा है !

भारत में साहित्य अकादमी, फ़िल्म फेयर, दादा साहब फाल्के और नागरिक सम्मानों की जो दशा-दिशा है…वह इस कारण है कि भारत में संस्कृति नहीं, संस्कृतियां हैं। जाति, समुदाय, धर्म, वाद, क्षेत्र, भाषा .... की विविधताएं हैं। जाहिर सी बात है....महानों की लाइन लगी है। वोट के फसल ने महानों को भी बाँट दिया है। वैचारिक दृष्टि से एक 'पंथ' के लिए जो बुर्जुआ है, दूसरे के लिए वह 'सर्वहारा' है ! कोई राष्ट्रवादी है तो कोई राष्ट्र निरपेक्ष है ! एक के लिए अंधविश्वास है तो दूसरे के लिए आस्था । ऐसे भी भारत महान में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और स्त्रियों के प्रति जिस तरह का झोल-झाल है, अन्याय है, पॉलिटिकली करेक्ट होने की चाल है, उसमे कर्पूरी ठाकुर, कांशी राम, जगजीवन राम .... कहां के रत्न हैं ? बाबा साहेब को अर्से बाद '' रत्न '' माना गया !

आज मीडिया और बाजार के दबाव में कोई पार्टी, पत्रकार, नेता .... सचिन को लेकर सवाल नहीं उठा सकता ! सवाल उठाने वाला शिवानंद तिवारी की तरह अलग-थलग पड़ जाता है। नूतन ठाकुर और अमिताभ हो जाता है ! यह ध्यान रखिये भले ही गावस्कर, कपिल, धनराज सहित सभी लोग सचिन को लेकर 'गौरवान्वित' हो रहे हों .... कोई उपाय नहीं है उनके पास गौरवान्वित होने के

अलावे ! लेकिन इस अतिवादी माहौल से एक टीस भी होगी,
कसक भी होगी ! अपने क्षेत्र में धनराज पिल्लै ने भी हाकी का स्तर ऊंचा उठाया। जिस दौर में सुनील गावस्कर और कपिल ने क्रिकेट खेला वह भी चरम क्षण था ! 10,000 रन और 432 विकेट कठिन चरम था। कपिल ने वेस्ट इंडीज के पताका दौर में विश्व कप साकार किया। अगर रिकार्ड्स, लोकप्रियता पैसा ही भारत रत्न का पैमाना हो तो अनेक दावेदार हैं । आखिर , पी गोपीचंद, अभिनव बिंद्रा ने क्या बिगाड़ा है किसी का ?

तो मेरी गुजारिश है कि रत्नों के असंख्यक दौर में 10-20  फील्ड से रत्न चुनिए , थोक के भाव से  दीजिये या इसे खत्म कर दीजिये ! नहीं तो मनमानी बंद कीजिये। मानक और पारदर्शिता अपनाएं।


यह लेख 2013 में लिखा गया था

Wednesday, 10 December 2014

देश की राजधानी दिल्ली के सड़को पर एक बार फिर निर्भया कांड दोहराया जा चुका है। निर्भया गैंगरेप कांड में जो गुस्सा बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ दिखा था। कुछ वैसा ही गुस्सा अब आरोपी कैब ड्राइवर और कैब सर्विस प्रोवाइडर कंपनी ऊबर के खिलाफ भी दिख रहा है। निर्भया के मौत के वक्त इसी शहर ने बता दिया था कि अब सारी हदें पार की जा चुकी हैं। वो रात दिन सड़कों पर जम गए। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक दिल्ली के युवाओं से मिलने लगे। लेकिन टैक्सी में हुए कथित बलात्कार कांड ने यह दिखा दिया है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में स्थिति अब भी जस की तस है। भारत में सार्वजनिक यातायात हमेंशा से उपेक्षा का शिकार रहा है। और यह क्षेत्र ट्रांसपोर्ट माफिया, स्थानीय असामाजिक तत्वों, भ्रष्ट परिवहन अधिकारियों और पुलिस वालों के अधिकार क्षेत्र में रहा है।

