Saturday, 3 August 2019

सुनो 
तुम चाय की कप भी ऐसे पकड़ते हो जैसे जाम हो और वो भी आखिरी ऐसा लगता है कि इसके बाद और नसीब नहीं होने वाला तुम्हे...

हां ये आखिरी वाली बात तो सही है और तुम तो जानती हो मैं चाय के साथ मुहब्बत में हूं और मैंने जिससे भी प्रेम किया आखिरी मान कर ही किया और चाय को भी आखरी मान कर रहा हूं, ये जानते हुए भी कि यह आखिरी नहीं है। कहने से आखिरी नहीं होता। सबके साथ पुराना साथ रहता है, चलता साथ है। पुराना कुछ भी मरता नहीं, वो आखिरी को आखरी होने नहीं देता। और तुम तो जानती हो मैं जाम को छूता तक नहीं इसलिये चाय को जाम कि तरह पकड़ता हूं और हां यह चाय का प्याला मेरे लिए आखिरी जाम से कम नहीं, जो कुछ वक्त के बाद पुराना होने वाला है। 

कभी कसी बात का जवाब सीधे भी तो दे सकेत हो...तुमसे बात करने पर ऐसा लगता है बात नहीं कर रही बल्कि किताब पढ़ रही हूं...

तो किताब पढ़ना कौन सा बुरा काम है..

हां इतने दिनों से तुम्हे पढ़ ही तो रही हूं...प्रेम थोड़ी न कर रही हूं और ताउम्र तुमको पढ़ते जाने की तमन्ना भी है...और वैसे भी तुम मुझसे प्यार करते हो या चाय से...

शायद चाय से जिसे तुम बनाती हो, आखिरी कह कर...

Sunday, 7 April 2019

आदत गई नहीं ना तुम्हारी 
कौन सी 
नजरे चुराने की 
तो तुम्हारी कहां चली गई 
कौन सी 
नजरे मिलानी की, जब से आई हो बस देखे जा रही हो
तुम हमेशा सवाल का जवाब सवाल करके ही क्यों देते हो 
क्या करे आदत जो है।
अच्छा सच-सच बताओं नंबर सेव था न मेरा 
नहीं 
छूठ मत बोलो, बहाना करना आज भी नहीं आता तुमको
जब तुमको पता है तो फिर पूछती क्यों हो
अच्छा और बताओं क्या चल रहा है तुम्हारा आज कल
कुछ खास नहीं बस अपने काम और कविता, कहानियों में व्यस्त हूं...
अच्छा अब तो तुम अपने ऑफिस में भी लड़कियों को कविता, कहानियां सुनाते होगें और अब तो कई लड़कियां तुम्हारी दोस्त भी होगी..
देखो जैसे हम दूसरे की जिन्दगी को देखते है वैसा होता नहीं...
अरे चल झूठा अब भी तुम्हे झूठ बोलना नहीं आता 
अरे मैं सच्च बोल रहा हूं झूठ क्यों बोलूं... अच्छा ये बताओं आज तुम यहां कैसे
पिछले 2 सालों से मुझे तुमसे बहुत सारी शिकायत करनी थी इस लिए आ गई मिलने
अच्छा तो तुम शिकायत करने मुझसे मिलने आयी हो...इतना भी झूठ मत बोलों, अब सच-सच बता भी दो...
अरे मुझे तुम्हारे शहर में कुछ काम था इसलिए आई हूं तो सोची तुम्हे फोन करके मिल लूं...
और तुम्हारा बेबी कैसी है 
तुम्हे कैसे पता मुझे बेबी है, 
अरे वो रवि बता रहा था

