Sunday, 25 July 2021

आज कहानी अर्थशास्त्र के उस महानायक की जिसने नेहरू और इंदिरा गांधी की औद्योगिक नीतियों को सिरे से पलटकर नई रूपरेखा दी... जिसने अर्थ व्यवस्था को उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की राह पर दौडाने का ऐलान किया... ये उपलब्धि उसी महानायक के नाम जाती है... जिसकी वजह से आज देश खजाना विदेशी मुद्रा भंडार से भरा हुआ है... इसका नतीजा ये रहा कि  साल 1991 में 5.80 अरब डॉलर से विदेशी मुद्रा भण्डार का कारवां तीन जुलाई साल दो हजार इक्कीस को 611 अरब डॉलर तक पहुंच गया... ये कहानी गारत में जा रही भारतीय अर्थव्यवस्था के गेम चेंजर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की है...  जिनके गियर बदलते ही देश की अर्थव्यवस्था बुलेट ट्रेन की तरह दौड़ पड़ी... आज के तीस साल पहले दिनांक चौबीस जुलाई साल उन्नीस सौ इक्यानवे को आज का ही दिन था जब मनमोहन सिंह ने देश का वित्तीय बजट पेश किया.... उस समय देश के विदेशी मुद्राभण्डार कि हैसियत मात्र इतनी थी कि सिर्फ दो हफ्तों तक ही दूसरे देशों से आयात किया जा सकता था... अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह सबसे भयावह दौर था... और इतना ही नहीं साल 1991 में भारत का भुगतान संतुलन इतना बिगड़ गया कि देश का सोना गिरवी रखना पड़ा..  लेकिन इस लड़ाई के महानायक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिकी के भयावह दौर से निपटने के लिये अपने बजट में भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिये खोल दिया... उनके इस कदम से केंद्र् सरकार को महज चन्द महीनों में ही इकोनॉमी के मोर्चे पर बड़ी सफलता मिली... और उसी साल दिसम्बर 1991 में सरकार ने विदेशों में गिरवीं रखे देश के सोने को छुड़वा लिया... वो दौर जब भारत अर्थव्यवस्था की बदहाली से जूझ रहा था... 



उससे उबारने के लिये मनमोहन सिंह को कभी भुलाया नहीं जा सकता... तब सोने की भी चांदी हुई... तब सोना 3466 रूपए प्रति तोला था.. आज सोना भी लगभग पचास हजार रूपए प्रति तोला बिक रहा है... इतना ही नहीं तब देश में प्रतिव्यक्ति आय पांच सौ अड़तीस रूपए थी आज बढ़कर 12140 रूपए होगई है... इस लिहाज से देखें तो प्रतिव्यक्ति आय में लगभग साढ़े बाईस फीसदी तक बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है... मनमोहन सिंह के उदारीकरण की इस पहल को शेयर बाजार ने भी सलाम किया है... उदारीकरण से पहले साल उन्नीस सौ नब्बे में सेंसेक्स महज एक हजार अंक पर था... जिसे साल उन्नीस सौ इक्यानबे में मनमोहन सिंह की वित्तीय नीतियों ने पंख दिये और दिसम्बर उन्नीस सौ इक्यानबे में सेंसेक्स उन्नीस सौ आठ अंक तक पहुंच गया... इस तरह से महज एक साल के भीतर सेंसेक्स आठसौ इकासी अंक बढ़ा... और आज नतीजा यह रहा कि सेंसेक्स तिरपन हजार के आसपास है...  आज दुनियाभर के देशों की नजरें भारतीय बाजार पर हैं... हर विकसित देश भारत का खुला बाजार देख कर निवेश करने के लिये उत्सुक दिखाई दे रहा है... कोरोना की वजह से जीडीपी में पिछले वित्तीय वर्ष में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली... लेकिन पिछले तीन दशक में हिन्दुस्थान की इकॉनामी 33 गुना बढ़ी है... और साल (2020-2021) को देश का वित्तीय बजट 191.81 लाख करोड़ रूपए पर पहुंच गया... इसके अलावा पिछले तीस वर्षों में बैंकिंग सेक्टर में सुधार के लिये कई कदम उठे गए... अब कहानी मनमोहन सिंह बजट के उस नाजुक मोड़ की जब उन्हें अपनी ही पार्टी के अन्तर्कलह से जूझना पड़ा... जब मनमोहन सिंह अपना बजट भाषण देने के लिये खड़े हुए तो पूरे देश की निगाहें उनपर थी... उस वक्त देश के चोटी के आर्थिक पत्रकार मोंटेक सिंह अहलुवालिया, ईशेर अहलूवालिया, बिमल जालान समेत कई पत्रकार घात लगाए बैठे थे... 



क्योंकि इनकी समीक्षा से अर्थशास्त्र के दिग्गत थर्राते थे... भाषण के दौरान मनमोहन सिंह ने शुरू में ही कहा कि वो इस समय बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हैं... क्योंकि उनके सामने राजीव गांधी का सुन्दर मुस्काता हुआ चेहरा नहीं है.. और वे गांधी परवार का बार बार जिक्र करते जा रहे थे... क्योंकि वे उनकी नितियों को सिरे से खारिज कर रहे थे... मनमोहन सिंह की उपलब्धियों में इससे पहले सत्तर के दशक में कम से कम सात बजटों को तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही... लेकिन साल उन्नीस सौ इक्यानबे का वह पहला बजट था जिसको उन्होने अंतिम रूप दिया था... मनमोहन सिंह ने इस बजट का बहुत बड़ा हिस्सा अपने हाथों खुद लिखा था... इससे पहले एक वाकया बहुत फेमस है... जुलाई के मध्य मनमोहन सिंह एक टॉप सीक्रेट मसौदा लेकर पीएम नरसिंहाराव के पास गए....और जब नरसिम्हाराव ने बजट का साराश बड़े ध्यान से पढ़ा... फिर मनमोहन सिंह से कहा अगर मैं यही बजट चाहता तो मैने आपको ही क्यों चुना होता... मनमोहन सिंह के इस बजट से वित्तमंत्रालय के दो चोटी के अधिकारी एसपी शुक्ला और दीपक नैयर सहमत नहीं थे... लेकिन मतलब साफ था कि नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को और दिलेर होने का मौका दिया... मनमोहन सिंह के भाषण की सबसे खास बात ये थी कि वे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को करीब 8.4 फीसदी से घटाकर पांच दशमलव नौ फीसदी पर ले गए... इससे बजटीय घाटे में करीब ढ़ाई फीसदी की कमी आई... उनका खास मकसद था सरकारी खर्चों में बेइंतहां कमी करना...  मनमोहन सिह के इस बजट का आम लोगों ने तो स्वागत किया लेकिन कुछ कांग्रेसी और वामपंथी इस बजट से खुश नहीं थे... 