कैब सेवा के संचालन के लिए परिवहन विभाग ने कई तरह के नियम तय किए थे, पर इस 'इंटरनैशनल' कैब सर्विस का तो सब कुछ खस्ताहाल था। कैब में जीपीएस नहीं लगा था, जो कि जरूरी कर दिया गया है। आरोपी ड्राइवर ने मोबाइल सिम किसी और के नाम पर ले रखा था और पता भी गलत दिया था। सबसे बड़ी बात यह कि आरोपी पहले भी रेप के मामले में सजा भुगत चुका था, लेकिन कंपनी को इसका पता ही नहीं था। आश्चर्य है कि एक बार सजा भुगतने के बाद भी ड्राइवर ने फिर वही दरिंदगी की। साफ है कि उस पर सिस्टम का जरा भी खौफ नहीं था। होता भी कैसे? इस व्यवस्था ने उसे न सिर्फ बेखौफ होकर घूमने की सहूलियतें दीं बल्कि अच्छे चरित्र का प्रमाणपत्र भी दे डाला।

जहां निर्भया कांड ने यह दिखाया था कि दिल्ली में बस सुविधाओं की क्या स्थिति है और इस ताजा घटना से उन वेब आधारित टैक्सी सुविधाओं का खतरा दिख गया, जिनके बारे में यह नहीं पता है कि वे रेडिया टैक्सी सर्विस हैं या सिर्फ ग्राहकों और टैक्सी चालकों का संपर्क जोड़ने वाली वेब आधारित सुविधाएं हैं। 'निर्भया' कांड के बाद पैट्रोलिंग से लेकर एफआईआर के तौर-तरीकों और ट्रैफिक व्यवस्था तक में फेरबदल किए गए थे। पुलिस की सोच बदलने पर भी खासा जोर दिया गया था। लेकिन यह सब सिर्फ कहने के लिए था। इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी बात को ध्यान में लाने की जरूरत है तो वह है उस युवा महिला की बहादुरी है, जो उन सारे नेताओं की तुलना में महिलाओं की सुरक्षा की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर उभरी हैं। जिसने दिल्ली की गलियों से एक दुष्कर्मी को बाहर निकालकर कठघरे तक पहुंचाया है।



Wednesday, 3 December 2014

भोपाल गैस हादसे की आज 30वीं बरसी है। 2 और 3 दिसंबर की रात ही झीलों का ये शहर 'यूनियन कार्बाइड' कंपनी से निकली जहरीली गैस से दहल उठा था। हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन 30 साल बीत जाने के बाद भी उस का दर्द आज भी कायम है। आज भी भोपाल में ऐसे कई परिवार हैं, जिनकी सासें तो चल रही हैं, लेकिन उनका जिन्दगी से कोई सरोकार नहीं है। 1984 की वो आधी रात जब भोपाल में लाख मौतें मरा था। देखते ही देखते पूरे शहर को एक विशाल गैस चैंबर में बदल दिया। लोग सड़कों पर बदहवास भाग रहे थे, उल्टियां कर रहे थे और तड़प-तड़पकर अपनी जान दे रहे थे। अंतिम संस्कार के लिए शहर में लकड़ियां और श्मशान घाट कम पड़ गए थे। हर जगह लाशें ही लाशें थीं। कैसे कोई भूल सकता है उस काली रात को। उस विभीषिका को। वह दिन, वह महीना, वह साल। इसके बाद ही तो भोपाल विश्व के मानचित्र पर आया था। लोग पहली दफा भोपाल को जानने लगे थे कि यह एक झीलों का शहर है।

गैस हादसे से पहले भोपाल केवल तीन चाजों के लिए जाने जाते थे। जर्दा, पर्दा और नामर्दा। लेकिन उस काली रात के बाद भोपाल 'यूनियन कार्बाइड' के लिये जानने लगे। दिसंबर का महीना बस शुरू ही हुआ था। महीने की दूसरी रात थी। जब 40 टन से ज्यादा जहरीली मिथाइल आइसो साइनेट गैस रिस कर शहर के एक बड़े हिस्सें में फैल गई। हजारों लोग उस काली रात मारे गए और न जाने कितने तिल-तिल कर आज भी जान गवां रहे है। कई इस हाल में हैं जिसकी सांसे तो चल रही हैं लेकिन वे जीवित नहीं है। यू तो इस हादसे को तीस बरस बीत गए, लेकिन तीस साल बीत जाने के बाद भी जान गंवाने वालों की संख्या न तब सही से पता चला था और न आज ही।

