Wednesday, 29 April 2020

अभी तो बहुत वक्त था तुम्हारे पास, अभी तो टाइम आया था तुम्हारा, कितना कुछ करना था तुमको इस दुनिया में अभिनय का एक नया कृतिमान बनाना था। पर तुम बना ना सके, एक इतिहास जिसे लिखा जाना था वह  लिख ना सका...तुम थोड़ी और ताकत तो लगाते  इतिहास को लिखने के लिए... शायद तुमने जी-जान से ताकत लगाई भी होगी। लेकिन तुम जीत न सके काल के इस गाल को हरा ना सके... पिछले दो साल से तुम लड़ ही तो रहा थे पूरे शिद्दत के साथ उस काल से... 

जो तुझे रोज डराता मौत के नाम से, पर तुम रोज उसे हरा कर एक नया सुबह ले आते उस इतिहास को लिखने के लिए जिसे अभी लिखा जाना था। पर इस बार ऐसा हो ना सका और तुम हार गए... शादय तुम थक गए होंगे लागातार उससे लड़ते-लड़ते तुम्हारा शरीर थक चुका होगा... तुम जीना तो चाहते थे पर तुम्हारा शरीर साथ नहीं दे रहा होगा। जाओ तुम अब आराम से सो जाओं, बहुत लड़ाई लड़ी है तुमने, तुम जो इतिहास लिखना चाहते थे वह तो नहीं लिख पाये, पर तुमने जितना भी लिखा है। वह लिखना किसी और की बस की बात नहीं... तुम रहोंगे हमेशा हमारे साथ.... हम नहीं रहेंगे पर तुम रहोंगे हमारे बीच जिन्दा ...जब तक यह ब्रह्ममांड रहेगा...तुह रहोंगे किसी गाने में, किसी डायलोक में हमेशा हमारे बीच...

Wednesday, 2 October 2019

Posted by Gautam singh Posted on 10:46 | No comments

सुनो प्रिय

आज मैं तुम्हे कुछ बताना चाहता हूं हो सकता है मेरी यह बाते तुम्हे शायद बुरा लगे या जरूरत न हो जानने की फिर भी मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ,,, तुम तो जानती हो न प्रिय हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक वैसे ही मेरे भी दो पहलू है,,, एक जो तुम्हारे सामने हंसते बोलते लड़ते-झगड़ते बड़ी-बड़ी आँखे दिखा कर छोटी-छोटी बातो पर बहस करते, तुमसे दूर जाने की सोच से ही डरते तुम्हारे बिन खुद की कल्पना करने मात्र से सिहर उठते,, मैं वह सब कुछ करता जो एक लड़का प्यार में करता है पर एक दूसरा पहलू ठीक इसके विपरीत है जब मैं खुद में रहता हूँ तो एकदम शांत गुमसुम किसी दुनियां दारी से कोई मतलब नहीं होता। 

मैं कई-कई दिनों तक अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकता मेरे लिए वह कमरा ही सब कुछ है उस कमरे में पड़ी कुछ किताबें और उन किताबों के बीच मैं मेरे अंदर तुम्हारी यादे। सच कहुँ तो मैं उस यादों में ही अपने आप में मस्त रहता हूं। किसी के होने या होने का कोई मलाल नहीं होता। देखने में बिल्कुल शांत नदीं की मादिक पर जिस तरह नदियां अपने आप में अशंख्य भवर खुद में सम्माहित किये होती है बिल्कुल वैसे ही मैं भी न जाने कितने भवर ले कर जीता हूँ,, बहना चाहता तो बह जाता इस छोर से कहीं दूर पर वेदनाओं के वेग बहुत तेज होते है न प्रिय न जाने कितना कुछ बहा ले जाये इसलिए शांत हूँ। पर जैसे महादेव ने गंगा को समेट रखा है अपने जटाओं में...अगर तुम भी सम्भाल लो मुझे खुद में कहीं, तो मैं सभी बांधे तोड़ तुम तक आ जाऊँ पर शायद ये सम्भव नहीं है। तुमने कभी देखा है नदियों में उफान उठते हुए हाँ बिल्कुल वैसे ही मुझमें भी एक उफान उठता है जो सिर्फ मुझको ही तबाह करता है,,, प्रिय तुमने कभी सुना है रात में नदियों की कलकलाहट,, रात के पहर बहुत कुछ कहना चाहती है ये नदियां पर उस वक़्त सब उसे छोड़ कर जा चुके होते है,, हाँ तुम आती हो कभी-कभी किनारे तक मुझे जानने के लिए... 

