Wednesday, 7 February 2018

Posted by Gautam singh Posted on 07:31 | No comments

'वेलेंटाइन डे' और तुम

'वेलेंटाइन डे' का नाम सुनकर ही हर एक युवाओं के मन में एक हलचल सी होने लगती है, वेलेंटाइन सप्ताह आज से शुरू हो चुका है। वैसे हम किसी 'डे' को एक दिन में समेटकर रख नहीं सकते और वैसे भी 'वेलेंटाइन डे' तो प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयां करने का दिन है। शायद इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार रहता हो, लेकिन मेरा मानना है कि हम प्यार को एक दिन या एक सप्ताह में समेट कर नहीं रख सकते। यह तो एक खुशनुमा अहसास है जो हमारे रगों में लहु बनकर गर्दिश करता है। अगर फिर भी ऐसा दिन है तो उसे मनाने में कोई हर्ज भी नहीं होना चाहिए। आज 'रोज डे' है और हम कुछ दोस्त भी साथ है तो हमलोगों ने सोचा 'इस वेलेंटाइन डे' पर क्यों ना एक पत्र लिखा जाए वैसे अब पत्र तो लिखा जाता नहीं है फिर भी हमलोग पत्र लिख रहे है अपने-अपने प्रिय और प्रियतमा के लिए...

प्रिय 

देखों ना आज से वेलेंटाइन सप्ताह शुरू हो चुका है। पूरा बाजार गुलाब के फुलों से भरा हुआ है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे पूरा शहर गुलाबी रंगों में रंगा हुआ हो। हवाओं में गुलाबों की खुशबु महक रही है। इस महक के बीच तुम्हारी यादों की कुंज में, मैं तुम्हे यह खत लिख रहा हूं। प्रिय तुम तो जानती हो मैं कभी इस 'वेलेंटाइन डे' का पक्षधर नहीं रहा हूं लेकिन फिर भी मैं मनाने से कतराता भी नहूीं हूं। जब मैं घर से पहली दफा शहर आ रहा था। तुमने जो मुझे चुपके से खत दिया था। उस खत में कुछ बाते पहली दफा बताई थी, जिसे तुम अपनी जुबां से शायद नहीं कह पाई थी। जैसे की मैं सिर्फ पढ़ाई पर ही ध्यान केन्द्रित ना करूं, दोस्तों के साथ हंसी मजाक कर लिया करूं मौका मिलते ही आते-जाते लड़कियों को ताड़ लिया करूं वगैरह-वगैरह। तुम्हें पता है प्रिय तुम्हारे इस खत को मैं रोजपढ़ता हूं अकेले में और फिर इसे प्लास्टिक के थैली में लपेटकर अटैची में बंध कर सबसे छुपा कर रख देता हूं। मैं नहीं चाहता कि यह खत मेरे अलावा कोई और भी पढ़े। 


मैं इस खत को जितनी बार पढ़ता हूं तब ऐसा लगता है की हम दूर नहीं है बल्कि साथ ही है। तुमने उस दिन उस खत में लिखा था कि मैं आते जाते लड़कियों को ताड़ लिया करूं। तुमने ऐसा क्यों लिखा था। इस बारे में मैं न तब जान पाया था और न ही अब जान पाया हूं जब मैं यह खत तुम्हे लिख रहा हूं। सच बताऊं प्रिय तो मैं कभी ऐसा कर ही नहीं सकता था। इस बात को तुम मुझसे कहीं ज्यादा जानती थी। शायद इसलिए तुमने यह लिखा था। क्योंकि तुम जानती थी की मैं कभी किसी की ओर देख ही नहीं सकता और यह निष्ठा थी तुम्हारी मेरे प्रेम के प्रति इस लिए शायद तुमने यह लिखा था। मैं सोचता जिसके पास तुम्हारे जैसी लड़की हो उसे भला किसी और लड़की की ओर देखने की क्या जरूरत।