अरे ऐसा नहीं है 
हद हो गया यार तुम कितना झूठ बोलोंगे... आज तक तुम खुल कर बोलना नहीं सिख पाये...
हां कभी-कभी देख लेता हूंअच्छा एक बात बताओं क्या तुम मुझसे प्यार करते थे 
अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है...
वो पता है मुझे पर तुम जवाब तो दे ही सकते हो न
शायद हां
तो फिर कुछ कहा क्यों नहीं 
तुम तो बिन बोले मेरी सब बातों को समझ जाया करती थी तो फिर इस को कहना जरूरी तो नहीं था तुम समझ सकती थी...
तुम बता भी तो सकते थे...
कैसे बताता तुम्हे, तुम तो जानती थी मेरे पास जॉब तो था नहीं, तो कैसे कह देता, खुद को तो संभाल नहीं पा रहा था तो तुमको कहां से संभालता
यह जरूरी तो नहीं की जॉब होना चाहिये प्यार के लिए, और मैंने कब कहा था की तुम मुझे संभालना...तुम बोलते तो मैं जॉब करती अपने आप को और तुम्हे दोनों को संभालती 
अच्छी बात है तुम जॉब करती और मैं घर पर बैठा खाता लोग क्या कहते...
तुम्हारा सोच नहीं बदला अभी तक, तुम वही करते जो तुम करना चाह रहे थे। 
सच पूछो तो मैं उस वक्त समझ ही नहीं पाया कि मैं तुम्हारे साथ रहते हुए भी मैं अपने करियर पर फोकस कर सकता था, पर अब क्या करुं जो हो गया सो हो गया वक्त को तो घुमा नहीं सकता ना...
सॉरी
अरे सॉरी मत बोलो अगर अभी से तुम सॉरी बोलने लग जाओंगे तो मैं झगड़ा किस से करुगी... अच्छा बता मिला तुम्हे
क्या?
वही जिसके लिए तुम मुझे छोड़ कर चल दिये थे 
नहीं अभी तो नहीं, अभी शायद वक्त लगें
तो फिर जमकर मेहनत करो और जल्दी से अपने मंजिल पर पहुचों... अच्छा शादी कब कर रहे हो और हां शादी में जरूर बुलाना 
नहीं कर रहा शादी 
क्यों
मन नहीं है 
क्यों मन नहीं है 
कोई अब मिल ही नहीं रही जिससे प्यार हो 
अरे तुम पागल हो क्या कोई न कोई मिल ही जाएगी.. और वैसे भी इन दो सालों में मुश्किल से 3 बार बात हुई है वो भी बस हाल-चाल लेने के लिए
तो मैं क्या करता मैं नहीं चाहता हूं की मेरी वजह से तुम्हारी जिन्दगी में कोई भूचाल आ जाये 
अरे नहीं आता कोई भूचाल तुम बात तो करते इससे मुझे पता तो चलता की तुम ठीक हो... तुम्हे पता है मैं सोच कर आयी थी कि आज तुमसे बहुत शिकायत करुंगी और लड़ाई भी करुंगी पर तुम्हे देखते ही भूल गई अच्छा अब मैं चलती हूं तुम अपना ध्यान रखना और हां फोन भी कर लिया करना जानती हूं तुम बहुत व्यस्थ हो अपनी जिन्दगी में पर याद रखना कोई है तुमसे मीलो दूर जिसे आज भी तुम्हारा ख्याल है।


Saturday, 23 March 2019

Posted by Gautam singh Posted on 05:15 | No comments

कौन सी आजादी चाहिये

ऐसी निर्मम हत्याओं के बीच खून सने माहौल में मानवता का वध करने वालों को कैसी आजादी चाहिये…जहां बंदूक की नोक पर खोखली विचारधारा का रावणराज स्थापित करने की जद्दोजहद मची हो… और उसकी बलि बेदी पर मासूम से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक की धड़ल्ले से निर्मम हत्या की जाती हो… और जाहिलियत की जिद के आगे सारे नियम कानून ताख पर रखकर महज आजादी की ढ़ोंग अलापकर नंगा नाच किया जाता हो… ऐसे हृदय विदारक भीषण माहौल में कैसी आजादी कुर्बान कर दी जाए …..जिससे स्वतंत्रता के नाम पर हत्याएं, समानता के नाम पर नर संघार, अभिव्यक्ति के नाम पर रक्तपात और खूनी शौक पूरा करने के लिए मानव वधशालाओं की खुली छूट हो…
क्या हम इस तरह के दुख दर्द से कराहते हुए माहौल में अब भी भटके हुए बच्चे की आजादी के लिए पैरवी करें… जिनकी निर्ममता के आगे समग्र मानवता अकारण ही वध का शिकार हो जाने की ओर अग्रसर हो… कौन चाहेगा कि खून सनी घाटियों के बीच मानवता के राक्षसों को खुली आजादी देदी जाए जहां इंसानियत की हत्या करना पसंदीदा शौक हो…. मानवता के समक्ष भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग काम कर रहे हैं….मनुष्य के हित के लिए अधिकाशतः मानवाधिकार बनाए गए हैं.. जो सिर्फ मनुष्यों की ही रक्षा करते हैं… सोचने में तो भले ही यह राम राज्य से ओत प्रोत जैसा लगता होगा …लेकिन हम कैसे यह बात कह दें… कि मानवता के विध्वंसक जब मासूम बच्चों को अगवा करेंगे और उनकी आड़ में पूरे परिवार को बंदी बनाकर बचने की कोशिस करेंगे… ऐसे खौलते माहौल में कौन सा मानवाधिकार उस मासूम के रक्षा की जिम्मेवारी लेगा…