पर तुमने कभी कोशिश नहीं किया मेरे गहरायी तक आने की... न कभी मैंने कोशिश की तुम्हे खुद में सम्माहित करने की... खैर तुम्हारे जाने के बाद कुछ किस्से इस चाँद को भी सुनाता पर वो भी न ठहरता बादलों में छुप जाता और सोचता एक दाग ले कर वो निरन्तर एक समान न रहता फिर ये नदी सबके पापों को ले कर कैसे बहती एक समान,, सच बताऊँ प्रिय जिम्मेदारियों और विश्वासघात के हवनकुंड में जल कर मेरी इच्छायें भी सती हो गयी है मैं भी चाहता तो महादेव की तरह समाधि ले लेता पर कुछ शेष है जो जला नहीं अभी जो रोके हुए है मुझे,, और ये शेष तब जागृत हुआ जब तुम आये,,, कभी उतर आओ इस नदीं में और देखो मेरे हृदय पर लगे आघात को या फिर जाने दो मुझे भी उस समाधि की और जहाँ कोई मोह न हो यकीन मानो मैं वहाँ भी जी सकता हूँ पर एक दर्द के साथ जो जब तक जीवन रहे तब तक रहे, अब तुम पर है तुम चाहो तो रोक लो या मिट जाने दो मुझे !!

तुम्हे चाय ही क्यों पसन्द है, कुछ और भी तो पी सकते हो
जैसे तुम्हें कॉफी के अलावे कुछ और पसन्द नहीं है
हस सवाल का जवाब, सवाल नहीं होता मिस्टर
बिल्कुल सवाल का जवाब, सवाल नहीं होता पर कुछ सवाल ऐसे भी होते है जिसका जवाब ही सवाल होता है...
अच्छा बताओं भी तो तुम्हे चाय ही क्यों पसंद है...

क्यों का जवाब नहीं है मेरे पास... हां बस मुझे चाय ही पसन्द है और वैसे भी मैं कभी क्यों का जवाब नहीं तलाशता...कई बार कोशिश भी करता हूं क्यों का जवाब तलाशने का पर जैसे ही तलाशने बैठता हूं कई डर मेरे अंदर समाहित हो जाते है। मुझे लगने गलता है की कभी तुम यह न पूछ बैठो की तुम मुझे क्यों पसन्द हो... बस इस डर से मैं नहीं तलाशता क्योंकि मुझे पता है यह भी मैं चाय की तरह नहीं बता सकता बस तुम पसंद हो...
अच्छा बाबा मैं तुम्हारे फिलॉसफी मैं नहीं पड़ती और अब मैं यह भी नहीं पुछूंगी की तुम्हे चाय ही क्यों पसंद है... 
ठीक है चलो चाय पीते है किसी कॉफी शॉप पर....  
अरे कितना झुठ बोलती हो तुम 
वो कैसे
मेरे साथ खुश रहती हो और तुम कहती हो मुझे मुझ से मोहब्बत नहीं
खुश रहने का मतलब ये तो नहीं है न की तुमसे प्यार करती हूं 
तो फिर तुम मुझसे हमेशा क्यों बात करती हो 
बस ऐसे ही क्यों मैं तुमसे बात नहीं कर सकती 
बिल्कुल कर सकती हो, पर रात में तीन-तीन बजे तक भला कौन लड़की ऐसे किसी से लड़के से बात करती है
क्यों बात नहीं कर सकती कोई लड़की बात और यह किसने कहा है कि कोई लड़की रात में किसी लड़के से बात नहीं कर सकती और अगर करती है तो वह उससे प्यार ही करती है। यह अधिकार किसने दिया और यह कौन सी पंचवर्षीय योजना के तहत आया था, जरा बताओंगे ...

कौन सी पंचवर्षीय योजना के तहत आया था ये तो मैं नहीं जानता और ना ही जानना चाहता हूं मैं बस यह जानना चाहता हूं की तुम मुझसे प्यार करती हो या नहीं...
नहीं करती और यह प्यार-व्यार की चक्कर में मैं पड़ना भी नहीं चाहती 
तो फिर तुम इतना बात मुझसे क्यों करती हो
क्यों एक दोस्त दूसरे दोस्त से बात नहीं कर सकता क्या, वैसे भी मैं तुमसे बात इसलिए करती हूं क्योंकि हमदोनों की सोच मिलता है इस लिए और मुझे तुमसे बात करना अच्छा लगता है। 
वैसे तुम्हे ये तो पता होगा की किसी ने लिखा है की एक लड़का और एक लड़की ज्यादा वक्त तक दोस्त नहीं रह सकता...
अच्छा तुम्हे तो बहुत पता है, अगर यह किसी ने लिखा है तो फिर सही ही लिखा होगा... 