सही बताऊं प्रिय तो मैं हर दफ़ा की तरह इस दफ़ा भी वेलेंटाइन सप्ताह भुल गया था और यहां तुम भी नहीं थी जो मुझे याद दिलाए, जब सुबह तुम्हारा फोन आया तो मुझे पता चला की आज से यह सप्ताह शुरू हो चुका है। प्रेमी एक दूसरे को गुलाब दे कर इस सप्ताह का आगाज कर रहे है और मैं अपने कमरे के चार दिवारियों के बीच सोया पड़ा हूं। तुम्हे इस सप्ताह का इंतजार कितना बेसब्री रहा करता था। जैसे ही यह सप्ताह आता तुम्हारे चेहरे खिल उठते वैसे तुमने कभी किसी 'डे' पर मुझसे किसी चीज की फरमाईस तो नहीं की पर तुम इस सप्ताह के अनुसार प्रत्येक दिन विश किया करती और उपहार भी लाया करती। मुझे तो पता भी नहीं होता कौन सा 'डे' है। पर तुम मुझे एक दिन पहले आने वाले दिन के बारे में बताती कल कौन सा 'डे' है। मैं रोज भुल जाया करता और जब तुम सुबह मुझसे पुछती तो मैं कुछ न कह पाता तुम थोड़ा डाटती और फिर बड़े ही शहजता से बताती आज कौन सा 'डे' है। 'रोज डे' से शुरू होते हुए प्यार का यह दिन वाया प्रपोज डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे के बाद अपने मूल दिवस वेलेंटाइन डे पर पहुंच जाता। तुम इन सारे दिवस को बड़े ही उत्साह के साथ मनाती।


अब जब यह खत तुम्हे मिले तो शायद वेलेंटाइन सप्ताह की धूम खत्म हो चुकी होगी। शायद महीना भी बदल चुका होगा। बाजार में होली की रोनक दिख रही होगी। वर्ष की अंतिम ऋतु शिसिर की विदाई हो रही होगी। तो वहीं साल के पहले ऋतु वसंत का आगमन होने को होगा। पलास के फूल खिलने को होंगे, आम के पेड़ में मंजरी लगने को होगी। तब तुमको शायद यह खत मिले, मैं जानता हूं यह खत जब तुमको मिलेगा तुम थोड़ा नाराज होगी और तुम्हारी नाराजगी भी जायज है। हर लड़की चाहती है की वह जिसे पसंद करे वह कम से कम वेलेंटाइन सप्ताह को तो याद रखे पर मैं याद नहीं रख पाया। इस बार जब मैं शहर से घर आऊं तो मुझे अच्छे से समझाना अगर मैं फिर भी ना समझू... तो बात मत करना क्योंकि हर गलती कीमत मांगती है और इस गलती की कीमत यही हो शायद

तुम्हारे खत के इंतजार में

Tuesday, 14 November 2017

नई दिल्ली : लगातार दो सफल मीटअप करने के बाद, वेबफेअर, दिल्ली के ओखला इंडस्ट्रियल एरिया के फेस दो स्थित 91 स्प्रिंगबोर्ड सभागार में रविवार को अपने तीसरे संस्करण 'वेबफेअर 3.0' का आयोजन करने जा रहा है।

चलन के विपरीत, हिंदी भाषा में होने जा रही यह संगोष्ठी वेब इंडस्ट्री के छोटे-बड़े उद्यमियों, शोधकर्मियों और विद्यार्थियों के लिए बेहद लाभप्रद रहेगी।

गोष्ठी के दौरान ब्लॉगिंग, वेब कंटेंट, इंटरनेट मार्केटिंग, ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म, वेब सिक्योरिटी व दूसरे अन्य अनुप्रयोगों के बारे में चर्चाएं होंगी। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञ और वक्ता अपने विचारों और अनुभवों से उपस्थित लोगों को रू-ब-रू कराएंगे।

मीडियाभारती.कॉम के संपादक धर्मेंद्र कुमार, सस्ताहोस्ट के संस्थापक पंकज चौपड़ा, पर्सनलाइव आईटी सॉल्युशन की संस्थापक स्वप्निका जैन तथा प्रेरक वक्ता सूरज सुनील सिंह नगरकोटी इस मौके पर अपने संबोधन करेंगे। साथ ही, सभी वक्ता भाग लेने वाले अन्य आगतुंकों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र में हिस्सा लेंगे। गोष्ठी के लिए पंजीकरण शनिवार तक खुले हैं।