जिसका नतीजा ये रहा कि कांग्रेस के ही अखबार नेशनल हेरल्ड ने राव सरकाल कि चुटकी लेते हुए लिखा कि इस बजट ने माध्यम वर्ग को करारे कॉर्न फ्लेक्स और झाग वाले ड्रिंग्स जरूर उपलब्ध कराए हैं लेकिन हमारे देश के संस्थापकों की ये प्राथमिकता कभी नहीं रही... बजट को लेकर कांग्रेस सांसदों में इतना रोष था कि अक अगस्त उन्नीस सौ इक्यानबे को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाई गई जिसमें वित्तमंत्री ने अपने बजट का बचाव किया... राव इस बैठक से दूर रहे... और उन्होने मनमोहन सिंह को अपने बल पर सांसदों के गुस्से को झेलने दिया.. उसके बाद दो और तीन अगस्त को कांग्रेस सांसदों की बैठकें हुईं... जिसमें प्रधानमंत्री राव खुद मौजूद रहे... कांग्रेस संसदीय दल की उन दिनों हो रही बैठकों में मनमोहन सिंह बिल्कुल अलग थलग पड़े हुए थे... आलम ये था कि सिर्फ दो सांसद तमिलनाडु से चुनकर आए मणिशंकर अय्यर और राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता नाथूराम मिर्धा ही खुलकर मनमोहन सिंह के समर्थन में खुलकर आए.... वहीं विरोध करने वालों की इस कड़ी में कृषि मंत्री बलराम जाखड़, संचार मंत्री राजेश पायलट और रसायन और खाद राज्य मंत्री चिंतामोहन थे जो अपनी ही सरकार के प्रस्तावों की खुलेआम आलोचना कर रहे थे... 




इतना ही नहीं बल्कि पचास कांग्रेस सांसदों ने कृषि संसदीय मंच के झंडे तले वित्त मंत्री को पत्र लिखा जिसमें बजट प्रस्तावों की खुलेआम आलोचना की गई... इसमें दिलचस्प बात ये थी कि इस मंच के अध्यक्ष महाराष्ट्र के वरिष्ठ सांसद प्रतापराव भोंसले थे जिन्हें राव का करीबी माना जाता था.... नजारा ये था कि इस पत्र पर दक्षिण मुंबई के सांसद मुरली देवड़ा ने भी दस्तख़त किए थे जो उद्योगपतियों के करीबी माने जाते थे. लेकिन राव इस राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुके.. करीब 15 दिन बाद सुदीप चक्रवर्ती और आर जगन्नाथन ने इंडिया टुडे के अंक में लिखा, "राव ने वो किया जो प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गाँधी करना भूल गए. उन्होंने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात ज़रूर की लेकिन वो वर्तमान सदी के बाहर नहीं निकल पाए राव और मनमोहन ने जहाँ एक तरफ़ नेहरू के समाजवाद के क़सीदे पढ़े लेकिन दूसरी तरफ़ देश का गिरेबान पकड़ कर कहा आगे बढ़ो वर्ना हम सब मर जाएंगे.... बाद में इस बजट के बारे में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने लिखा कि यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी... कि नेहरू के समय को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस संसदीय दल इतना कभी सक्रिय नहीं रहा...

Monday, 19 July 2021

 छुप गए सारे नजारे ओए क्या बात हो गई.... तुमने काजल लगाया दिन में रात हो गई... वो दौर जब राजेश खन्ना और मुमताज के अभिनय में फिल्माया गया यह गीत जब सिनेमा के पर्दों पर उकेरा गया तो कितने लड़के लड़कियों ने अपनी होली दिवाली ईद वैलेण्टाइन वगैरा सबकुछ एक साथ मना लिया.... बड़ी कमनीयता से नृत्य करती हुई मुमताज जब पर्दे पर आईं तो थियेटर में तालियों की घनघोर गड़गड़ाहट के साथ ऐसा महसूस हुआ मानो स्वर्ग की व्याख्या में बताया जाने वाला रंगमंच धरती पर उतर आया हो.... ये कोई कथानक कहानी किस्से नहीं बल्कि लोगों में राजेश खन्ना के एक लम्हे को पा जाने की हकीकत रही... उसी दौरान वो दौर शुरू हुआ जब लड़कियां राजेश खन्ना की गीड़ी की धूल से अपनी मांग भरने लगीं... इसी दौर में जब उनकी सफेद गाड़ी बाहर कहीं जाती तो लड़कियों के अनगिनत चुम्बनों से लाल होकर वापस आती थी.... तब प्रेम बड़ा साश्वर नजर आने लगा... राजेश खन्ना सही मायने में भारतीय फिल्म उद्योग के पहले सुपर स्टार थे... उनके बाल रखने का स्टाइल, या गुरू कॉलर वाली शर्ट पहनने का तरीका हो, या गर्दन झुकाकर नैनों के तीर से जां निकाल लेने की अदा हो... उनके द्वारा की जाने वाली अदा बहुत कातिल थी.... जिसने सिनेमा प्रेमियों के साथ साथ पूरी पीढ़ी को अपने वशीभूत कर रखा था.... उनके सम्मोहन के अनगिनत किस्से सामने आए... जिसमें बंगाल की एक बुजुर्ग महिला की बहुत शुमार है... जब वे ब्यूटी पार्लर जाकर, मेकप करके और अच्छे कपड़े पहनकर फिल्म देखने जाया करती थीं... उन्हें ऐसा लगता था... कि राजेश खन्ना पर्दे की तरफ से पलकें झपका रहे हैं... या सिर झटक रहे हैं... या मुस्करा रहे हैं... तो सिर्फ उनके लिये कर रहे हैं राजेश खन्ना की उन अदाओं को देखने के लिये उनकी बाकायदा डेट हुआ करती थी... उन्हीं को नहीं तब ऐसा हर लड़की को महसूस होता था... 