पहले भी सांसे लेने के लिए अस्पतालों में तांता लगा रहता था और आज भी। भोपालवासियों के लिए कुछ नहीं बदला। लोग उस बच्ची का चेहरा नहीं भूले जिसकी आंखें गैस ने छीन लीं और कब्र में वह आंखें खोले हमेशा के लिए सो गई। लेकिन इस साल प्रतीकात्मक बदलाव जरूर हुआ। हादसे से जुड़ा सबसे अधन चेहरा 'यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन' के चेयरमैन व सीईओ वारेन एंडरसन की मौत हो गई। लेकिन मुद्दे नहीं बदले जद्दोजहद जारी है। पीडि़तों की सरकार से। यूनियन कार्बाइड से। देश से लेकर अमेरिका तक। हताश कर देने वाली इस लड़ाई का एक दूसरा चेहरा भी है। चेहरा, अन्याय के खिलाफ लडऩे के साथ आगे बढऩे वालों का।

Saturday, 29 November 2014

भारत में ही नहीं पूरे दुनिया में लगभग हर जगह पर शादी को धर्म से जोड़कर देखने का रिवाज रहा है, और हर जगह के लोग अपने बच्चों की शादी अपने ही धर्म में कराना चाहते है। पर क्या किसी के साथ जीवन व्यतीत करने के लिए एक ही धर्म का होना जरूरी है ? भले ही दोनों में आपसी ताल-मेल ना हो पर शादी अपने ही धर्म में होना चाहियें। लेकिन पिछले दिनों जिस तरह से लव-जिहाद सामने आया है उस से हम यह भी नहीं कह सकते है कि लव से किया गया शादी सफल ही हो। क्योंकि लव-जिहाद जैसे मामले सांप्रदायिक माहौल भी बिगाड़ते है, और ज्यादातर सांप्रदायिक झड़पों की वजह भी लव ही होता है।


लव जिहाद जैसे मामले सिर्फ भारत में ही नहीं विश्व के और देशों में भी हो रहा है। अभी-अभी ऐसे ही कुछ मिस्र में हो रहा है। परंपराओं के दीवार टूट रही है तो विरोध के स्वर भी उठ रहे है। विरोध में उठी आवाजें हिंसक भी हो रही हैं। और इन्हीं सब चीजों के बीच नई पीढ़ी के लोगों में एक तरह का डर तो है, लेकिन उम्मीद की किरण भी दिखाई देती है। भारत या मिस्र ही नहीं पूरे दुनीयां में मजहब एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। धार्मिक नेताएं अंतरधार्मिक विवाहों को दूसरे धर्म के लोगों की भर्ती के तौर पर देखते है। ऐसे में लव से किया गया शादी कितना सही है ? 

Friday, 14 November 2014

जिनका बाल दिवस होता, कैसे बच्चे होते हैं ? खाने के ढाबे पर अब भी, बरतन बच्चे धोते हैं। भूख, गरीबी, लाचारी में, जीवन इनका बीत रहा। जाने कितने नौनिहाल बस पेट पकड़कर सोते हैं। खेलकूद, शैतानी, जिद रकना तो भूल गया। इनको पता चलेगा कैसे, अक्षर कैसे होते हैं ? महाशक्ति बनकर उभरेगा, कैसे  कोई देश भला। भूख, अशिक्षा, बीमारी में जिसके बच्चे होते हैं।

अजय कुमार की ये लाइने आज के बाल दिवस को दर्शाता है। उच्चकोटी के विचारक तथा लोकतांत्रिक समाजवाद के समर्थक जवाहरलाल नेहरु महान मानवतावादी थे। बच्चों के प्रिय चाचा नेहरु अपने देश में ही नही वरन सम्पूर्ण विश्व में सम्मानित और प्रशंशनीय राजनेता थे। लेकिन आज देश के बच्चों के  लिए जो भी किया जाय कम है, क्योंकि असली बाल वह है, जो अपने अनिश्चित भविष्य से जूझ रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन यानी 14 नवम्बर को पूरा देश बाल दिवस के रूप में मनाते है। बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को बच्चों से बेहद प्यार था। इसलिए आज के दिन को बाल दिबस के रूप में मनाया जाता है। पं. नेहरू ने बच्चों को देश का भविष्य कहा था और उनके लिए एक सपना देखा था, लेकिन आज का वो सपना अधुरा ही है। आजीविका चलाने के नाम पर आज देश में न जाने कितने बच्चे बाल मजदूरी करने पर विवश है।
अगर माँ बाप भीख मांग रहे हैं तो बच्चे भी मांग रहे हैं। क्या ये बाल दिवस का अर्थ जानते हैं या कभी ये कोशिश की गयी कि इन भीख माँगने वाले बच्चों के लिए सरकार कुछ करेगी। कोई कूड़ा इल लिए बीन रहा हैं क्योंकि घर को चलने के लिए उनको पैसे की जरूरत है। कहीं बाप का साया नहीं है, कहीं बाप है तो शराबी जुआरी है, माँ बीमार है, छोटे। छोटे भाई बहन भूख से बिलख रहे हैं। कभी उनकी मजबूरी को जाने बिना हम कैसे कह सकते हैं कि माँ बाप बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते हैं। अगर सरकार उनके पेट भरने की व्यवस्था करे तो वे पढ़ें लेकिन ये तो कभी हो नहीं सकता है। फिर इन बाल दिवस से अनभिज्ञ बच्चों का बचपन क्या इसी तरह चलता रहेगा?