Saturday, 3 August 2019

सुनो 
तुम चाय की कप भी ऐसे पकड़ते हो जैसे जाम हो और वो भी आखिरी ऐसा लगता है कि इसके बाद और नसीब नहीं होने वाला तुम्हे...

हां ये आखिरी वाली बात तो सही है और तुम तो जानती हो मैं चाय के साथ मुहब्बत में हूं और मैंने जिससे भी प्रेम किया आखिरी मान कर ही किया और चाय को भी आखरी मान कर रहा हूं, ये जानते हुए भी कि यह आखिरी नहीं है। कहने से आखिरी नहीं होता। सबके साथ पुराना साथ रहता है, चलता साथ है। पुराना कुछ भी मरता नहीं, वो आखिरी को आखरी होने नहीं देता। और तुम तो जानती हो मैं जाम को छूता तक नहीं इसलिये चाय को जाम कि तरह पकड़ता हूं और हां यह चाय का प्याला मेरे लिए आखिरी जाम से कम नहीं, जो कुछ वक्त के बाद पुराना होने वाला है। 

कभी कसी बात का जवाब सीधे भी तो दे सकेत हो...तुमसे बात करने पर ऐसा लगता है बात नहीं कर रही बल्कि किताब पढ़ रही हूं...

तो किताब पढ़ना कौन सा बुरा काम है..

हां इतने दिनों से तुम्हे पढ़ ही तो रही हूं...प्रेम थोड़ी न कर रही हूं और ताउम्र तुमको पढ़ते जाने की तमन्ना भी है...और वैसे भी तुम मुझसे प्यार करते हो या चाय से...

शायद चाय से जिसे तुम बनाती हो, आखिरी कह कर...

Sunday, 7 April 2019

आदत गई नहीं ना तुम्हारी 
कौन सी 
नजरे चुराने की 
तो तुम्हारी कहां चली गई 
कौन सी 
नजरे मिलानी की, जब से आई हो बस देखे जा रही हो
तुम हमेशा सवाल का जवाब सवाल करके ही क्यों देते हो 
क्या करे आदत जो है।
अच्छा सच-सच बताओं नंबर सेव था न मेरा 
नहीं 
छूठ मत बोलो, बहाना करना आज भी नहीं आता तुमको
जब तुमको पता है तो फिर पूछती क्यों हो
अच्छा और बताओं क्या चल रहा है तुम्हारा आज कल
कुछ खास नहीं बस अपने काम और कविता, कहानियों में व्यस्त हूं...
अच्छा अब तो तुम अपने ऑफिस में भी लड़कियों को कविता, कहानियां सुनाते होगें और अब तो कई लड़कियां तुम्हारी दोस्त भी होगी..
देखो जैसे हम दूसरे की जिन्दगी को देखते है वैसा होता नहीं...
अरे चल झूठा अब भी तुम्हे झूठ बोलना नहीं आता 
अरे मैं सच्च बोल रहा हूं झूठ क्यों बोलूं... अच्छा ये बताओं आज तुम यहां कैसे
पिछले 2 सालों से मुझे तुमसे बहुत सारी शिकायत करनी थी इस लिए आ गई मिलने
अच्छा तो तुम शिकायत करने मुझसे मिलने आयी हो...इतना भी झूठ मत बोलों, अब सच-सच बता भी दो...
अरे मुझे तुम्हारे शहर में कुछ काम था इसलिए आई हूं तो सोची तुम्हे फोन करके मिल लूं...
और तुम्हारा बेबी कैसी है 
तुम्हे कैसे पता मुझे बेबी है, 
अरे वो रवि बता रहा था