एबी ग्रुप, सस्ताहोस्ट, 91स्प्रिंगबोर्ड और थीमियम इस गोष्ठी के प्रायोजक हैं तथा मीडियाभारती.कॉम, जीइंडियान्यूज.कॉम, द इमर्जिंग वर्ल्ड और समाचारएक्सप्रेस.कॉम इस आयोजन के दौरान मीडिया पार्टनर रहेंगे।

Monday, 6 November 2017

सुनो प्रिय आज मैं तुम्हे कुछ बताना चाहता हूं हो सकता है मेरी यह बाते तुम्हे शायद बुरा लगे या जरूरत न हो जानने की फिर भी मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ,,, तुम तो जानती हो न प्रिय हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक वैसे ही मेरे भी दो पहलू है,,, एक जो तुम्हारे सामने हंसते बोलते लड़ते-झगड़ते बड़ी-बड़ी आँखे दिखा कर छोटी-छोटी बातो पर बहस करते, तुमसे दूर जाने की सोच से ही डरते तुम्हारे बिन खुद की कल्पना करने मात्र से सिहर उठते,, मैं वह सब कुछ करता जो एक लड़का प्यार में करता है पर एक दूसरा पहलू ठीक इसके विपरीत है जब मैं खुद में रहता हूँ तो एकदम शांत गुमसुम किसी दुनियां दारी से कोई मतलब नहीं होता। तुम जानती हो प्रिय मैं कई-कई दिनों तक अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकता मेरे लिए वह कमरा ही सब कुछ है उस कमरे में पड़ी कुछ किताबें और उन किताबों के बीच मैं मेरे अंदर तुम्हारी यादे।

सच कहुँ तो मैं उस यादों में ही रहना चाहता हूं। किसी के होने या न होने का कोई मलाल नहीं होता। जो देखने में बिल्कुल शांत नदीं की मादिक पर जिस तरह नदियां अपने आप में अशंख्य भवर खुद में सम्माहित किये होती है बिल्कुल वैसे ही मैं भी न जाने कितने भवर ले कर जीता हूँ,, बहना चाहता तो बह जाता इस छोर से कहीं दूर पर वेदनाओं के वेग बहुत तेज होते है न प्रिय न जाने कितना कुछ बहा ले जाये इसलिए शांत हूँ। ठीक वैसे ही जैसे महादेव ने गंगा को समेट रखा है अपने जटाओं में...अगर तुम  सम्भाल लो मुझे खुद में कहीं, तो मैं सभी बांधे तोड़ तुम तक आ जाऊँ पर शायद ये सम्भव नहीं है। तुमने कभी देखा है नदियों में उफान उठते हुए हाँ बिल्कुल वैसे ही मुझमें भी एक उफान उठता है जो सिर्फ मुझको ही तबाह करता है....

प्रिय तुमने कभी सुना है रात में नदियों की कलकलाहट,, रात के पहर बहुत कुछ कहना चाहती है ये नदियां पर उस वक़्त सब उसे छोड़ कर जा चुके होते है,, हाँ तुम आती हो कभी-कभी किनारे तक मुझे जानने के लिए... पर तुमने कभी कोशिश नहीं किया मेरे गहरायी तक आने की... न कभी मैंने कोशिश की तुम्हे खुद में सम्माहित करने की... खैर तुम्हारे जाने के बाद कुछ किस्से इस चाँद को भी सुनाता पर वो भी न ठहरता बादलों में छुप जाता और सोचता एक दाग ले कर वो निरन्तर एक समान न रहता फिर ये नदी सबके पापों को ले कर कैसे बहती एक समान,, सच बताऊँ प्रिय जिम्मेदारियों और विश्वासघात के हवनकुंड में जल कर मेरी इच्छायें भी सती हो गयी है मैं भी चाहता तो महादेव की तरह समाधि ले लेता पर कुछ शेष है जो जला नहीं अभी जो रोके हुए है मुझे,, और ये शेष तब जागृत हुआ जब तुम आये,,, कभी उतर आओ इस नदीं में और देखो मेरे हृदय पर लगे आघात को या फिर जाने दो मुझे भी उस समाधि की और जहाँ कोई मोह न हो यकीन मानो मैं वहाँ भी जी सकता हूँ पर एक दर्द के साथ जो जब तक जीवन रहे तब तक रहे, अब तुम पर है तुम चाहो तो रोक लो या मिट जाने दो मुझे !!