आज भी चाचा नेहरू के इस देश में लगभग 1.01 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। जो चाय की दुकानों पर नौकरों के रूप में, फैक्ट्रियों में मजदूरों के रूप में या फिर सड़कों पर भटकते भिखारी के रूप में नज़र आ ही जाते हैं। इनमें से कुछेक ही बच्चे ऐसे हैं, जिनका उदाहरण देकर हमारी सरकार सीना ठोककर देश की प्रगति के दावे को सच होता बताती है। तो वहीं दूसरी और तस्वीर कुछ और ही बयान करती है। सरकार को जरुरत है की वो जमीनी हकीकत से जुडे और आंकडों को छोडकर वस्तुनिष्ठता पर जोर दे और उन बच्चों के भविष्य के बारे में विचार करे ताकी एक सुभारत का निर्माण किया जा सके और हमारे समाज से बाल मजदूरी नामक दंश का विनास हो।







Monday, 27 October 2014

Posted by Gautam singh Posted on 05:55 | No comments

बचपन का सावन

बचपन इंसान के जिंदगी का सबसे हसीन और खूबशूरत पल होता है न कोई चिंता न कोई फिकर मां की गोद और पापा के कंधे न पैसे की चिंता न फियूचर की सोच। बस हर पल अपनी मस्तीयों में खोए रहना, खेलना कुदना और पढ़ना। बगैर किसी तनाव के, नन्हे होंठों पर फूलों सी खिलखीलाती हँसी, और मुस्कुराहट, वो शरारत, रूठना, मनाना, जिद पर अड़ जाना यही तो बचपन की पहचान है। सच कहें तो बचपन ही वह वक्त होता है, जब हम दुनियादारी के झमेलों से दूर अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं

'ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो, बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी' मशहुर गजल गायक जगजीत सिंह की ये पंक्तियां उम्र की एक दहलीज पर किसी को भी भावुकता के समंदर में डूबोने या उतारने के लिए काफी है। लेकिन आज कल के बच्चों के जिंदगी में वो बचपन आता कहां है। नानी और दादी की गोद, पापा और दादा के कंधों की सवारी करने के उम्र में इन बच्चों के कंधों पर भारी बस्ता का बोझ टाँग दिया जाता है और बच्चों से खचाखच भरी स्कूल बस में डाल दिया जाता है। चकाचौंध संस्कृति व चमकदार सपनें बचपन की मासूमियत को जाने अनजाने में डसने लगे हैं। इन नन्हें-नन्हें मासूम चेहरों पर मुस्कान के बजाय उदासी गणित के पहाड़ों में खोने लगी और हम इसे बदले परिवेश के एक हिस्से के रूप में स्वीकार भी करने लगे हैं। बेखौफ तरीके से जीने वाला वो बचपन कहीं खोता जा रहा है।

चमचमाते अंग्रेजी स्कूलों ने बच्चों को अंग्रेजी बोलना तो सीखा दिया, मगर बुजुर्गों के प्रति संवेदनाएं और जीवन के प्रति आशाएं यह स्कूल नहीं सीखा पायें। जब वे माता-पिता की अपेक्षाओं में खरे नहीं उतर पाते तब वे हीन-भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप बच्चे गलत राह की ओर अभिमुख हो जाते हैं। वे असंवदेनशील हो जाते हैं।  किशोरों में दिनोंदिन आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जो वर्तमान समाज के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। इसीलिए वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समाज को अपनी सोच में बदलाव की जरूरत है। ऐसे संक्रमणकाल में पल रहे बचपन को खोने से कैसे बचाएं, इस पर आज विचार करने की आवश्यकता है। चिंतन की प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत है। बचपन को बचाने के लिए मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास करने की जरूरत है।