Thursday, 14 February 2019

महारास की अद्भुत बेला में प्रेम संकरी गलियों और नाजुक राहों से गुजरता हुआ प्रेम आज ग्लोबलाइज्ड हो गया है। वैश्विक गांव में मॉडर्न हो गया है। बेबाक हो गया है। किसिंग, चैटिंग, डेटिंग हो गया है। वैलेंटाइन्स डे उसका हो गया है जो सेटल हो गया है। प्रेम माह का गुलाबी रंग लाल गुलाब की पंखुड़ियों में समाता है और इजहार-ए-मोहब्बत बन खिल जाता है। लेकिन सबका नहीं, मौसम की चुहल टेडी-बियर के नटखटपने में घुल-मिल जाती है। प्रेम पगी फिजाओं की मिठास चॉकलेट-कैंडियों में समा गई है। ऋतुराज की खुमारी (मनोज) और नशा युवा दिलों को मदहोश किये देता है। प्रेम सुबास बिखेरे तो प्रेम है। प्रेम चाहना नहीं। न्योछावर हो जाना है। लेकिन उनकी जो एक दूजे के पूरे है। हम कैसे कहें यह सबका है, सबके लिए है और उल्लास से भरा है। 

इसे बदरंग और बाजारू बनने से बचाना है और बचना है। लेकिन उनका क्या होगा जैसे दिवाली की जगमगाती रात में फुटपाथ पर टहलते फटे-चीथड़े हाल पेट पर हाथ मलते वो बच्चे जो दिवाली का त्योहार नहीं बल्कि रोटी तलाश रहे होते हैं। ये तो सच है कि वे भूखे होते हैं जैसे दिवाली किसी की नसीब में खुशी का उत्सव व किसी की नसीब में गम लेकर आती है। ठीक वैसे हम आज इस पावन सुहाने वैलेंटाइन्स डे को अंतस में भरें तो उसी पेट पर हाथ मलते हुए बच्चे की तरह करुणा, दुःख, दर्द, पीड़ा समेटे यह दिन माघ की स्याह रात की तरह मानो किसी नंगे भिक्षुक के ऊपर से गुजर जता है और हम अपने अंतस में किसी भूखे पेट बच्चे की रोटी किसी अधनंगे बेसहारा मांगने वाले की तरह दिल फैलाये इन कयामत भरी इतराने वाली हुस्न की कलियों से भीख मांग रहे होते हैं।

फिर भी हैं तो ऐसी की मिजाज का पता ही नहीं खैर कोई बात नहीं बाबा तुलसी ने ठीक ही कहा है कि ''सकल पदार्थ है  जग माही कर्म हीन नर पावत नाहीं" दुनिया में सारी चीजें भरी पड़ी है लेकिन वो सभी के लिए नहीं है। वही पाता है जिसके भाग्य में होता है। मेरी तरह आज कई ऐसे नौजवान लड़के सागर जैसा दिल खाली किये अपनी दिल रुबा की याद में तड़प रहे होते है और कुछ तो वातावरण में बह रही मलयवाही हवाओं के बीच बंसंत के पावन महक में अपना मधुमास मना रहे होते हैं। ये दर्द हमारे अकेले का नहीं है मैं अपनी ओर से आप सबकी पीढ़ा गाने की हिम्मत कर रहा हूं। 