अरे ऐसा नहीं है 
हद हो गया यार तुम कितना झूठ बोलोंगे... आज तक तुम खुल कर बोलना नहीं सिख पाये...
हां कभी-कभी देख लेता हूंअच्छा एक बात बताओं क्या तुम मुझसे प्यार करते थे 
अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है...
वो पता है मुझे पर तुम जवाब तो दे ही सकते हो न
शायद हां
तो फिर कुछ कहा क्यों नहीं 
तुम तो बिन बोले मेरी सब बातों को समझ जाया करती थी तो फिर इस को कहना जरूरी तो नहीं था तुम समझ सकती थी...
तुम बता भी तो सकते थे...
कैसे बताता तुम्हे, तुम तो जानती थी मेरे पास जॉब तो था नहीं, तो कैसे कह देता, खुद को तो संभाल नहीं पा रहा था तो तुमको कहां से संभालता
यह जरूरी तो नहीं की जॉब होना चाहिये प्यार के लिए, और मैंने कब कहा था की तुम मुझे संभालना...तुम बोलते तो मैं जॉब करती अपने आप को और तुम्हे दोनों को संभालती 
अच्छी बात है तुम जॉब करती और मैं घर पर बैठा खाता लोग क्या कहते...
तुम्हारा सोच नहीं बदला अभी तक, तुम वही करते जो तुम करना चाह रहे थे। 
सच पूछो तो मैं उस वक्त समझ ही नहीं पाया कि मैं तुम्हारे साथ रहते हुए भी मैं अपने करियर पर फोकस कर सकता था, पर अब क्या करुं जो हो गया सो हो गया वक्त को तो घुमा नहीं सकता ना...
सॉरी
अरे सॉरी मत बोलो अगर अभी से तुम सॉरी बोलने लग जाओंगे तो मैं झगड़ा किस से करुगी... अच्छा बता मिला तुम्हे
क्या?
वही जिसके लिए तुम मुझे छोड़ कर चल दिये थे 
नहीं अभी तो नहीं, अभी शायद वक्त लगें
तो फिर जमकर मेहनत करो और जल्दी से अपने मंजिल पर पहुचों... अच्छा शादी कब कर रहे हो और हां शादी में जरूर बुलाना 
नहीं कर रहा शादी 
क्यों
मन नहीं है 
क्यों मन नहीं है 
कोई अब मिल ही नहीं रही जिससे प्यार हो 
अरे तुम पागल हो क्या कोई न कोई मिल ही जाएगी.. और वैसे भी इन दो सालों में मुश्किल से 3 बार बात हुई है वो भी बस हाल-चाल लेने के लिए
तो मैं क्या करता मैं नहीं चाहता हूं की मेरी वजह से तुम्हारी जिन्दगी में कोई भूचाल आ जाये 
अरे नहीं आता कोई भूचाल तुम बात तो करते इससे मुझे पता तो चलता की तुम ठीक हो... तुम्हे पता है मैं सोच कर आयी थी कि आज तुमसे बहुत शिकायत करुंगी और लड़ाई भी करुंगी पर तुम्हे देखते ही भूल गई अच्छा अब मैं चलती हूं तुम अपना ध्यान रखना और हां फोन भी कर लिया करना जानती हूं तुम बहुत व्यस्थ हो अपनी जिन्दगी में पर याद रखना कोई है तुमसे मीलो दूर जिसे आज भी तुम्हारा ख्याल है।


Saturday, 23 March 2019

Posted by Gautam singh Posted on 05:15 | No comments

कौन सी आजादी चाहिये

ऐसी निर्मम हत्याओं के बीच खून सने माहौल में मानवता का वध करने वालों को कैसी आजादी चाहिये…जहां बंदूक की नोक पर खोखली विचारधारा का रावणराज स्थापित करने की जद्दोजहद मची हो… और उसकी बलि बेदी पर मासूम से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक की धड़ल्ले से निर्मम हत्या की जाती हो… और जाहिलियत की जिद के आगे सारे नियम कानून ताख पर रखकर महज आजादी की ढ़ोंग अलापकर नंगा नाच किया जाता हो… ऐसे हृदय विदारक भीषण माहौल में कैसी आजादी कुर्बान कर दी जाए …..जिससे स्वतंत्रता के नाम पर हत्याएं, समानता के नाम पर नर संघार, अभिव्यक्ति के नाम पर रक्तपात और खूनी शौक पूरा करने के लिए मानव वधशालाओं की खुली छूट हो…
क्या हम इस तरह के दुख दर्द से कराहते हुए माहौल में अब भी भटके हुए बच्चे की आजादी के लिए पैरवी करें… जिनकी निर्ममता के आगे समग्र मानवता अकारण ही वध का शिकार हो जाने की ओर अग्रसर हो… कौन चाहेगा कि खून सनी घाटियों के बीच मानवता के राक्षसों को खुली आजादी देदी जाए जहां इंसानियत की हत्या करना पसंदीदा शौक हो…. मानवता के समक्ष भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग काम कर रहे हैं….मनुष्य के हित के लिए अधिकाशतः मानवाधिकार बनाए गए हैं.. जो सिर्फ मनुष्यों की ही रक्षा करते हैं… सोचने में तो भले ही यह राम राज्य से ओत प्रोत जैसा लगता होगा …लेकिन हम कैसे यह बात कह दें… कि मानवता के विध्वंसक जब मासूम बच्चों को अगवा करेंगे और उनकी आड़ में पूरे परिवार को बंदी बनाकर बचने की कोशिस करेंगे… ऐसे खौलते माहौल में कौन सा मानवाधिकार उस मासूम के रक्षा की जिम्मेवारी लेगा…