तब राजेश खन्ना के गुस्से और लेटलतीफी के किस्से भी बहुत मशहूर हुआ करते थे... जिमी सिप्पी साहब ने उन्हें एक फिल्म राज जिसमें उनका डबल रोल था... जिसमें उन्हें सूटिंग के लिये सुबह आठ बजे बुलाया गया था...लेकिन ये आदत के मुताबिक 11 बजे बहुंचे... सब लोग सोच रहे थे कि ये तो नया लड़का है... इसका पहला शूट है... ये ऐसा कैसे कर सकता है... कुछ लोगों ने उन्हें घूरकर देखा भी इसके लिए सीनियर टेक्नीशियन्स ने उन्हें थोड़ा डांट भी लगाई... तब उन्होने कहा था देखिए एक्टिंग और करियर की ऐसी की तैसी मैं किसी भी चीज के लिये अपना लाइफ स्टाइल नहीं बदलूंगा... तो सब खामोश हो गए... फिलहाल इस तेवर के साथ दो ही चीजें होती हैं... या तो आदमी बहुत ऊपर चला जाता है... या बहुत नीचे... फिल्म आराधना ने राजेश खन्ना को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी... इस फिल्म का मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू ये गाना... हर राजकुमार अपनी अपनी राजकुमारी के लिये अकेले में बहुत जोर से गाया करता था.... इस फिल्म में राजेश खन्ना शर्मिला टैगोर के पति बने हुए थे... इसके बाद लोग उन्हें ढ़ूंढ़ते रहे और उनकी पूंछ बहुत ज्यादा बढ़ गई थी... साथ ही राजेश खन्ना की कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ और वह बढ़ता ही चला गया... इस दौरान उन्होने लगातार 13-14 हिट फिल्में दी जिसकी मिशाल आजतक नहीं मिलती... उनकी हर फिल्म जुबली हिट और ब्लॉक बस्टर रही.... उस दौर में अजीब हालत थी कि छे सात महीनें सिर्फ राजेश खन्ना की ही फिल्में देखीं जा रही थी... मशहूर फिल्म लेखक सलमान खान के पिता सलीम खान ने कहा किसी अभिनेता के लिये ऐसी दीवानगी उन्होने तब से लेकर आजतक नहीं देखी.... बताया जाता है कि उनकी मुस्कान बहुत कातिल थी जो लड़कियों कि दिल में घर कर जाती थी... अस्सी के दशक में अमिताब बच्चन से भी ज्यादा राजेश खन्ना का ज्यादा क्रेज था... उन दिनों अमिताभ का दौर शुरू हो चुका था... एक शादी पार्टी में बहुत चोटी के स्टार पहुंचे थे... जिसमें राजन्द्र कुमार धर्मेंद्र राज कपूर समेत कई दिग्गज कलाकार शामिल थे लेकिन जैसे ही राजेश खन्ना की एंट्री हुई... ये नजारा देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए... और सारे मीडिया के कैमरे उनकी तरफ घूम गए... उस शादी में करीब 500 से ज्यादा लोग रहे होंगे... 



लेकिन सब के सब राजेश खन्ना के पीछे चल रहे थे.... राजेश खन्ना पर तो बहुत सारी लड़कियां मरा करती थीं... लेकिन उनका दिल जीतने में अंजू महेंद्रू कामयाब रहीं... अंजू उनकी जिंदगी में तब से थीं... जब से वो स्ट्रगल कर रहे थे... उस दौरान उन्होने उनका बड़ा साथ दिया... अंजू ने भी काफी स्ट्रगल किया लेकिन वे उतना कामयाब नहीं हो पाईं...स्टार बन जाने के बाद राजेश अक्सर अंजू के घर जाया करते थे... अजू ने कहा था कि राजेश खन्ना चाहते थे... कि अंजू भी उनके स्टारडम को महसूस करें लेकिन अंजू के लिए वह मुमकिन नहीं था... इसके अलावा उन्हें तारीफ करने वाले लोगों की जरूरत थी... वे उन्हीं लोगों से घिरे रहना ज्यादा पसन्द करते थे.... जो उनकी तारीफें किया करते थे... इस वजह से वे अंजू को कम वक्त देने लगे और दोनों के रिश्तों के बीच दरार आनी शुरू हो गई.... इसके कुछ दिनों बाद राजेश खन्ना की जिंदगी में डिंपल कपाड़िया की एंट्री हुई... वो वो उम्र में बहुत छोटी थी.... तीन चार दिनों के भीतर उन्होंने शादी करने का फ़ैसला किया. ये अंजू को बहुत बाद में पता चला... दुनिया का हर अच्छा सिलसिला हमेशा के लिए वैसा नहीं रहता. राजेश खन्ना के साथ भी ऐसा ही हुआ. जिसके बारे में कहा गया कि वो कामयाबी को ढंग से हैंडल नहीं कर पाए... इसके बाद एंग्री यंग मैन की एंट्री के साथ रोमांटिक फ़िल्मों का युग पुराना लगने लगा.... अब रोमांस एक्सन की तरफ जाने लगे थे... उसी ज़माने में ज़ंजीर आ गई. फिर शोले और दीवार आ गई. इस तरह ग़ुस्से वाले कैरेक्टर खड़े होने लगे....




राजेश खन्ना मूल रूप से रोमांटिक स्टार थे." उन्होंने अस्सी के दशक में कुछ एक्शन फ़िल्में की लेकिन उनमें वो कभी स्वाभाविक नहीं लगे. अचानक फ़िल्मों का ट्रेंड बदला और वो डिप्रेशन में आ गए. फ़िल्म 'नमकहराम' से इसकी शुरुआत हुई. जब 'नमकहराम' साइन की गई थी तो राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन उतने बड़े स्टार नहीं थे." राजेश खन्ना ने कुछ ऐसी फ़िल्मों में काम किया जिन्होंने उनके करियर को बहुत नुकसान पहुंचाया. "तब मुंबई की बाल काटने वालों की दुकान पर दिलीप कुमार कट और देवानंद कट के बोर्ड लगा करते थे. इस दौरान मुंबई बार्बर्स एसोसिएशन ने एक नया बोर्ड बनवाया जिसमें दो नई एंट्रीज़ की गई, जिसमें लिखा था राजेश खन्ना हेयर कट- 2 रुपए और अमिताभ बच्चन हेयर कट- साढ़े तीन रुपए. इससे भी राजेश खन्ना आहत हुए..." कई फ़्लॉप फ़िल्मों के बाद राजेश खन्ना ने फ़िल्म 'सौतन' में कमबैक किया और एक बार लगा कि पुराने राजेश खन्ना वापस आ गए हैं. उस फ़िल्म के उस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही राजेश खन्ना का टीना मुनीम से रोमांस शुरू हुआ था इस शूटिंग के दौरान "डिम्पल मॉरिशस गईं थीं. जब उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि राजेश टीना मुनीम के बहुत नज़दीक जा रहे हैं तो वो वापस मुंबई चली गईं. एक दिन राजेश खन्ना शूटिंग से वापस आए तो वो उन्हें डिंपी, डिंपी, डिंपी कह कर ढ़ूढ़ रहे थे... लेकिन उन्हें डिंपल कहीं नहीं मिलीं.... बहुत खोजबीन करने के बाद जब ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर देखा तो  उस पर लिखा था 'आई लव यू, गुड बाय.... बाद में पता चला कि डिम्पल जहाज़ से वापस मुंबई चली गई थीं. वो पहले की तरह टीना मुनीम के साथ शूटिंग करते रहे. उसके बाद डिम्पल उनके घर आशीर्वाद में कभी नहीं लौटीं.... वे अपनी जिंदगी के आखिरी क्षणों में बहुत अकेले पन से जूझ रहे थे... उन्हें कैंसर ने अपने आगोश में जकड़ लिया था...  उनका ये किस्सा बहुत प्रचलित हुआ... बाबू मोशाय! जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं.... "अरे ओ बाबू मोशाय! हम तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में हैं, कब, कौन, कहां उठेगा ये कोई नहीं जनता।"