Friday, 8 September 2017

नई दिल्ली : इंटरनेट के क्षितिज पर उभरते हुए नए उद्यमियों के लिए 'दिल्ली के दिल' कनॉट प्लेस के 'इन्नोवेट' सभागार में रविवार को 'वैबफेयर मीटअप 1.0' का आयोजन किया जा रहा है।

आयोजक संस्था वैबफेयर के अनुसार हिंदी भाषा में होने जा रही यह गोष्ठी वैब इंडस्ट्री में कदम रखने जा रहे छोटे-बड़े उद्यमियों और विद्यार्थियों के लिए बेहद लाभप्रद रहेगी। गोष्ठी के दौरान ब्लॉगिंग, इंटरनेट मार्केटिंग, एसईओ, यूट्यूब व दूसरे सोशल माध्यमों के अनुप्रयोगों के बारे में चर्चाएं होंगी। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञ और वक्ता अपने विचारों और अनुभवों से उपस्थित लोगों को रूबरू कराएंगे। गोष्ठी का आयोजन देश की अग्रणी वैब होस्टिंग कंपनी सस्ताहोस्ट कर रही है।
मीडियाभारती.कॉम के संपादक धर्मेंद्र कुमार, सस्ताहोस्ट के संस्थापक पंकज चौपड़ा, स्क्रिबीफाई के संस्थापक और युवा लेखक रचित सिंह तथा रैंकवॉच में ग्रोथ हैकर अमिताभ सौंगारा इस मौके पर अपना संबोधन करेंगे। साथ ही, सभी वक्ता भाग लेने वाले अन्य आगतुंकों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र में हिस्सा लेंगे। गोष्ठी के लिए पंजीकरण शनिवार तक खुले हैं।

नेटकॉम सिस्टम सर्विसेज, एबी ग्रुप और वेक्टर एक्सपर्ट इस गोष्ठी के प्रायोजक हैं तथा मीडियाभारती.कॉम, मनीषजे.कॉम, द इमर्जिंग वर्ल्ड और समाचारएक्सप्रेस,कॉम इस आयोजन के दैरान मीडिया पार्टनर रहेंगे।

Wednesday, 23 August 2017


दूर क्षितिज में जब पहाड़ियों की ढलान से उतरते हुये सुर्य की अंतिम रश्मियों ने भी अपनी सांस तोड़ दी तो बॉल्डर की पीठ से न जाने कब से अपनी पीठ टिकाये हुये मेरा शरीर दुखने लगा था। अपने कुछ अजीज मित्रों की ऊल-जुलूल बातों से बचने के ख्याल से उनसे दृष्टि चुराकर मैं चुपचाप ढलते हुये सूर्य की अंतिम यात्रा के धीरे-धीरे करके लुप्त होते रंगों को देख रहा था और पहाड़ी वातावरण की प्यार से गुदगुदाती मदमस्त हवाओं में बॉल्डर की पीठ से अपनी पीठ टिकाये हुए अपने विचारों में गुम ही था कि एकाएक यादों के पहाड़ मेरे सामने बाहे फैलाए खड़े हो गए। कितना अच्छा दिन हुआ करता था जब हम सारे दोस्त इन पहाड़ियों पर आ कर ढलान से उतरते सुरज की अंतिम रंगों को देखा करते थे। हर त्योहार हम लोग उसी पहाड़ पर तो जा कर मनाते थे, लेकिन अब हर त्योहार पर मैं अकेला होता हूं नितांत अकेला, तुमलोगों की प्यार की अथाह खूशहू से मैं मिलो दूर तुमलोगों की यादों की कुंज में अकेला पड़ा रहता हूं। यह शहर त्योहार के दिन काटने को दौड़ता है यह शहर त्योहार के दिन भी हंसता नहीं है और ना ही रोता है। यह शहर इतना आवारा है दोस्त की कभी सोता तक नहीं मैं भी आवारा हो गया हूं दोस्त पूरी रात यू ही कट जाती है अकुलाते हुए यह जागरण, यह उनींदापन एक अजीब सी खौफ मेरे अंदर पैदा कर रहा है। जो दिल कभी एक अजीब सी सुखानुभूति से भरा होता था। वह आज यू ही धड़कता है, देह यूं ही पसीजता है, नसे यू ही खिचता है। देह की भाषा भी भूल गया है दोस्त। यहां ना दूर क्षितिज में पहाड़ियों का ढलान है और ना सुर्य की अंतिम रश्मियां अगर यहां है तो बस चौड़ी-चौड़ी सड़के उसपे भागती-दौड़ती गाड़ियां, अस्त-व्यस्त लोग, ऊंची-ऊंची इमारतें और इन इमारतों में रहते बिना वेदना वाले लोग। यही इस शहर की खासियत है दोस्त यहां ना कोई बोलने आता है औऱ ना ही छेड़ने मैं यहां नितांत अकेला पड़ा होता होता हूं। 