आभार

Monday, 4 February 2019

Posted by Gautam singh Posted on 03:11 | No comments

मैं रोज सोचता हूं

मैं रोज सोचता हूं एक दफा तुम्हारा शहर आकर घूम आऊं पर यह सोच बस एक ख्वाब बन कर ही रह जाता है। जब से तुम यह शहर छोड़ कर गयी हो तब से मैंने अपने ख्यालों की दुनया में एक नया शहर बसा लिया है। लेकिन फिर भी मन अक्सर तुम्हारे शहर को लेकर सपना बुनते रहता है। वही शहर जिसके नाम से ही मेरे अंदर आग की लपटे उठने लगती है फिर भी न जाने क्यों एक बार तुम्हारे शहर में जाकर तुम्हे देखने की आस लिये बैठा हूं। मैं जानता हूं तुम मुझे भूल गई होगी लेकिन फिर भी मैं जाना चाहता हूं। क्यों जाना चाहता हूं पता नहीं...


मुझे याद है जब तुम मेरे शहर को छोड़कर जा रही थी उस दिन तुम ट्रेन की विंडो़ वाली सीट पर बैठ कर मुझे नहीं सूरज को निहार रही थी जैसे मेरा तुमसे कोई वास्ता ही नहीं, तुम जानती हो ना उस दिन मेरे ऊपर क्या बीत रहा था... ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सारी दुनिया खामोश हो गयी हो, नदियों की कलरव ले लेकर पत्तियों की चरमराहट तक पंक्षी की चहचहाहट से लेकर हवाओं की सरसराहट तक सब खामोश हो गया था। बस एक मैं ही तुम्हें निहार रहा था। तुम्हें जाते देख रहा था और तुम मुझसे मुह मोड़ कर सूर्य को देख रही थी। मुझे क्यों लगता है जब तुम अपना शहर पहुंची होगी तो सबसे पहले तुम्हें मेरी याद आयी होगी। 

तुम जानती हो तुम्हारे जाने के बाद मैंने अपने ख्यालों में तुम्हारे घर की ओर जाने वाली सड़क के बारे में भी सोचता था। मुझे लगता तुम अपने शहर में एक ऑटों की होगी उस पर सवार हो कर अपने घर को गई होगी वही घर जिसके दिवारें लाल रंग से रंगी हुई है। तुमने फिर उस दिवारों पर कॉलेज के दोस्तों के साथ-साथ उस शहर से जुड़ी कई तस्वीरों को अपने आंखों के सामने लगाया होगा उसी तस्वीरों में कहीं मेरी भी तस्वरीर होगी। हकीकत में जिसे तुम पीछे छोड़ आयी हो। तुम जानती हो अब बस तुम्हारे शहर के नाम के अलावे और कुछ याद नहीं रहता मुझे...


आज मैं उसी शहर में आ गया हूं जिस शहर से मुझे जलन हुआ करती थी, अब तुम्हारे चाह में मोहब्बत होने लगी है। वही शहर जिसने मुझे तुमसे दूर किया। आज वही शहर ने न जाने कितनी यादें दे रहा है मुझे। जो शायद मुझे कभी अपने शहर से नहीं मिला। तुम्हारे सारे ख्याल जो मैंने बहुत पहले सोचे थे, आज भले ही टूट गये हो। लेकिन मैं खूश हूं क्योंकि मैं अब भी उस लड़की के बारे में ही सोच रहा हूं। जो पहले रंगीन दिवारों वाले कमरे में रहती थी आज सफेद दीवारों वाले कमरे में रहने लगी है पर उस कमरे में बहुत कुछ पुरानी यादें हैं। मेरे शहर की सारी तस्वीरों के साथ-साथ एक मेरी तस्वीर जिसे उसने सारी तस्वीरों के बीच में लगा रखा है। वो अब नये ख्यालों में रहती है, नया शहर, नया जॉब नये दोस्त, घर पुराना लेकिन पेन्ट नया और उन सबके बीच में आज भी वह अपने पुराने प्यार से बेपनाह प्यार करती है... 