आनंद मरा नहीं, आनंद कभी मरते नहीं। ये संवाद दरअसल दर्शन है जीवन का। एवरग्रीन एक्टर 'राजेश खन्ना' उर्फ काका उनका जीवन रंगमंच जैसा ही रहा। सितारों की ज़िन्दगी में जब तक तालियों की गढ़गढ़ाहट शामिल होती है तब तक उन्हें कुछ नहीं सूझता, लेकिन जब ये तालियों का शोर धीमा पड़ने लगता है तो मानो उनका सबकुछ लुट चुका हो... उनके ये डॉयलोक अक्सर उनकी दर्दबयानी किया करते थे.... "इज्जते, शोहरते, उल्फते, चाहते सबकुछ इस दुनिया में रहता नहीं आज मैं हूं जहां कल कोई औऱ था। ये भी एक दौर है वह भा एक दौर था।" जब तक स्टेज सजा था तब तक लोगों की भीड़ भी लगी हुई थी, जैसे ही मज़मा ख़त्म हुआ, काका अकेले रह गए... आखिरी दिनों में एक दिन काका ने कहा टाइम अप होगया पैक अप....अब काका नहीं रहे.... राजेश खन्ना ही सिर्फ ऐसे अदाकार थे जिन्हें 'सुपरस्टार' का ख़िताब मिला...  काका भले ही ना हो लेकिन फ़िल्मों में निभाए गए अपने किरदारों से वह हमेशा अपने चाहने वालों के बीच बने रहेंगे... वैसे भी आनंदमरा नहीं करते! वह तो उदासी में जीवन को अर्थ देते हैं। राजेश खन्ना की जीवन लीला 29 दिसम्बर 1942 को शुरू हुई और तमाम उतार चढ़ाव के थपेड़ों और झकोरों को झेलते हुए 18 जुलाई साल दो हजार बारह समाप्त हो गई... उनकी मौत के बाद टैक्स प्रॉब्लम के चलते इनकम टैक्स विभाग ने उनका बंगला सील कर दिया था... इसलिये वो अपनी ऑफिस में रहते थे... जिसकी बगल में एक मेकडॉनल्ड रेस्तरां हुआ करता था... वो वहां जाते थे... एक बर्गर खाते थे और स्ट्रॉबेरी मिल्क शेक पिया करते थे...जो उनका बहुत फेवरेट हुआ करता था.... कई शाम तो वो अकेले इंतजार कर बहुत परेशान हो जाते थे... कि कोई आए और उन्हें पहचान ले... लेकिन ऐसा कभी कभी होता था... जब कोई पुराना फैन वहां आकर उन्हें पहचान लेता था तो वे बहुत खुश हो जाते थे.... 

 

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए... मेरे दुख दर्द का हो तुझपे कुछ असर ऐसा जब मैं भूखा रहूं तो तुझसे भी न खाया जाए... भले दो जिस्म हैं पर एक जान हों अपने... मेरी आंखों का आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए... आपकी रग रग में प्रेम को स्पन्दित कर देने वाली ये रचनाएं कवि सम्मेलनों और मुशायरों के कोलम्बस कहे जाने वाले, कविकुल के मणिमौर, हिन्दी साहित्य के पित्रपुरूष, कलम के सच्चे सेनानी, तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड समेत पद्मभूषण से सुशोभित गोपाल दास सक्सेना उर्फ नीरज जी के हैं... नीरज जी की लोकप्रियता का अंदाजा बस इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने शब्दों में अमृत कलश लेकर चलते थे... 




जो भी एक बार रसपान कर लेता था वह उनके रंग में रंग जाया करता था...... लोगों के जेहन में उनकी कविताएं इस कदर घर कर गईं थी... कि उनकी कविताओं के अनुवाद गुजराती मराठी, बंगाली, पंजाबी और रूसी भाषाओं में कराए गए... राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उन्हें हिंदी की वीणा मानते थे... और अन्य कवि उन्हें संत कवि कहते थे... कहा जाता है कि गोपाल दास नीरज वे शख्स थे जिनकी कविताओं में शराब से ज्यादा नशा था... जो उतरने का नाम नहीं लेता..  क्योंकि काव्य प्रेमियों को पता है...  उनके साथ शराब का जिक्र न हो तो शायद किस्सा अधूरा रह जाएगा... नीरज जी ने लिखा भी, कि... साकी तू अब भी यहां किसके लिये बैठा है... अब न वो मय, न वो जाम, न वो पैमाने हैं... न तो पीने का सलीका.. न पिलाने का शऊर.. अब तो वे लोग चले आए हैं मैखाने में... 




बाद के दिनों में नीरज जी को पत्रकारों से बात करने का कोई मोह नहीं रहा... वे फालतू सवालों पर झिड़क भी देते थे... लेकिन जब कोई उन्हें दिलचस्प श्रोता मिल जाता और उनके दिल को छू लेने वाली कोई बात कह देता.... तो उससे वे घण्टों बात कर लिया करते थे...  नीरज से जब बीबीसी के पत्रकार कुलदीम मिश्रा ने पूंछा कि नए लिखने वालों में उन्हें कौन पसंद है.... तो उन्होने कहा कि ज्यादा सुन नहीं पाता हूं... लेकिन गुलजार अच्छा लिख रहे हैं... आम लड़कों की तरह जवानी के दिनों में नीरज जी को भी प्रेम हुआ... जब उनकी प्रियतमा की डोली उठी तो नीरज जी बहुत व्याकुल हुए... तब उन्होने मात्र 23 साल की उम्र में जो गीत लिखा कि

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

ये गीत अगले 23 हजार साल तक हर प्रेमी प्रेमिका के बिछुड़न पर एक दूजे की अन्तरात्मा की छुअन के लिये गाया जाता रहेगा... नीरज जी कहते थे कि मेरी प्रेम की भाषा है... वे कहते थे गुस्से में कभी अपना चेहरा देखना और जब प्रेम करते हों, तब देखना... वे कृष्ण, ओशो और जीवन मृत्यु के विषयों पर बहुत रूचि रखते थे.. लेकिन वे धार्मिक रूढ़िवाद में कभी नहीं फंसते थे... एक बार उन्होने कहाथा कि मेरा धर्म में विश्वास नहीं धार्मिकता में है... ईश्वर के नाम पर चार हजार धर्म बने इन धर्मों ने क्या किया... खून बहाया फिर कृष्ण आया जीवन को उत्सव बना दिया साहब उस आदमी ने... नीरज जी स्पष्टवादिता के बहुत धनी थे वे कहते थे कि आपलोग चिट्ठी में नीचे लिखते हैं... आपका अपना.... वो झूठ है जानता हूं कि मेरी सांस तक मेरी नहीं.. यकीन मानिये मैने शब्दों की रोटी खाई है... जिंदगी भर... इसलिए मैं आपका नहीं सप्रेम लिखता हूं... गोपाल दास नीरज का फिल्मी सफर कुल पांच सालों का रहा... 