Wednesday, 16 August 2017

Posted by Gautam singh Posted on 05:00 | No comments

तान्या




चमन मिश्रा का उपन्यास 'तान्या' नई वाली हिन्दी में लिखा गया है। यह सत्य और कल्पना दोनों का सहारा लेकर व्यापक सामाजिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है। चमन मिश्रा का  यह उपन्यास हिंदी साहित्य के इस बासी से हो रहे माहौल में भी कुछ नया व ताज़ा करने की कोशिश पूरी तरह से मरी नहीं है को दर्शाता है। यह किताब आम बोल चाल के भाषा में लिखा गया है। इस किताब की यही सबसे प्रमुख नयापन है। यूं तो इस उपन्यास का प्रत्येक अध्याय अपने आप में स्वतंत्र है, लेकिन जरा गहराई से अगर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र से दिखने वाले यह उपन्यास कहीं न कहीं आपको बांध देता है। इसी क्रम में किताब के कुछ प्रमुख अध्यायों पर एक संक्षिप्त नज़र डालें, तो इसका पहला अध्याय ‘बिछड़न, इश्क और बनियागिरी’ किताब की वास्तविक भूमिका है। इसमें जीवन की आपा-धापी से कुछ समय मिलने पर लेखक ने दो प्यार करने वाले के अन्तःप्रेम को दर्शाया है जो आज के आभासी दुनिया में प्रेम करने के नए ठिकानों को दर्शाता है। तो वहीं दूसरे अध्याय पर नजर डाले तो 'दिल्ली, आशिक़ अर्नब और प्रपोज़ल' में लेखक की डायरी दूसरी तरफ मुड़ती है। दूसरे अध्याय में चीजें फ्लैशबैक में चली जाती हैं। वह स्कूल के दिनों में पहुंच जाते है। जब पहली बार तन्या ने उसे प्रपोज़ल भेजा था। इसी प्रकार प्रत्येक अध्याय एक दूसरे से क्रमवार ढंग से जुड़ते चले जाते है। किताब का एक अध्याय 'स्कॉर्पियो, वेंटिलेटर और अंतिम पत्र' इस उपन्यास की टर्निंग प्वाइंट है। जिसमें नायिका का एक्सीडेंट से लेकर अंतिम पत्र को दर्शया गया है। इस उपन्यास का अंतिम अध्याय 'प्रशांत, तान्या और अधूरा सवाल' में लेखक ने पूरे उपन्यास का निचोड़ दर्शाया है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसीको भी तान्या निराश नहीं करने वाली। किताब भाव, भाषा और विस्तार के मोर्चे पर सौ फीसदी खरी उतरी है। कुछ गुंजाइश भी है। फिर भी वर्तमान हिंदी के दौर का एक शानदार 'उपन्यास' जिसमें प्यार, दुश्मनी, दोस्ती दिखती है। इसका अंत सबसे बेहतरीन जिसपे प्रत्येक पढ़ने वाले कहे रवि और तान्या का अंत ऐसा नहीं हो सकता..! आखिर में, इस सुन्दर रचना के लिए चमन को ढेरों बधाइयां.!