Tuesday, 18 September 2018

Posted by Gautam singh Posted on 03:02 | No comments

भगवा महज एक रंग नहीं

दुनिया में कई रंग है और यह दुनिया रंग बिरंगी है। किसी को लाल तो किसी को पीला रंग पसंद है। किसी को हरा तो किसी को नीला रंग पसंद है। रंग चाहे जो हो सबको कोई ना कोई रंग जरूर पसंद है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक रंग का अपना अलग महत्व है। भगवा रंग सिर्फ हिंदू धर्म में ही आस्था का प्रतीक नहीं है। इस रंग को कई अन्य धर्मों में भी पवित्र माना जाता है।

केसरिया या भगवा रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। कहा जाता है कि शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है, मतलब हिन्दू की चिरंतन, सनातनी, पुनर्जन्म की धारणाओं को बताने वाला रंग है यह। जैसे हम सभी को पता है कि हिन्दू धर्म में सूर्य और अग्नि दोनों को पूजा जाता है। रौशनी और अग्नि बुराइयों को दूर करती है। केसरिया या पीला रंग सूर्य और अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है।

अग्नि में आपको लाल, पीला और केसरिया रंग ही अधिक दिखाई देगा। हिन्दू धर्म में अग्नि का बहुत महत्व है। यज्ञ, दीपक और दाह-संस्कार अग्नि के ही कार्य हैं। अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिन्दू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है। कहा जाता है कि पुराने ज़माने में साधु संत जब मोक्ष की प्राप्ति के लिए निकला करते थे तब अपने साथ अग्नि को भी लेकर निकलते थे। यह अग्नि उनकी पवित्रता की निशानी बन जाती थी। पर हर समय अग्नि रखना कठिन था इसलिए अग्नि की जगह भगवा रंग के ध्वज को साधु संत लेकर चलने लगे फिर धीरे धीरे साधू संत केसरिया या कहें भगवा रंग के वस्त्र भी पहनने लगे।

भगवा रंग का इस्तेमाल हिंदू के साथ ही बौद्ध धर्म और सिख धर्म में भी होता है। बौद्ध भिक्षु हमेशा भगवा कपड़ों में ही रहते हैं। सिख धर्म के अनुयायी भगवा पगड़ी को महत्व देते हैं, गुरु ग्रंथ साहेब को भी भगवा वस्त्र में रखा जाता है। सिख धर्म की ध्वजा निशान साहेब भी भगवा रंग की है। पूरे झंडे को भगवा कपड़ों में ही लपेटकर रखा जाता है। भगवा रंग का हिंदू धर्म या कहें कि सनातन धर्म का हिस्सा बनने की कहानी भी बहुत पुरानी है। भगवा वास्तव में ऊर्जा का प्रतीक है। जीवन और मोक्ष को भगवा के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह शब्द भगवान से निकला है। यानी भगवान को मानने वालों का भगवा रंग प्रतीक बन गया।

Wednesday, 12 September 2018

मुझे अब भी याद है उस दिन बारिश होने लगी थी जोर-जोर से बिजली भी कड़की। लोग भाग रहे थे, कोई अपने सर पर बैग रखकर... तो कोई रेन कोट पहन कर... तो कोई छाता फैलाकर सब भागने में मशगूल थे और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सारी दिल्ली भाग रही हो, बस उस लम्हें हम दोनों अकेले रह गए थे। जहां तक की पहले खड़े होते ही जमाना अपने सारे काम छोड़ कर हम दोनों को हेय नजरों की जंरीरो से जकड़ लेता था। फिलहाल आज हम दोनों उस बारिश में वही खड़े रह गए थे और पहली बार हम दोनों ने जमाने को पास से इतना दूर भागते देखा। अभी कुछ वक्त पहले ही आग उगलती धूप थी वहीं बादलों ने शाम डलने का अनुभव कराया अब अंधेरा सा लग रहा था जैसे सूरज ढल चुका हो। तुम्हें याद जैसे ही बीजली कड़की थी तुम डर के मारे मेरी बाहों में सीमट गई थी। 