इस बीच नीरज को तीन बार फिल्फेयर अवार्ड मिले... इस दौरान नीरज की रचनाओं में लिखे जो खत तुझे... शोखियों में घोला जाए फूलों का शवाब.. रंगीला रे.... फूलों के रंग से दिल की कलम से...  दर्द दिया है... आसावरी... कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे... गीत जो गाए नहीं... ओ मेरी शर्मीली आओ न... जिंदगी है चीज क्या नहीं जान पाएगा... आजमदहोश हुआ जाए रे मेरा मन... दिल आज शायर है गम आज नगमा है... ए भाई जरा देख के चलो...  मंचों पर आखिरी दिनों में जब उनका मन नहीं होता था... तो हजारों की भीड़ में भी संचालक को बोलकर शुरू में ही कविता पढ़कर होटल चले जाते थे... और मन होता तो घण्टों काव्यपाठ किया करते थे... नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था... नीरज जीवन पर्यन्त कविताएं लिखते रहे.... समय के प्रत्येकक्षण को उन्होने भोगा बचपन गरीबी में बीता... तमाम संघर्षों के बाद नीरज साहित्य जगत के कोहिनूर बने.... 19 जुलाई साल दो हजार अट्ठारह को 93 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स अस्पताल में उनकी जिंदगी का कारवां गुजर गया नीरज जी नहीं रहे.... पर वह अपने रंगों में हम सबको रंगकर चले गए....

Wednesday, 2 June 2021

 किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो लो उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल मे प्यार, जीना इसी का नाम है...  बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता लेखक निर्देशक राजकपूर निर्माता की आज डेथ एनवर्सिरी है  राज कपूर पर फिल्माया गया यह गीत हमलोगों के जीवन पर विल्कुल सटीक बैठता है...  राजकपूर भारतीय सिनेमा जगत का चमकता एक ऐसा ध्रुवतारा  जो पिछले आठ दशकों से फिल्मी आकाश पर जगमगाता रहे हैं... और आने वाले कई सदियों तक जगमगाते रहेगें.. राजकपूर सभी प्रकार के अभिनय को बखुबी पिरो देते थे...  चाहे वो सीधे साधे गांव वाले का चरित्र हों या फिर मुम्बइया चोल वासी स्मार्ट लड़के का...  वे सभी चरित्रो को ऐसे निभाते जैसे यह उनकी अपनी कहानी हो...  राजकपूर फिल्म की विभिन्न विधाओं से बखुबी परिचित थे... हिन्दी सिनेमा जगत के पहले शोमैन राजकपूर की  फिल्मों में मौज-मस्ती, प्रेम, हिंसा, से लेकर अध्यात्म और समाज सारा दर्शन मौजूद रहता था....  राजकपूर का जन्म 14 दिसंबर 1924 को पेशावर पाकिस्तान में हुआ था...  इनके पिता पृथ्वी राज कपूर अपने समय के मशहूर रंगकर्मी और फिल्म अभिनेताओं में से एक थे...  जिस कारण अभिनय उन्हें विरासत में मिली...  राजकपूर का बचपन में नाम रणवीर राज कपूर था...  राजकपूर की स्कूली शिक्षा कोलकाता में हुई, लेकिन पढ़ाई में उनका मन कभी नही लगा और यही कारण रहा कि उन्होने 10वीं कक्षा की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी... इस मनमौजी ने विद्यार्थी जीवन में किताबें बेचकर खूब केले, पकोडे़ और चाट खाया... राजकपूर को शो मैन ऑफ द सिनेमा कहा जाता है.... सन् 1929 में जब पृथ्वी राज कपूर मुंबई आए तो उनके साथ मासूम राजकपूर भी आ गए...  राज कपूर के पिता ने एक दिन कहा था, कि राजू, नीचे से शरूआत करोगें तो उपर तक जाओगे... राजकपूर ने पिता की यह बात गांठ बांध ली और जब उन्हें 17 वर्ष की उम्र में रणजीत मूवीटोन में साधारण एप्रेंटिस का काम मिला, तो उन्होंने वजन  उठाने से लेकर पोंछा लगाने तक का भी काम किया.... 1930 के दशक में उन्होने बॉम्बे टाकीज क्लैपर-बॉय और पृथ्वी थियेटर में बतौर अभिनेता काम किया...  राज कपूर बाल कलाकार के रूप में 1935 में ‘इकबाल, हमारी बात, और गौरी सन् 1943 में छोटी भूमिका के तौर पर  कैमरे के सामने आए... 

इसके अलावा राज कपूर ने सन् 1946 में आई फिल्म बाल्मीकि और अमर प्रेम में कृष्ण की बाखूबी भूमिका निभाई...  साल उन्नीस सौ सैंतालिस में मधुबाला के अपोजिट फिल्म नील कमल से अपने अहम रोल से कैरियर की शुरूवात की थी... इसके बाद राजकपूर का जादू थमा नहीं इसी क्रम में इन सारी फिल्मों में काम  करने के बावजूद भी एक आग थी कि खुद  निर्माता और निर्देशक बनकर अपनी फिल्म का निर्माण करे, उनका यह सपना 24 साल के उम्र में फिल्म ‘आग‘के साथ पूरा हुआ...  इस फिल्म में राजकपूर खुद मुख्य भूमिका के रूप में आए...  उसके बाद 1949-50 में राजकूपर रीवा चले गए और कृष्णा से रीवा में ही शादी कर ली...  वहां से आने के बाद राजकपूर के मन में खुद का स्टूडियों बनाने का विचार आया और चेम्बूर में चार एकड़ जमीन लेकर 1950 में आरके स्टूडियों की स्थापना कर फिल्म ‘आवारा‘ अपने ही स्टूडियो में बनाई जिसमें उन्हें एक रूमानी नायक के रुप में  ख्याति मिली, लेकिन उसके बाद आई फिल्म ‘आवारा‘ में उनके द्वारा निभाया गया चार्ली चैपलिन का किरदार सबरे प्रसिद्ध रहा...  उसके बाद उन्होंने ‘श्री 420, जागते रहो, और मेरा नाम जोकर‘ जैसे कई सफल फिल्में बनाई। राजकपूर अपने दोनो भाई शम्मी, शशी के साथ-साथ सत्तर के दशक में तीनों बेटे रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर को लांच कर कई सफल फिल्में बनाई..... उन्होने मेरा नाम जोकर छे सालों में बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही इसके चलते उन्हें काफी आर्थक समस्या से भी जूझना पड़ा था...  राजकपूर उन सितारों में से थे जो न सिर्फ अपनी प्रोफेशनल लाइफ बल्कि पर्सनल लाइफ को लेकर भी काफी सुर्खियों में रहे... साथ ही राजकपूर और नर्गिस की प्रेम ्कहानी भी काफी सुर्खियोंमें रही इस शोमैन के साथ नर्गिस की जोड़ी को पर्दे पर काफी पसन्द किया गया और ऑफस्क्रीन भी दोनों के प्यार के खूप सिक्के भी उछले... दोनों के बीच प्यार तो खूब हुआ लेकिन कभी दो जिस्म एक जान नहीं हो पाए... बस मलाल यही था...  वहीं राजकपूर के बारे में एख और प्रसिद्ध कहानी ये भी है... कि वो कभी बिस्तर पर नहीं सोए... हमेशा जमीन पर ही सोते थे... 