Thursday, 3 August 2017

Posted by Gautam singh Posted on 03:24 | No comments

प्यारी मां

प्यारी मां

तुम्हारे अथाह प्यार की खूबसूरती से मैं मिलों दूर तुम्हारे यादों के प्रकाश में यह खत लिख रहा हूं। तुम्हें खत लिखने से पहले हजारों दफा न जाने क्या-क्या लिखा और न जाने क्या-क्या मिटाया। कितना मुश्किल होता है मां अपने ही लिखे को मिटाना। तुमको पता है मां मैंने अपने दर्द को नहीं लिखा, मैंने शिकायते नहीं लिखी, लेकिन फिर भी मैंने हजारों खतों को मिटा डाला। यह खत मेरी जिन्दगी की सच्चाई है मां मुझे अपने ही लोगों ने हशिये पर ला कर खड़ा कर दिया है। मैं जिन लोगों को आंखों पर बैठाकर रखता था उन्होंने ही मेरे साथ छल किया है। मैं उनलोगों के बीच रहते-रहते एकदम खाली हो गया हूं मां। ठीक वैसे ही जैसे शराब की बोतल खाली होता है और खाली बोतल को जहां लोग फेकते है आज मुझे भी वहां फेक दिया गया है। कोई नजर तक उठा कर नहीं देखता।

सोचा था मां तुम्हें सब अच्छा-अच्छा लिखू पर नहीं लिख पा रहा हूं। जो सच है वह बता देना चाहता हूं। किताबों कि दुनिया में रहते-रहते इंसानों को पढ़ना ही भूल गया मां... कोल्ड ड्रिंक की बोतल से लेकर मंदीर की घंटी तक में मैंने शांति को खोजा है। हर रोज किताबों के बीच से कई सवाल मेरे सामने बाहें फैलाए खड़े हो जाते है मां उस वक्त मेरे पास कोई जवाब नहीं होता और मैं फिर शान्ति के प्रयास में भटकने लगता हूं, लेकिन कुछ दिखाई नहीं देता अगर कुछ दिखाई पड़ता है तो बस किताबों से भरा पड़ा एक कमरा, अगर कुछ महसूस होता है तो किताबों की गंध और उस गंद में गिरता-उठता मैं। मां मैं दिन पर दिन एक बेकार आदमी होता जा रहा हूं। मेरे पास अब न सोचने की शक्ति बची है और न ही समझने की चाह।


अब बस ऐसा लगता है मां कि मैं किसी ऐसी इमारत के रचना में लगा हूं जिसके कमजोर कारिगरियों के चलते नियती में गिरना लिखा कर लाया हो। अब मुझे नींद भी नहीं आती मां राते करवटे फेरते कट जाती है। स्लीपिंग पिल्स की तीन-तीन गोलियां भी मुझे नींद नहीं दे पाती सारी रात शान्ति के प्रयास में अकुलाते हुए कट जाती है। यह जागरण, यह उनींदापन एक अजीब सी खौफ मेरे अंदर पैदा कर रहा है। अब इतनी भी शक्ति नहीं रहा मां की अपने कमरे के बाहर वाले मैदान का मैं एक चक्कर लगा सकूं... जो दिल कभी एक अजीब सी सुखानुभूति से भरा होता था। वह आज यू ही धड़कता है, देह यूं ही पसीजता है, नसे यू ही खिचता है। देह की भाषा भी भूल गया हूं मां....


मेरा जीवन शरदचंन्द्र की उपन्यास देवदास के जैसे होते जा रही है मां जिसमें कहानी या क्लाइमेक्स की बजाय जीवन किसी की चाह में भारी होते जाता है ठीक वैसे ही मेरा जीवन उभ भरी यात्रा मात्र रह गया है। दिन की खालीपन मुझे थका देती है मां... रात में मुझे नींद नहीं आती और जब मैं किताबों से उबने लगता हूं तो रात के घोर अंधेरे में अपना लैपटॉप ऑन कर लेता हूं। गूगल पर मरने का आसान तरीके खोजने लगता हूं। फिर एका-एक मेरे अंदर अजीब सा डर सामाहित हो जाता है मैं डर के मारे नेट बंद कर देता हूं। मैं यह जातने हुए की मौत बहुत ही खूबसूरत है फिर भी डर जाता हूं। यह डर कैसा है मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है। शायद मैं डरता हूं। खुद को मारने से लेकिन अपने-आपको मारने से कही अजीब है अकेले मर जाना मां....