यहीं पहला मौका था जब तुम मेरे इतना करीब आई थी। सोचो वो कड़क कितनी हसीन थी जिसने तुम्हे मुझसे लिपटने पर मजबूर कर दिया। तब मैंने पहली बार तुम्हारे कमर पर हाथ रखा था। मैंने जैसे ही तुम्हारे कमर से हाथ हटाना चाहा था तुमने कहा छोड़ना भी मत ऐसे ही पकड़े रहना मुझे ना जाने क्यों बहुत डर लग रहा है। यह कहते हुए तुम्हारी आंखें नम हो गई। मैंने पहली बार तुम्हारे आंखों में आंसु देखा। पता है मैं उस दिन कितना परेशान हो गया था अपने प्यार में तुम्हारे आंसु देखकर... उस दिन ही तुमने कहा था मैं खुद को टूटते हुए देखना चाहती हूं तुम्हारी बाहों में.... याद करो बारिश बहुत देर तक हुई थी जब बारिश थमी, तो भी तुम बहुत देर तक मेरे सीने में मुंह छुपाये थी। उस दिन तुम एक सपने की तरह मेरे आंखों में पहली दफा उतरी वह सपना जिसमें मैंने अपने हिस्से की जिन्दगी अपने हिसाब से जी ली...उस सपने को मैंने एक किरदार के रूप में जिया। 

जिसे एक कहानिकार अपने उपन्यास में नायक के रूप में गढ़ता है। जिसकी मैं शायद कल्पना ही कर रहा था। उस कल्पना लोक के भ्रमण में... मैं अभी खोया ही था कि तुमने कहा अब हमें चलना चाहिए बारिश थम चुकी है। हमें घर जाना था हमदोनों अलग-अलग दिशा में चल दिये मन में कई सवाल और कई उमंगे लिये। जिसका जवाब उस समय न तो मेरे पास था और ना ही तुम्हारे पास...  वक्त गुजरते देर नहीं लगा कब हमदोनों कॉलेज की गलियों से गुजरते हुए जॉब के ऑफिस में जा पहुंचे। यहां सबकुछ अपने हिसाब से नहीं होता यहां प्रोफेशनल दिखने का झोल-झाल है। ऑफिसयली करेक्ट होने का चीख-पुकार है। हम दोनों इस झोल-झाल और चीख-पुकार में ऐसे खोते चले गए की पता ही नहीं चला कब इतना दूर निकल गए। अब तो तुम इतना दूर हो गई हो कि अपने जेठ और सार के लड़के का गुलाम बन गई हो और वहां बंदिशे तो इतना है की जैसे तुम्हारें यादों पर भी पहरा लगा हो। पर तुम्हें कैसे बताऊं गुजरे एक साल में तुम मुझसे होकर कितनी बार गुजरी हो। मैं न जाने कितनी बार जी उठा हूं और न जाने कितनी बार मर कर बचा हूं।

मैं अब रोज अपने आप को समझाता हूं। जिन्दगी के सफर में धूप-छांव होती है। पर दिल कैसे जानेगा की धूप भी तुम ही थी और छांव भी... तुम्हारे जाने के बाद मेरे दिल की सरहदें जाने कितनी बार आबाद हुई है। न जाने कितनी भार उजड़ी है... मैं बस रिफ्यूजी भर रह गया हूं, तुम तो जानती हो सरहदों से मेरी कभी बनी ही नहीं... आज इस खामोंशी के चारों ओर अंधेरा सा छाया रहता है। आंखों में आंखे डाले नजरे एक दूसरे को खोजते रहती है और मैं वहां खड़ा बेसहारा सबकुछ देखता रहता हूं.... जानता हूं तुम नहीं हो और यह भी जानता हूं तुम कभी हो भी नहीं सकती पर फिर भी तुम्हारे होने का सपना देखना कितना सच लगता है। आज भी बारिश हो रही है पर तुम जो होती तो बात कुछ और थी अबकी बारिश तो सिर्फ पानी है। मैं इसे ताकते हुए बस यही सोचता हूं कि तुम मेरे दिल से खेल रही हो और सोचता हूं यह प्यार बिछुड़ा नहीं है। जब विश्वास ना हो तो कभी अपने दिल से पूछ लेना.. आज फिर तेज बाऱिश हुई उतना ही तेज जितना शायद उस दिन हुई थी। बारिश रूक चुकी थी, लेकिन ठंडी हवा के साथ एक ठंडी झन्न ने तुम्हारी याद को जाता कर दिया।