उन्हें यह प्रेरणा भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मिली थी... उनकी बेटी रीतूनंदा ने अपने पापा के ऊपर जो किताब लिखी है.. उसमें उन्होने जिक्र किया है कि राजकपूर साहब ने अपने मातापिता की बहुत बड़ी तस्वीर अपने बेडरूम में बिस्तर के ऊपर लगाई थी... हर रोज सुबह उठकर उस तस्वीर को प्रणाम करके जमीन पर ही सोते थे... उनकी इस आदत को लेकर जब वह लंदन गए हुए थे... और जब उनको हिल्टेन होटेल में रूकना पड़ा तो वहां पर भी वह जमीन पर ही सोए लेकिन होटेल के मैनेजर ने उनको जमीन पर सोने से मना किया था... वैसे राजकपूर की सिने कैरियर में उनकी जोड़ी नरगिस के साथ बहुत पसंद की गई। इन दोनो की पहली फिल्म तो ‘आग‘ थी, लेकिन फिल्म ‘आवारा‘ के निमार्ण के दौरान नरगिस का झुकाव राजकपूर की ओर बढ़ गया, जिस वजह से नरगिस ने केवल राजकपूर की फिल्मों में काम करने का फैसला किया। और नरगिस ने महबूब खान की फिल्म ‘आन‘ में काम करने से इन्कार कर दिया। इस जोड़ी ने 9 वर्ष में 17 फिल्में बनाई, 1956 में आई फिल्म चोरी चोरी इन दोनो जोड़ी की आखरी फिल्म थी। उसके बाद राजकपूर ने 60 के दशक में ‘जिस देश में गंगा बहती है और संगम‘ जैसीे सफल फिल्म बनाई। 1960 में राजकपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार फिल्म ‘अनाडी के लिये मिला। 1962 में फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है‘ में पुनः सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार तथा 1965 में फिल्म ‘संगम, 1975 में मेरा नाम जोकर‘ और 1983 में प्रेम रोग के लिये सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार मिला, इसके बाद 80 के दशक में प्रेम रोग जैसी फिल्मों का निमार्ण किया जिसके लिये राजकपूर को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार मिला, 1985 में आई फिल्म राम तेरी गंगा मैली हो गई उनकी आखरी फिल्म थी। 1987 में राजकपूर को दादा साहब फालके पुरस्कार भी दिया गया।1971 में भारत सरकार ने राजकपूर को कला क्षेत्र में अहम योगदान के लिय उन्हें पद्ा भूषण से सम्मानित किया।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सन 1988 मे दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था... अपने निधन के समय वो भारत पाकिस्तान पर आधारित प्रेम कहानी हिना बना रहे थे... दो जून को राजकपूर हिन्दी सिनेमा के इतिहास में वो मील का पत्थर साबित हो गए जिनके नक्शे कदम पर कई नस्लों ने अदाकारी सीखी है... और सीखेंगे  उनकी पॉपुलरिटी के लोग भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कायल हैं..  



1 जून, 2001 में घटित हुई नेपाल राजसत्ता की... जहां 1 जून 2001 को अपनी माशूका के साथ शादी करने की जिद में बौखलाए राजकुमार दीपेन्द्र ने  पूरे परिवार की हत्याकर समूचे घर को इंसानी बूचड़खाने में तब्दील कर दिया था... इस भयावह हकीकत को किसी फिल्मी सीन की तरह फिल्माते हुए नेपाल के हत्यारे युवराज दीपेन्द्र ने अपनी मां, पिता और भाई समेत परिवार के कुल 11 सदस्यों की हत्या कर खुद को गोली मारी थी .... इस दारूण्य दृश्य को देखकर नेपाल ही नहीं बल्कि आधी दुनिया थर्रा गई... कहा जाता है कि युवराज दीपेन्द्र अपनी अपनी प्रेमिका से शादी की बात को लेकर मां से इतना झल्लाए हुए थे कि उन्होंने किसी को भी नहीं बख्शा सबको मौत के घाट उतार दिया... वैसे इस पूरे मामले की जांच और हत्याकांड की  रिपोर्ट में  यह बात सामने आई कि राजकुमार दीपेन्द्र ने शराब के नशे में ये सब किया....  अब शुरू करते हैं नेपाल राजशाही परिवार की हत्याओं की सिलसिलेवार विवेचना... दरअसल 1 जून 2001 की शाम नेपाल नरेश के निवास स्थान नारायणहिति महल के त्रिभुवन सदन में एकआलीशान पार्टी होने वाली थी और इस पार्टी के मेज़बान थे युवराज दीपेंद्र... वही दीपेन्द्र जो इस पूरे हत्याकाण्ड के खलनायक थे.... इस पार्टी का शुरूवात हर नेपाली महीने के तीसरे शुक्रवार को महाराजा बीरेंद्र ने सन् 1972 में राजगद्दी सँभालने के बाद शुरू की थी.... करीब पौने सात बजे दीपेन्द्र बिलिर्ड्स रूम पहुंचे... उनके साथ मेजर गजेंद्र वोहरा भी मौजूद थे.. उन्होने बिलियर्ड्स के कुछ शॉर्ट्स की प्रैक्टिस की और अपने मेहमान महाराज बीरेन्द्र के बहनोई और भारतीय रियासत सरगुजा के राजकुमार रह चुकं महेश्वर सिंह को ड्रिंक ऑफर की इसके कुछ देर बाद महारानी ऐश्वर्य भी पहुंची.... इधर महाराज की तीनों बहनें शोभा शांति और शारदा भी पहुंच चुकी थीं... बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल के महाराज वीरेंद्र कुछ देर से पहुंचे क्योंकि वो एक इण्टरव्यू दे रहे थे... इधर युवराज दीपेन्द्र नशे में धुत मिले जिसे देखकर सभी मेहमान चौंक गए.. वो इतने नशे में थे कि खड़े भी नहीं हो पा रहे थे और उनकी जुबान भी लड़खड़ा रही थी... 



और थोड़ी देरबाद वो जमीन पर गिर भी गए... ये देखकर सभी मेहमान इसलिये चौंक गए कि इससे पहले तो दीपेन्द्र ने इतनी शराब कभी पी ही नहीं थी.. और जब कभी पीते भी थे तो थखुद को सम्ह्राल लेते थे... पार्टी में मौजूद लोगों ने उन्हें उठाया और उनके कमरे में ले जाकर फर्श पर बिछे गद्दे पर लिटा दिया... रिपोर्ट के मुताबिक ‘मैसेकर ऐट द पैलेस’ के लेखक जोनाथन ग्रेगसन ने अपनी किताब में लिखा है  नशे में धुत युवराज ने पहले तो बाथरूम में जाकर खूब उल्टियां की. उसके बाद सैनिक की वर्दी, जैकेट, सैनिक बूट  ब्लैक लेदर के दस्ताने वगैरा पहनकर पूरे सेना के रंगरूट में आकर. 9 एमएम पिस्टल और एमपी5के सबमशीन गन और एम-16 रायफल उठाई  फिर बिलियर्डस रूम की ओर बढ़े, इसी बिलियर्ड्स रूम में शाही परिवार की पार्टी चल रही थी. उन्हें इस रूप में देखकर पार्टी के मेहमान आवाक् रह गए. दीपेन्द्र की बुआ और महाराज की बहन केतकी चेस्टर ने कहा कि महिलाएं आपस में बात कर रही थी कि वो अपने हथियारों का दिखावा कर रहे थे.... 

इधर बिलियर्ड्स रूम में मौजूद नेपाल के महाराज बीरेंद्र और नशे में धुत हथियारबंद युवराज दीपेंद्र आमने-सामने थे... इस वाकये को लोग कुछ समझ पाते कि युवराज ने MP5-K सबमशीन गन को उठाया और  ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी...  हॉल में सन्नाटा पसर गया, सब दंग रह गए कि आखिर ये क्या हो गया?और क्यों हो गया...  जोनाथन ग्रेगसन के मुताबिक महाराज बीरेंद्र ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. बस कुछ देर के बाद वो अपने बेटे की तरफ बढ़े और इतने में दोबारा दीपेंद्र ने फिर उनके शरीर में तीन गोलियां दाग दीं... इसके बाद महाराज के दामाद कैप्टन राजीव शाही ने अपने कोट से उनकी गर्दन को ढ़क लिया जहां पर गोली लगी थी... इसपर महाराज बीरेन्द्र ने पेट के घाव से बह रहे खून की ओर इशारा भी किया.... अबतक महाराज अपने पूरे होश में थे और बेटे से कहा कि के गारदेको यानी ये तुमने क्या कर दिया...  



इसके बाद दीपेन्द्र को रोंकने  के लिये उसके चाचा धीरेन्द्र आगे आए उन्होने उसे डांटा और कहा बस अब बहुत हो गया बन्द करो इतने में दीपेन्द्र ने उनपर भी गोली चला दी... वो भी दूर जाकर गिरे इसके बाद दीपेन्द्र पार्टी मेंम मौजूद सभी लोगों पर गोलिया चलाने लगा.. इस गोली बारी में उनकी बुआ केतरी को भी गोली लगी... इसके बाद दीपेन्द्र अपने पिता वीरेन्द्र को फिर सिर में गोली मारी... इस बार महाराज सर के बल औंधे मुंह उल्टा गिरे हुए थे... फिर राजकुमार ने पैर से ठोकर मारकर चेक किया कि वो मर गए कि जिंदा हैं.. यह दृश्य देखकर उसकी बुआ केतकी को बहुत धक्का लगा जिसे आजतक वो भूल नहीं पाई...  अबतक एक दर्जन लोग उसकी गोलियाों का निशाना बन चुके थे... ये सारा दृश्य देखकर वहां के क्रैक कमांडो लैस कोई एडीसी नहीं पहुंचे... हालांकि जांच रिपोर्ट के बाद उन्हें बर्खाश्त कर दिया गया .. इसके बाद दीपेन्द्र अपने गार्डन में गए... उनके पीछे महारानी ऐश्वर्य और राजकुमार निराजन भी साथ गए... उन दोनो को भी दीपेन्द्र ने गोलियाों से भू न दिया... शायद उन्हें यह भरोसा रहा हो कि उनका बेटा उनपर गोली नहीं चलाएगा... फिलहाल यह एक तुक्का था...  अब दीपेन्द्र गार्डन में खड़े थे वो शेरों की तरह दहाड़मारकर चिल्लाए और फिर आखिरी गोली खुद को मारकर जीवन लीला समाप्त कर ली... इस बार गोली उनके सिरको पार करते हुए पूरी खोपड़ी भेद गई... वो पीठ के बल गिरे लेकिन मरे नहीं इधर सभी को अस्पताल ले जाया गया... रात ेक सवा नौ बजे जब वो अस्पताल में पहुंचे तबतक नेपाल के बेस्ट डॉक्टर्स की टीम अस्पताल पहुंच चुकी थी..  अस्पताल पहुंचते ही महारानी ने दम तोड़ दिया.. सबसे पीछे की गाड़ी में दीपेन्द्र और राजकुमार निराजन थे.. कुछ देर बाद राजकुमार को भी मृत घोषित कर दिया गया ... बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक दीपेन्द्र ने इतने लोगों पर गोलियां चलाई कि अस्पताल के ऑपरेशन रूम में बेड कम पड़ गए... और नौबत यहां तक आ गई कि आखिर में पहुंचे दीपेन्द्र के लिये अस्पताल में कोई बेड नहीं था... उन्हें जमीन पर लिटाकर ही जांच प्रक्रिया शुरू की गई.... फिलहाल वो तो जिंदा थे लेकिन उनकी आँखों की पुतलियां निष्क्रिय हो गई थी... अगले दिन इस नरसंहार के बारे में कुछ भी नहीं छपा हत्ायकांड के 14 घण्टे के बाद महाराज के निधन पर दीपेन्द्र के राजा बनने की घोषणा की गई संदेश में कहा गया कि महाराज दीपेन्द्र अभी पदभार ग्रहण करने की स्थिति में नहीं हैं... 

इसलिये राजकुमार ज्ञानेन्द्र को रीजेंट के तौर पर कार्यभार सम्हालने के लिये नियुक्त किया जाता है..... फिलहाल चार जून को दीपेन्द्र की भी मौत हो गई..... लेकिन 54 घण्टे के लिये नेपाल के राजा बने अपने पिता के हत्यारोपी दीपेन्द्र की बिना होश में आए ही 4 जून को मौत के आगोश में समा गए..... इधर  2 जून 2001 को दोपहर 4 बजे जब राज परिवार की शव यात्रा शुरू हुई तो पूरा काठमाँडू  सड़कों पर नजर आया.  शाम को राज परिवार के एक सदस्य दीपक बिक्रम ने आर्यघाट पर अन्य सभी चिताओं को मुखाग्नि अग्नि दी... इसके बाद शाही परिवार के मारे गए सदस्यों के शवों को सैन्य अस्पताल से काठमाँडू में बागमति नदी के तट पर पशुपति नाथ आर्य घाट कॉम्प्लेक्स ले जाया गया जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया...  देश के हज़ारों लोगों ने महाराजा के सम्मान में अपने सिर मुंडवाए वहीं नाइयों ने भी और  इस काम के लिए नाइयों ने भी कोई पैसे नहीं लिए. फिलहाल उनकी मौत के बाद नेपाल नरेश बीरेंद्र के छोटे भाई ज्ञानेंद्र तीन दिनों के अंदर नेपाल के तीसरे राजा बने. लेकिन नेपाल की राजशाही इस झटके से कभी उबर नहीं पाई और 2008 में नेपाल ने राजशाही को त्याग कर गणतंत्र का रास्ता चुना.

https://youtu.be/H9VcKLwXvbE

Sunday, 14 June 2020

Posted by Gautam singh Posted on 10:07 | No comments

वह बहुत जल्दी में था!

इमोशन्स से भरा व्यक्ति अब पत्थर के पुतले में बदलता जा रहा है। कृतिम जीवन और मशीनी संगत में रहकर इंसान की रंगत ही बदल रही है। संवेदनहीनता के जूते पहन कर जिन्दगी की इस रेस में वह इस तरह दौड़ रहा होता है  जिसका उसे न अंत पता है और ना की कारण बस उस रेस में सबकुछ झोख  उसी में  खो जाता है कि वह भूल चूका होता है वह एक इमोशन्स से भरा व्यक्ति है।  अपने सपनों के पिछे ऐसे लग जाता है जैसे उसका सपना ही सबकुछ हो... और जब वह अपने सपनों को पा लेता है तो  एकाएक उसे एहसास होता है उसके आस पास कोई अपना नहीं है उसके इस सपने को जीने के लिए। वहां वह नितंत अकेला खड़ा है। सबकुछ जल्दी-जल्दी के चक्कर में बहुत जल्दी कर कर जाता है। इतना जल्दी कि उसे पता ही नहीं होता वह जिन्दगी के इस रेस को हारने वाला है। 

आज सुशांत सिंह राजपुत ने आत्महत्या कर ली यह आत्महत्या मुझे मेरे दोस्त की याद दिला गया,  दोना की कहानी लगभग मिलती जुलती है। उसे भी इंजीनियर बनना था और इसे भी दोनों को अपने जिन्दगी में सबकुछ जल्दी-जल्दी करना था जो दोनों किया दोनों ने जो चाहा वह पाया.. सुशांत सब कुछ पा लिया था उसने बहुत कम उम्र में जो भी सपने देखे उसे हकीकत में पूरा किया चाहे वह इंजिनीयर बनने का सपना हो या फिर अभिनेता... सब कुछ उसने जल्दबाजी में किया इंजीयरिंग में उन्होंने ऑलऑवर इंडिया में 7वीं रेंक ला कर इंजीनियरिंग कॉलेज में दिखाला लिया पर बहुत जल्द ही उनका मोह इंजीनियरिंग से भंग हो गया वह अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहने लगे और इंजीनियरिंग छोड़ दी। वह जल्दी-जल्दी अपने सपनों को पूरा करने में लग गये टीवी में बेहतरीन अभिनय के बाद वह फिल्मों की ओर रुख किया और वहां भी बहुत जल्द अपना एक अलग पहचान बना लिया। उसने जो सपनें देखे थे उसे पा लिया और उसे जी रहा था। 

ठीक वैसे ही मेरा दोस्त था उसे भी बहुत जल्दी पड़ी थी।  12वीं करते ही आईआईटी निकाल लिया आईआईटी  में एडमिशन लिया वहां भी वह अपने क्लास में अव्वल रहा करता था। उसका सपना ही था आईआईटी इंजिनीयर बनना वह अपने सपने को जी रहा था,  दो साल बीत गए थे, इंजिनीयरिंग कॉलेज में सबकुछ अच्छा चल रहा था दो साल की और बात थी वह अपने सपनों  को हकीकत में बदल देता पर उसे बहुत जल्दी पड़ी थी। उसी जल्दी बाजी में उसे अपने क्लासमेंट से प्यार हो गया। वह प्यार को जी रहा था। लेकिन प्यार परवान चढ़ न सका और वह डिप्रेसन में चला गया और एक दिन खबर आई की उसने आत्महत्या कर ली। दोनों एक से थे दोनों ने जो चाहा वो पाया पर बाहर से दिलेर दिखने वाला व्यक्ति अंदर से खोखला पड़ा था। इतना खोखला की जल्दी-जल्दी के चक्कर में जिन्दगी के रेस भी जल्दी पूरा कर गया। जब-जब कोई आत्महत्या करना है तब-तब केवल मृतक नहीं वो सोसायटी भी हारती है जिसमें वह रहता है। 

Wednesday, 29 April 2020

अभी तो बहुत वक्त था तुम्हारे पास, अभी तो टाइम आया था तुम्हारा, कितना कुछ करना था तुमको इस दुनिया में अभिनय का एक नया कृतिमान बनाना था। पर तुम बना ना सके, एक इतिहास जिसे लिखा जाना था वह  लिख ना सका...तुम थोड़ी और ताकत तो लगाते  इतिहास को लिखने के लिए... शायद तुमने जी-जान से ताकत लगाई भी होगी। लेकिन तुम जीत न सके काल के इस गाल को हरा ना सके... पिछले दो साल से तुम लड़ ही तो रहा थे पूरे शिद्दत के साथ उस काल से... 

जो तुझे रोज डराता मौत के नाम से, पर तुम रोज उसे हरा कर एक नया सुबह ले आते उस इतिहास को लिखने के लिए जिसे अभी लिखा जाना था। पर इस बार ऐसा हो ना सका और तुम हार गए... शादय तुम थक गए होंगे लागातार उससे लड़ते-लड़ते तुम्हारा शरीर थक चुका होगा... तुम जीना तो चाहते थे पर तुम्हारा शरीर साथ नहीं दे रहा होगा। जाओ तुम अब आराम से सो जाओं, बहुत लड़ाई लड़ी है तुमने, तुम जो इतिहास लिखना चाहते थे वह तो नहीं लिख पाये, पर तुमने जितना भी लिखा है। वह लिखना किसी और की बस की बात नहीं... तुम रहोंगे हमेशा हमारे साथ.... हम नहीं रहेंगे पर तुम रहोंगे हमारे बीच जिन्दा ...जब तक यह ब्रह्ममांड रहेगा...तुह रहोंगे किसी गाने में, किसी डायलोक में हमेशा हमारे बीच...